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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014


आराजक के लिए,  वास्तविक में जिम्मेवार कौन हैं?

आराजकता का शायद इनदिनों परिभाषा ही बदल गई, नहीं तो महामहिम गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर जिस आराजकता का जिक्र करके फैलने का आशंका जता रहे थे अब वे फैलने से वंचित नहीं हैं ब्लिक आहिस्ता -आहिस्ता कर अपने पैर पसार रहे हैं। जिस देश में प्रायः कोई भी मंत्रालय बचा हो जंहा भ्रष्टाचार जड़ न जमा पाये हो, देश में शायद एक भी ऐसा विभाग देखने को मिलता जो भर्ष्टाचार से अछूत हो चाहे राज्य सरकार के अधीन आता हो अथवा केंद्र सरकार के अधीन आता हो अर्थात राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के संदर्भ में दोनों का नजरिया एक जैसी ही। बैंकिंग प्रणाली पूरी तरह लचर हो चुकी हैं, उपभोक्ता मायुश और परेशान हैं और सुननेवाले वाला कोई नहीं। आम आदमी के जान-माल असुरक्षित हैं और उनको समझ नहीं आता हैं कि इस  विषम परिस्थिति में कैसे अपने आप को सुरक्षित रखे? दिन दहाड़े बहु बेटियो के अस्मत तार -तार  हो रहे है। देश के पुलिस संवेदनहिन् और लठैत बनकर रह गयी जो मंत्री और संत्री के इसारे पर सिर्फ लाठी भांजते नज़र आते हैं।  नेता और सरकार दोनों जनता का विस्वानीयता खो चुके हैं। प्रकृति सम्पदा का लुटा मचा रखा जबकि कॉर्पोरेट संसथान और सरकार के मिलीभगत से देश और देश के जनता का शोषण किये जा रहे हैं। एक तरफ लोकतंत्र के आढ़ में राजतन्त्र जैसी स्थिति बनायीं जा रही हैं परिवारवाद के इर्द -गिर्द देश और प्रदेश की राजनीती पृष्ठ भूमि को समेटने की पहल हो रही है , जबकि भाई भतीजा व सगे सम्बन्धियों का चलन जोड़ो पर हैं।  इसके वाबजूद अगर अराजकता का मतलब कुछ और होता अथवा ये होता है कि जनता के ऊपर सरकार का नियंत्र नहीं होना तो ये हालात अभी तक नहीं आया। क्यूंकि हमारे सभ्य समाज के ज्यादातर आम आदमी अनुशाषन पसंद करते हैं और देश के संविधान में अटूट विस्वास रखते हैं वे  कतई आरजकता फ़ैलाने के पक्ष में नहीं होंगे और न ही आराजकता को बर्दाश्त करेंगे।



 देश के नीव व हद्रय संविधान होते हैं किसी भी देश के संविधान जितना सरल और संवेदनशील होगा उतने ही सुगमता से देश के प्रगति का मार्ग परस्त करेगा। वास्तविक में संविधान का परिभाषा ही सम  + विधान  अर्थात बराबर का व्यवस्था  व कानून का प्रबधान किया गया और देश के सभी वर्ग के नागरिक का हित ख्याल रखा गया।  संविधान के रचियता ने बखूबी प्रत्येक पहलु को बारीकी  से  श्पष्ट व्याखान किया जिसमें न लिंग, न अमीरी न गरीबी , न महज़ब और न ही जाति के आधार पर किसी के साथ पक्षपात करने की छूट दी ब्लिक उनको पहले से आभाष था कि लिंग, हैसियत, रसूख, जाति और महज़ब के आध में किसी के साथ अनुचित होने का गुंजाईश न रहे  इसके लिए पिछड़ रहे वर्ग रियात दी गयी पर इनके कदरजान ने  अपने हित के लिए समय -समय पर इनका परिभाषा और इसमें लिखी गईं विधि को अपने हित खातिर उलट फेर करते रहे फलस्वरूप कुछ लोगों को इसका लाभ मिला जो संतुष्ट दिखें जबकि कुछ लोग असंतुष्ट दिखे क्यूंकि उनके हित का सदेव नज़रअंदाज़ किया गया। जिस देश में मुट्ठी भर लोग अपने हित के खातिर देश के ह्रदय (नींव) को घात पहुचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं ऐसी विकत परिस्थिति में आरजकता का ही बोल-वाला होना स्वाभाविक हैं जिसे नक्कारा नहीं जा सकता  है।  


कार्यपालिका, न्यापालिका, विधायिका, लोकतंत्र के प्रमुख स्तम्भ हैं जिसके ऊपर लोकतांत्रिक देश निर्भर करता हैं जितने ही पारदर्शिता, भ्रष्टाचारमुक्त  और सुचिता इनमें व्याप्त  होंगे उतने ही लोकतांत्रिक देश की भविष्य उज्जवल होंगे। एक तरफ भ्रष्टाचार दीमक बनकर अंदर ही अंदर इन प्रमुख स्तम्भ को खोखला का रहे है दूसरी तरफ इनके काम -काज में भी पारदर्शिता का लेस नहीं। जिस दिन से  इन प्रमुख संवैधानिक संस्था भ्रष्टाचारमुक्त होकर पारदर्शिता और सुचिता से काम करने लगे तब मानों देश में आरजकता के काले बादल छंटने लगेंगे और बुलंदी के प्रभात दिखने लगेंगे। यद्दिप  ये कल्पना शायद ही कभी हक़ीक़त से रुबरु हो पाये।


बरहाल चारों तरफ आराजकता का जो मौहाल है नतीजन लोग बिना किसी दुबिधा के किसी के बारे में जानने के बजाय उनके ऊपर फोरन विस्वास कर जाते हैं जैसे ही उनके मुखारबिंदु से ये सुनाने का मौका मिलता हैं कि वह शख्श उनके रोजमर्रा की परेशानियों से निजात दिलाने के लिए कटिबद्ध है, हालाँकि लोगों की मनोस्थिति ये भी विचारने के अनुकूल  नहीं रहता हैं कि आजतक तो बहुतों आये और दिलाशा देकर अपने मनसूबे को पुरे कर चले गए फिर इनपर क्यूँ विस्वास करे ? परन्तु इस तरह का सवाल तो जहन में आना लाज़मी हैं लेकिन आशावादी प्रवृति जो मनुष्य का होता हैं इसी कारण से लाखो बार खुदको ठगे जाने के वाबजुद भी दूसरे के अस्वासन पर अपनी विस्वास का नीव रख ही देते हैं। अस्वासन देनेवाले इसका तब तक फायदा उठाते हैं जबतक विस्वास करने वाले पूरी तरह से टूट नहीं जाते। मसलन प्रत्येक दो चार साल में एक आंदोलन का आगाज़ होना और नई राजनीतीक पार्टी का गठन होना। दरशल में आम आदमी पार्टी इसीका नतीजा हैं जिन्होंने देश में आराजकता के जो मौहाल बना हुआ है उसका बखूबी इस्तेमाल कर अपने  मनसूबे को साधने के लिए आराजकता से निज़ात दिलाने के आध में आंदोलन और कई प्रकार के लोकलुभावन नुस्खे के जरिये लोगों का विस्वास जीतने में कामयाब हो गए और धीरे -धीरे कर जनता का नब्ज़ टटोलने लगे पहले जो भ्रष्टाचार को अहम् मानते थे बाद में कई और मुद्दे को लेकर जनता के बीच में अपनी छवि को निखारने लगे। जब इनको यकीं हो चला अब अपने मनसूबे को बिना देर किये हुए पुरे किये जा सकते क्यूंकि लोगो का विस्वास उनके पर इतना हो गए कि उनके विरोधी कुछ भी करले पर तोड़ नहीं सकते। फलस्वरूप नतीजा बिलकुल अनुकूल ही रहा जैसा उन्होंने सोचा था, दिल्ली विधानसभा के चुनाव में अपेक्षा से अधिक सीट जीत कर आये। पर बिना सरकार बनाये सत्ता का रसपान करना मुमकिन नहीं था अन्तः बिना आगे पीछे सोचे सरकार भी बना ली जबकि उनको आभाष था कि जिस पार्टी को इनके कारण मटिया पलित हो चुकी वे कैसे इतने आसानी इन्हे बक्श देगी। कारणस्वरूप वे मौका के ताक में थी बस उन्होंने  सरकार को सदन में समर्थन देकर आगे की रणनीति जगजाहिर कर दिए क्यूंकि  समर्थन देनेवाले भी इन्ही के साथ हो कर इन्ही को जड़ को उखारने का जो मन बना लिए थे। हद तब हो गया जब राज्य के कानून मंत्री कानून तोड़ते नज़र आये जबकि   हाल ही में आम आदमी से खाश आदमी बिना संग्रस किये बने थे तो नए रुसूख का तो पुलिस वाले को मान रखना चाहिए था  पर ऐसा हुआ नहीं। आखिकार बहाना जो भी हो पर सूबे के मुख्यमंत्री धरना पर बैठ गए।


 आराजकता और जनता के रोजमर्रा के तकलीफ से निजात दिलाने के लिए न जाने अनेको लोकलुभावन वायदो के साथ तो चुनाव का एजेंडा तैयार कर लिए पर अब पूरा करने की जब बारी आयी तब जाकर ये जाना कि जितना सरल वायदा करना हैं उतना ही कठिन इन्हे पूरा करना। काफी जद्दोहद के बाद ये समझ में आ ही गए कि इसे पूरा  करना नामुमकीन हैं तो फिर इन्होने लोगों का ध्यान को भटकाने के इरादे से कुछ ऐसे करने लगे जिससे  मीडिया के साथ -साथ दिल्ली के लोगो का भी ध्यान फेर सके और ऐसा ही हुआ परन्तु ये शायद अंदाज़ा नहीं रहा कि इस काम रोकने के लिए पुलिस की करवाई की जा सकती है जो कि दिल्ली सरकार के अधीन नहीं ब्लिक केंद्र सरकार के अधीन हैं जबकि सत्तारूढ़ पार्टी जो केंद्र की सरकार चलाती हैं वे तो चाहेगी ही कि दिल्ली सरकार की सत्तारूढ़ पार्टी के नेता गलती करे पर उन्हें सम्भलने का कोई मौका नहीं दिया जाय, आखिरकार हुआ वही जो केंद्र सरकार चाहती थी। यही आंदोलन जिनके बुनियाद पर दिल्ली का सिंहाशन नसीब हुई थी पर इस बार का आंदोलन फ़ज़ीहत के शिवाय कुछ भी नहीं दिया। एक तरफ इनके नेता पुलिस की  करवाई का शिकार हुए  जबकि दूसरी तरफ दिल्ली के  आम आदमी के जीवन अस्त व्यस्त हो गए ।  यही कारण था कि दिल्ली सरकार को  चारो तरफ से निंदा और विरोध का सामना करनी पड़ी।  केंद्र सरकार के सत्तारूढ़ पार्टी , जिनके आराजकता को मिटाने के लिए आंदोलन के कोख़ में जो पार्टी अवतरित हुई थी, आज उन्ही पार्टी और उनकी सरकार के मंत्री आरजकता फैलाने का कसूरबार मानने लगे है  नतीजन केंद्र सरकार का और केंद्र के सत्तारूढ़ पार्टी  इनको खूब कोस रहे है ।


सवाल ये उठता है कि जब ये लोग आराजकता फैला रहे है तो फिर सरकार में इनको समर्थन क्यूँ दिया जा रहा हैं? जबकि दिल्ली प्रदेश के सत्तारूढ़ पार्टी के पास अब कोई विकल्प ही नहीं बचा यदि खुद ही इस्तीफा दे देती है तब भी नकुसान भुगतनी पड़ेगी और सरकार में रह कर लोगों से किये गए वायदे पूरा नहीं कर पाती है, उस हालत में भी ख़मियाज़ा इन्ही को उठानी पड़ेगी अर्थात दिल्ली प्रदेश के सत्तारूढ़ पार्टी  केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के चक्रव्यूह में इस कदर फंस गयी है जंहाँ से सरलता से निकलना हरगिज़ अब आसान नहीं और नहीं तो कुछ इस तरह का साथ गांठ इन दोनों पार्टी  के बीच में जिसे लोगों को समझने में देर लगेंगे जबकि ये दोनों पार्टी जान बूझकर इनको समझने देना नहीं चाहते हैं।


 केंद्र सरकार के अधीन दिल्ली का पुलिस और सी.बी. ई. हैं जिसको पिछले एक दशक से बड़ी चतुराई से इस्तेमाल करती आई हैं और इन्हींके दम पर केंद्र सरकार अपनेको अभी तक जीवित रख पाई हैं इसे आम आदमी भलीभाँति जानते है।  अब केंद्र सरकार ने जान चुकी है कि शायद आगमी चुनाव के पश्चात सत्ता में वापस आना सहज नहीं हैं परिणाम स्वरुप इनदिनों सी.बी. ई. के माध्यम से क्लीन चित का अभियान चलाये जा रहे हैं और अपने चाहने वाले को क्लीन चित बिना किसी बाँधा बात रहे हैं। जो सरकार पुलिस तंत्र के बल कई आंदोलन को रातों रात ख़तम करने का स्वाद चख रखी हो वह क्या इतने आसानी से किसी और को आंदोलन के जरिये चमकाने देते। आखिरकार आदोलन को वापस लेना ही पड़ा चाहे पुलिस का डर हो या जनता कि बेरुखी क्यूंकि जनता भी ये जान चुकी है फायदा किसीका भी हो नुकशान सिर्फ और सिर्फ जनता का ही होना है।


आज देश में पुलिस को सिर्फ लाठी भाजने के लिए, नहीं तो सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल की जाती जबकि कानून व्यवस्था का हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। पुलिस जो देश के जनता का  जान-माल के सुरक्षा के  लिए प्रतिबद्ध होनी चाहिए वे सिर्फ सरकार और सरकार से जुड़े लोगो का सुरक्षा गार्ड बनकर रह गयी हैं। इसीका परिणाम हैं कि एक तरफ देश के आम आदमी अपने को असहाय और असुरक्षित समझने लगे है वही दूसरी तरफ महिलाये के आबरू भी महफूज़ नहीं हैं। सियासी नफे नुकशान के आध में पुलिस को पूरी तरह से संवेदनहिन् बना दी गयी है  कारण पुलिस लोगों का विस्वानीयता पूरी तरह खो चुकी है। इसी ही कारण जिन पुलिस के जिम्मा देश की कानून व्यवस्था को कायम रखने का काम है वही देश के कानून व्यवस्था को धजियाँ उड़ाने से बाज नहीं आते हैं ।  

दरशल में आरजकता का समाधान तभी मुमकिन हैं जब इनके तह में जाकर ढेरो ऐसे गम्भीर प्रश्न है जिनका उत्तर यथाशीघ्र ढूढने का पर्यन्त की जाय। उदहारणस्वरुप,  क्या कोई मैं हु आम आदमी का तोपी सिर पर पहन लेने से आम आदमी बन व हो जाता है ? देश में संवैधानिक पदो पर बैठे लोग आखिर कब तक अपनी जवाब देहि को भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ाते रहेंगे? आम आदमी कब तक बेरोजगारी और मंहगाई से त्रस्त रहेंगे ? गाव जो आहिस्ता -आहिस्ता कर शहर से दूर होते जा रहे है, कौन और कब इसके बीच की खाई को कम करेंगे? आखिर कब तक पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मजबूर रहेंगे? शुद्ध पानी और शौचालय  से कब तक आधी से ज्यादा आबादी वंचित रहेंगे, बगैरह ? एक तरफ जनता जो सरकार बनाती  हैं उनको भी अपने निजी हित का  ख्याल छोड़ कर देश के हित का ख्याल रखना होगा और अपने वोट को जब तक ऐसे  सुयोग्य ग्य उम्मीदवार के पक्ष में नहीं डालेंगे तबतक संवेदन शील और कर्त्तव्यनिस्ठ  सरकार का परिकल्पना करना कतई उचित नहीं होगा क्यूंकि देश के जनता को अपने संविधान के प्रति अटूट विस्वास रख कर अपने मौलिक अधिकार का जवाबदेही से उपयोग करना होगा जबकि सरकार जिससे जनता अपेक्षा रखती हैं कि हरेक बुनियादी सुविधाओं मुहिया करवाये  उनकें अपेक्षा पर जिम्मेदारी से खड़े उतरे और साफ सुथरी सरकार  की छवि जनता के समक्ष पेश करे क्यूंकि लोक (जन)  हैं तो देश हैं, देश हैं तो संविधान हैं अर्थात लोकतंत्र में लोक से बढ़कर कोई नहीं।  अन्तः संवैधानिक पदो पर बैठे लोगो को बिना किसी विलम्ब को इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करने के बजाय अपने जहन में गाठ बना लेना चाहिए और दिखावती के हितेषी बनने  के बदले जनता के दर्द और तक़लीफ़ से रुबरु होकर उनके हमदर्द बनकर उसे दूर करने की जरुरत ।

इन सबके वाबजूद यह तय करना अभी भी सरल नहीं है कि आराजकता कौन फैला रही हैं? सरकार अथवा जनता ! सरकार जो तकरीबन आज़ादी के पेंसठ साल  बाद भी जनता के अपेक्षा पर खड़ी नहीं उतरी या जनता जो आज़ादी के पेंसठ साल  बाद, आज भी उपेक्षा का शिकार हो रहे है,  अफसोश ! आज  भी अधिकाधिक लोग अपने मौलिक अधिकार को पूर्णतः जान नहीं पाये है व अपने वोट की ताक़त से  अनजान हैं । अन्तः सरकार और जनता दोनों को आत्मचिंतन करना ही चाहिए कि जो आरजकता का मौहाल बना हुआ है उसके लिए वास्तविक में जिम्मेवार कौन हैं ?, क्यूंकि वक्त रहते हुए इनसे निज़ात नहीं पाया गया तो आने वाले दिनों में इसका परिणाम काफी भयानक और उग्र होगा। 

सोमवार, 27 जनवरी 2014


नारा का ही सहारा ………………… ?

 


ईन दिनों उद्देश्य और सोंच को ताक पर रख कर सिर्फ नारे (स्लोगन ) के दम पर या आकर्षित बिज्ञापन के बदोलत हर पार्टी  चुनाव जीतना चाहती हैं। यही कारण है कि नारे को लेकर एक पार्टी दूसरे पार्टी को आरोप लगाते  दिखतें हैं।  एक  पार्टी के गणमान्य लोग कहते हैं कि इन्होने तो ओबमा का नारे चुरा लिए तो दूसरे पार्टी के  गणमान्य लोग कहते है कि इन्होने हमारे नारे  को चुरा लिया हैं। इससे तो यही अंदाज़ा लगाया जा सकता कि आने वाले दिनों में पार्टियाँ अपनी अपनी नारे को कॉपी राईट करबाते दिखेंगे।

दरशल में कई बार पार्टी नारे के दम पर चुनाव जीतने में कामयाब हो गए और नारे भी लोंगो के जुबान पर यूँ इस कदर बैठ गए कि दशको बाद भी लोग उसे भूल नहीं पाये  कुछ गिने चुने नारे जैसे कि "जय जवान जय किसान " कांग्रेस के बरिष्ठ  नेता व पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शाश्त्री ने १९६७ में नारा दिए थे,  एक  बार फिर कांग्रेस के आलाकमान व पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने १९७१ में "गरबी हटाओ " का नारा दिए थे जबकि जय प्रकाश नारायण  ने जन आंदोलन के दौरान यह नारा दिए थे कि "इंदिरा हटाओ देश बचाओ"  और हाल में ही यानि २००४ में कांग्रेस पार्टी के तरफ से एक नारा दिया गया था कि " कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।" 

यद्दिप नारा कितना भी लोकप्रिय क्यूँ न हुआ हो पर नारा का उद्देश्य हमेशा लोगों के हित से कोसो दूर ही रहा नतीजन जनता को कभी भी नारे में कही गई बातो से कुछ हासिल नहीं हुई।  इसीका परिणाम  है कि आज भी किसान आत्मा हत्या करने पर मज़बूर हैं,  देश में आज भी गरीबी हैं और आम आदमी के साथ अगर सब कुछ ठीक होता तो आज क्यूँ आम आदमी इतने  हताश होते।

फिलहाल कांग्रेस और भाजपा दोनों जिस नारे को लेकर वाक युद्ध करने में लगे हैं वह नारे किसी  राजनीती पार्टी की है ही नहीं ब्लिक कॉर्पोरेट जगत का वह तीन शब्द है जो टीम वर्क के प्रति जागरूक करते हैं।  "मै नहीं, हम" सिर्फ एक ग्रुप और दल को दर्शता हैं न कि पुरे आवाम या  देश को यदि कोई राजनितिक पार्टी इसे इस्तेमाल करना चाहे तो इसके बदले "हम नहीं, हम  सब (NOT WE , WE ALL ) का इस्तेमाल करे तो बेहतर होगा।

यदि कोई पार्टी अगर किसी का नारा चुराती  हैं, तो इसमें हर्ज ही क्या हैं क्यूंकि अगर किसी का सोंच सकारत्मक हैं इसलिए तो कोई और इसको अपनाने के लिए आतुर हैं और सकारत्मक सोंच किसी की विराशत नहीं कहा जा सकता इन पर सबका अधिकार हैं। न इसके लिए  किसीको अंह करने की  जरुरत हैं और न ही मलाल करने की  जरुरत हैं कि कोई और हमारा नारा चुरा लिया हैं। नारा जो शब्दो का ताना -बाना हैं यह  अगर उद्देश्य विहीन हैं, तो सिर्फ लोगो के जुबाँ पर तक ही पहुँच पाते हैं जबकि उद्देश्य के साथ हैं तब लोगों का दिल को भी छूटे हैं। अन्तः  जो पार्टी नारे के बुनियाद पर लोगों तक पहुचतें हैं , बेशक चुनाव जीत जाये अपनी मनसूबे को प्राप्त कर लें लेकिन जनता ( लोगों) के दिल में जगह पाने के लिए सकारत्मक सोंच के साथ वे हट भी चाहिए ताकि उस अनुमानित सकारत्मक सोंच को व्यावहारिक जामा पहना सके।

गुरुवार, 23 जनवरी 2014




लचर बैंकिंग प्रणाली के लिए कौन जिम्मेवार हैं ?



किसी भी  देश के आर्थिक उन्नति में देश की बैंकिंग प्रणाली का अहम भूमिका होता हैं। एक तरफ जँहा उपभोक्ता महँगाई से त्रस्त हैं वही दूसरी तरफ लचर बैंकिंग प्रणाली से उपभोक्ता को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता हैं। न्यू टेक्निक से बैंकिंग प्रणाली को आधुनिकता करने की कोशिश की तो जा रही हैं जो बैंकिंग काम काज को तो सरल बनता ही हैं पर उपोभोक्ता भी इसका लाभ उठा रहे हैं जिसे झुठलाया नहीं जा सकता है परन्तु आधुनिकता के होर में सरकारी और गैर सरकारी बैंक दोनों अग्रसर हैं लेकिन इनके आधुनिकता के पायदान पर जो खामिया हैं उनसे उपभोक्ता उपयोग के दौरान भुगतते हैं जबकि  उस खामिया का लाभ अपराधिक छवि के लोग भरपूर उठा रहे हैं नतीजन उपभोक्ता हमेशा किसी न किसी परेशानी को लेकर बैंक का चक्कर लगाते रहते हैं। 


यद्दिप समस्या से निज़ात दिलाने को लेकर बैंकिंग कर्मचारी के पास न ही प्राप्त जानकारी रहती है न ही अनुकूल इच्छा शक्ति ताकि यथाशीघ्र समस्या से उपभोक्ता को निज़ात दिलाये। उपभोक्ता इन समस्याओ के हल को लेकर अनेको बार बैंक का चक्कर लगाते हैं पर बैंकिंग कर्मचारीयों का प्रतिकूल व्यवहार और नकारात्मक प्रयाश को देखते हुए आर्थिक नुकशान भुगतने के लिए खुदको तैयार कर लेते हैं। अन्तः आर्थिक नुकशान को झेल जाते हैं। 

 

हैरत तो तब होता हैं, जब बैंक के अध्यक्ष को लिखित शिकायत भेजी जाती हैं पर उनके यहाँ से भी साकारत्मक जवाब नहीं मिलाता हालाँकि शिकायत को फॉरवर्ड करने की अक्नोलेजमेंट जरुर मिलता है कि उनके तरफ से सर्किल हेड ऑफिस को शिकायत फॉरवर्ड कर दिया गया हैं। अब उस शिकायत के ऊपर उनको ही करबाई करने को कहा जाता हैं जिनके खिलाफ शिकायत की जाती हैं। उस कहावत को चरित्रार्थ करते हैं कि गुनहगार भी खुद, जज भी खुदको मलतब फैसला तो अपने हक़ में ही लेना अर्थात शिकायत को लीपा -पोति करके किसी डस्टबिन में डाल देते हैं।  इंतहा तो तब हो जाती हैं जब इसी शिकायत को आर.बी. ई. के आलाधिकारी को भेजा जाता हैं,  पहले तो ये अस्वासन दिया जाता हैं कि शिकायत के ऊपर उपयुक्त करबाई की जायेगी और अचानक उनके यहाँ से यह सूचना मिलता हैं कि शिकायत को खारिज़ की जाती है क्यूंकि शिकायत के गहराई में नहीं जाया जा सकता हैं  पर इस पत्राचार के दौरान ये लिखना नहीं भूलतें हैं कि इसका पुनः शिकायत नहीं करे क्यूंकि इसके ऊपर पुनः विचार नहीं किया जायेगा। आर.बी. ई. के गवर्नर को जब इस शिकायत फॉरवर्ड किया जाता हैं तो उनके तरफ से शिकायत को देखने की जरुरत भी नहीं समझे जाते हैं क्यूंकि वहाँ से कोई अक्नोलेजमेंट भी नहीं भेजा जाता हैं। वस्तुः जो बड़े ओहदा पर होते हैं उनके लिए शायद ये जरुरी नहीं  होता है  कि आप के शिकायत प्राप्त करने  के पश्चात अथवा करबाईको लेकर किसी प्रकार का जवाब दिया जाय। 


आखिरकार सूचना के अधिकार के माध्यम से जान पाया कि लगभग में साढ़े नौ हज़ार शिकायत बैंकिंग ऑम्बुड्समैन दिल्ली सर्किल  को  अप्रैल से अगस्त के बीच की गई जिस में से सिर्फ १८ शिकायत उपभोक्ता के पक्ष में दिया गया बाकि को या तो खारिज़ कर दी गयी और नहीं तो सुलह करबा दी गयी जबकि  केंद्रीय सुचना उपायुक्त के पास लगभग में पाँच हज़ार आवेदन पेंडिंग हैं जिसका सुनवाई की जानी हैं। वास्तविकता में बैंकिंग प्रणाली  के इर्द -गिर्द किस कदर भ्रष्टाचार विद्दमान हैं ये बड़ी आसानी देखी जा सकती हैं। सवाल यहाँ ये भी उठता है कि बैंकिंग प्रणाली का जो लचर स्थिति हैं जानबूझकर सरकार इसे नज़र अदाज़ कर रही है जबकि आर.बी. ई. के पास फुर्सत ही नहीं हैं जो इसे दुरस्त करने के उपाय के बारे में सोंचे। 

 

बरहाल इस देश का लोग हो अथवा उपभोक्ता इस लचर बैंकिंग प्रणाली के कारण प्रतिदिन किसी न किसी समस्या से निपटते रहते हैं  और न चाह कर भी जिसे झूझने को मज़बूर हैं फिर भी खबर लेने वाले कोई नहीं।  यदि कॉन्जुमर फोरम की बात करते हैं तो ज्ञात यह होता है कि उनकी कार्य क्षेत्र जितना बड़ा हैं उतना ही कम उनको अधिकार दिया गया मसलन उपभोक्ता को संतुष्ट करना उनका सामर्थ्य नहीं। अन्तोगतवा, उपभोक्ता हो या ग्राहक अपनी रोज़ाना की समस्याओ को लेकर कहाँ जाय, जंहा सरलता से शिकायत का समाधान और संतुष्टि मिले?




रविवार, 19 जनवरी 2014


आआपा सिर्फ अवसरवादी परंपरा का एक स्वरुप



क्या धीरे -धीरे आआपा अपने आपा खो रहे हैं? अब केजरीवाल को सच्चाई का देवता कहना मुनासिब नहीं होगा और उनके चाहनेवाले यथाशीघ्र इस सत्य से वाक़िफ हो जाना चाहिए कि केजरीवाल किसी क्रांति और परिवर्तन का प्रतिक नहीं ब्लिक अवसरवादी परंम्परा का एक वह स्वरुप हैं जिन्होंने अपनी हित के खातिर अपने कुछ साथियो को मझधार में छोड़कर सत्ता को लालायित होकर अपने अनुकूल पुराने साथियों को एकत्रत करके एक दल बना लिया और अपने स्वार्थ को पूर्ति करने के हेतु अनेको लोकलुभावन वायदे करके सत्ता पर काबिज़ हो गए उसी तानाशाह लोगों और रवैया के साथ जिससे दिल्ली के जनता दिल और दिमाग से नक्कार चुके थे। एक शस्त्र, जो ब्रह्माशस्त्र का रूप अख्तियार करता पर आआपा के कदरदानों के हित के भेटं चढ़ कर सिर्फ झुनझुना बनकर रह गया।  दरशल में इसके लिए जिन्होंने त्याग और सम्पर्ण किया उनको हर्ष का अहसास तो होगा कि न कुछ के बदले कुछ तो मिला जबकि देनेवालों ने भी इसके लिए मना नहीं कर सके। अन्तः ये झुनझुना कितना कारगर हैं?, क्या  ये भ्रष्टाचारियों को जगाने का काम करेगा? क्या इनके ध्वनि में इतना ताक़त होगा कि भ्रष्टाचारियों को हमेशा सजग करता रहेगा, जिससे भ्रष्ट मुक्त समाज का निर्माण हो पाएंगे ? इस तरह के कई दिल को झंझोरने वाले प्रश्न जनता के मस्तिक में ज्वारभाटा की भातिं उतार -चढाव कर रहे हैं जिसका उत्तर शायद अभी कोई नहीं दे सकता।

 

वास्तविक्ता में जो आंदोलन पुरे देश के आवाम को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया क्यूंकि देश के अधिकतर लोग ने  भ्रष्टाचार को कैंसर से भी भयानक बीमारी मान चुके थे, जिसके कारण हमारी व्यवस्था दिन-ब-दिन खोखला हो रही थी इसलिए तो देश के लोंगो को विस्वाश था कि एक रामबाणॊषोद्धि मिलेगा इस आंदोलन के माध्यम से पर कुछ अवसरवादी और स्वार्थी के चलते यह आंदोलन दिशाहीन हो गया आखिरकार सरकार के  नुस्ख़ा  को अपनाकर रामबाणॊषोद्धि का इच्छा को परत्याग करना पड़ा भली भातिं यह जानते हुए कि इस नुस्ख़ा से भ्रष्टाचार (कैंसर) जैसी बीमारी का उपचार कतई सम्भव नहीं।

आआपा के नींव धारक समूह में जो भी लोग थे पहले तो एक -एक कर उस आंदोलन से जुड़ते गए फिर उस आंदोलन को अपने इर्द- गिर्द लेकर आये और जैसे ही उनको यकीं हो चला कि अब लोगो को उनके पर निशंदेह विस्वाश का परत जम चूका हैं जिसको आसानी से नहीं हटाया जा सकता तो उन्होंने फोरन अपनी पार्टी बनाने का एलान कर दिए फिर भी लोंगो का विस्वाश का परत जो उनके  प्रति  अपने जहन में जमा चूके थे वह उतार नहीं सका। आखिरकार वह विशाल आंदोलन धीरे -धीरे कर सिकुड़ने लगा और अन्तः न कुछ भी के एवज़ में जो कुछ के खातिर आंदोलन को समाप्त करना ही पड़ा।

आआपा के आलाकमान को हैरतंगेज़ होंगे कि कुछ विधायक आतुर हैं कि उनको भी बड़े मंत्री का ओहदा मिले अब उन्होंने पता हो चला कि यहाँ तो सब खाश बनने की चाह में आये हैं इसकेलिए कबतक शब्र का शीमाओ को बाँध रखे इसी कारन धीरे -धीरे कर पार्टी के अंदर अलगाव-वादी भावना पनपना लाज़मी हैं वस्तुः पुराने लोगों जो नीवं धारको में से थे  जान - पहचान या मित्र के श्रेणी में नहीं आते हैं उनको खाश बनने के मौका से वंचित किया जबकि लार टपकते हुए कई अवसरवादी लोग आ रहे हैं और उन्हें सम्मान सहित उनको मनपसंद ओहदे दिए जा रहे हैं।  नतीज़ा तो आना अभी बाकि है पर आआपा में जिस तरह लोगों में असंतोष दिखाई दे रहा हैं शायद बहुत जल्दी ही इसका गम्भीर परिणाम आने का आसार हैं।अब आआपा के कर्णोद्धार को तो ज्ञात हो ही गया होगा कि अवसरवादी इस परिवेश हर कोई एक मौका का ताक़ लिए रहता हैं जैसा कि आप ने पार्टी बनाकर मुंगेरी लाल के हशीन सपने दिखाए और लोग के मन में ईमानदारी का भ्रम जाल बनाये परिणाम स्वरुप उस भ्रम जाल में फासने में कामयाब हो ही गए अन्यथा आआपा कतई नहीं चुनाव जीत पाते पर आप चुनाव भी जीत गए और दिल्ली में सरकार भी बना लिए। एक तरफ जहाँ लोगों का विस्वाश का परतें आहिस्ता -आहिस्ता कर आआपा  और कांग्रेस के दरमियान बढ़ती नज़दीकिया में पिघल रहे हैं वही दूसरी तरफ लोगो का भ्रम जाल भी फटने लगा हैं आप के ही पार्टी के लोगो का कारनामें को देखकर।

जो भी हो आज के राजनीती परिदृश्य में आआपा के शीर्ष कमान यह कहने से हिचकते नहीं हैं कि उनकी पार्टी, देश के सबसे ज्यादा लोकप्रिय पार्टी है और उनके आलाकमान सबसे लोकप्रिय नेता हैं पर ये वास्तिवकता से परे हैं क्यूंकि आआपा कथनी और करनी में थोड़ा भी समानता नहीं जबकि वे लोग अंह के भी शिकार होने लगे हैं , इसलिए तो ये कहने से थकते नहीं कि उनका मुकावला सीधे भजपा से होने जा रहे हैं आगामी लोकसभा चुनाव में। आआपा के नेताओ का हाल के बयानो से संदेह की गुजाइंश तो होती ही हैं अब आआपा और कांग्रेस के बीच परदे के पीछें कुछ तो जरुर हुआ हैं नहीं तो प्रतिपक्ष को विरोधी मानकर उनसे मुक़वाला कि बात क्यूं करते है यद्दीप लोगों ने आआपा को भेजा था कांग्रेस से मुक़वाला करने के लिए और यही कहकर आआपा ने राजनीती धरातल पर जन्म ली जैसा कि कोई बच्चा माँ- माँ कहकर इस दुनिया में आता हैं। नवजात बच्चा को लेकर जिस कदर पुरे मुहल्ला में चर्चा होती हैं और घर में सबके आँखों का तारा बने होते हैं उसी तरह इनदिनों आआपा सबके आखों के तारे बने हुए हैं लेकिन जिस गोद को थामा हैं और कैसे भूल गए हैं कि उनसे ही मुक़वाला करने के लिए आपने जन्म लिया हैं। पर उनके गोद में जाने के बाद जंहाँ लोगों की सुरक्षा से ज्यादा स्वयं के सुरक्षा पर केंद्रित करना पर रहा क्यूंकि गोद में लिए हुए मौका के ताक़ में होगा कि कब आप को पटक कर आप से दुरी बनाये क्यूंकि आस्तीन के साप को कदाचित कोई  नहीं पालते, वही आप सुरक्षा के सभी विन्दु को लेकर सजग होंगे कि उनके चोट का मरहम क्या होगा ? शायद वह दिन दूर नहीं जब लोगों के आँखों चुभने लगे और उनके दिल- दिमाग से नदारद होना पड़े। फिलहाल बिलकुल आआपा उस नवजात बच्चे के भातिं हैं जो अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा जबकि दौड़ने के लिए तत्पर हैं जो न उनके शेहद के लिए उचित और न हीं इस देश के लिए।

बरहाल इस तरह के स्वार्थी नेताओ और स्वार्थी समाजसेवीयो के चलते ही वह दिन दूर नहीं जब जनता, पार्टीयों और नेताओ से उनके मैनिफेस्टो को लिखित स्टाम्प पेपर एग्रीमेंट के तोर पर चुनाव से पहले जमा करबायेँगे क्यूंकि आज़ादी के बाद लोकतंत्र तो हमें मिला पर कुछ स्वार्थी लोग और उनके दल के चलते हमेशा हमें ठगे गये  और हद तो तब हो गया जब आम आदमी के नाम पर खाश आदमीयों ने अपनी राजनीती की बाज़ार सजा ली और वायदा फरामोशी की सभी हदे पार कर सत्ता के भोगने के लिए बड़ी चुतराई से हमारी उम्मीद पर पानीफेर दिए। हालाकिं उनको अभी तो इज्जत नसीब हुए हैं जिसको भी पचा नहीं पा रहे हैं, पूछेंगे तब, जब फज़ीहत से सामना होगा और उस फज़ीहत को झेलने की मादा रखते हैं या नहीं। पश्चाताप के दिन में तो फिर वही जनता याद आएंगे जिनसे किये हुए वायदें और कसमें तोड़ कर सत्तापर काबिज़ हुए।

शनिवार, 18 जनवरी 2014


 नेताजी आप तो सच्चे हैं


नेताजी आप तो सच्चे हैं
क्या,  हम अभी भी बच्चे हैं,
बच्चे को कामगार बनाकर
सपने का महल तैयार किया
अथक प्रयाश रही हमारी
जो आपको बुलंदी नसीब हुई
खुदको मख्खन -मलाई चट कर गए
हाथ हमारे लोली पॉप रख गए
आप ही बताये मेरी भूख क्या इतनी है
कि आप के ख्याली पुलाउ से भर जाये
न कहिये कुछ, पता हैं आप कितने अच्छे हैं
नेताजी आप तो सच्चे हैं
क्या,  हम अभी भी बच्चे हैं,


मेरी हट है कि मेरा अधिकार मिले
पर आप ने झुनझुना का दुलार दिए
झुनझुना के सुरमय ध्वनि में
हमें सुलाकर क्या खूब किया आपने
पर काश, ये आप समझने की कोशिश करते
 बच्चे जो कभी आपके लोलीपॉप पर बहल जाते थे
अब वे बालिग हो गए
दुनिया -दारी की समझ अब उनको हो चला
दिखावे का लार- दुलार से वे अब उब चला
कब आयेंगे बाहर इस भ्रम से
 कि अभी तक हम कच्चे हैं
नेताजी आप तो सच्चे हैं
क्या,  हम अभी भी बच्चे हैं,


क्या हमारी चुपी ही सन्नाटा है
जो हमें ही निगल रहा हैं
आदत ही हो गयी हैं जो कि
रात के अँधेरा में खुदको ढ़ूढंते हैं
जबकि दिन के उजाले में औरो के सुनते हैं
देखिये फिर से विहान ने दी है दस्तक
आखिर ये अंधरा नहीं छटेंगी कबतक
प्रभात के पखर में खुदको परखें
 अपनी मुट्ठी को बंद करके
अपना भाग्य  विधाता हमे ही बनना है
कैसी होगी सोंच उनकी जो कि लुच्चे  हैं
नेताजी आप तो सच्चे हैं
क्या,  हम अभी भी बच्चे हैं,



गुरुवार, 16 जनवरी 2014



 अबकी बार, बड़का चाचा का दिल बाग़ बाग़ हो गया !



भईया, देश की मीडिया छोटी से छोटी खबर को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने की फिदरत हो गयी सफई का महोत्सव को खामोखां तिल का तार बना दिया नहीं तो क्या नेता को भी तो मज़ा चाहिए न भाई , वेसे भी इतनी बड़ी सूबे को चलना सरल काम थोड़े ही हैं। बेशक़ लोग अनाप सनाप बोलते रहते है कि कोई प्रगति  नहीं  हुई, अरे  बाबूजी, अब फिल्मों का सूटिंग हमारे प्रदेश में हो रही हैं और क्या चाहिए?  आखिर इतने बड़े राज्य को चलाने के लिए कितने माथापच्ची का काम हैं इसलिए तो साल में थोडा फुर्सत तो निकाल कर मनोरंजन कर लेना का हक़ तो सबको हैं। लला को बरसों की तमन्ना थी कि सलमान को अपने यंहा नचाये और बैठकर उनके नृत्य का लुप्त उठाये, चलो इस सफई महोत्सव के पश्चात उनकी भी ये हसरतें पूरी हुई । १४ दिन का यह महोत्सव में वाकई मुड़ रिफ्रेश हो गया अब एक साल तक फुर्सत कहाँ ?  पर ये मीडिया फिरसे मूड ऑफ करने में लगे हैं, मेरे भाई , बाबूजी, अब तो बक्श दो। कौन सी आफत आ गयी भाई, सलमान ही तो आया, अरे,  उनको भी तो पता चले रील लाइफ के दबंग भले वे हो पर रियल लाइफ में तो दबंग हम ही लोग हैं। पैसा तो बहुत खर्च हुआ पर मजा भी खूब आया मलिका का ओ गाने, हाय! जब मर्डर फ़िल्म आयी थी कई बार सोचा सिनेमाहॉल में जाकर देखे पर किसी के नज़र में आ गया तो उम्र के  इस आखिरी पड़ाव में बड़ी बदनामी होती पर बिना बदनामी के वही गाने सुन लिया वे भी मलिका सेरावत के डांस के साथ। हाय रे माधुरी की डांस, मन तो कह रहा था कि जाकर एक दो ठुमके मैं भी लगा लू,  पर अब वह उमर नहीं रही अगर कोई हड्डी इधर का उधर हो गया तो  मुसीबत ही हो जायेगी, जो भी हो पर अबकी बार दिल बाग़ बाग़ हो गया।

उसी समय मीडिया वाले आकर उनसे पूछते हैं, '' आज तो महोत्सव  सम्पन हुआ, इसके बारे आप क्या कहना चाहेंगे"?

"हँ भईया, महोत्सव बढियां से सम्पन हुआ" उन्होनो कहा।
"मंच का तो जवाब नहीं इस तरह का मंच तो हॉलीवुड के ही फिल्मोत्सव में देखनो को मिलता है, अच्छा मंच तैयार करने के लिए कितना खर्च किये गए ?' पत्रकार ने पूछा। पत्रकार इस सवाल को सुनकर कुछ बोल ही पाते अचानक किसी का आवाज़ सुनाई पड़ी, " बड़का चाचा, रामू चाचा आपको बोला रहे हैं। "
महाशय उनके साथ हो लिए, "देखो चाचा, रामू चाचा ने सबको कह रखा है कि चैनेल वाले से दूर रहने के लिए।"

देखिये, यही मंच है जहाँ पर कल रात सलमान खान, माधुरी दीक्षित, मलिका शेरावत और कपिल भी आये थे, यही गैस हीटर हैं जिसके गरमी में गरमजोशी के साथ उस रंगारंग कार्यकरम का मजा लिए जा रहे थे। पर मुज़फ्फरनगर में दंगा पीड़ित का खबर लेने वाला कोई नहीं हैं। दंगा पीड़ित के शिविर में तीस से ज्यादा बच्चे ठिठुर का दम तोड़ दिए हैं। इसी दौरान मोबाइल से रिंग टोन बजने की आवाज़ सुनाई दी, झट से मोबाइल को कान से लगाया तो पता चला कि अरविन्द केजरीवाल का प्रेश कॉनफ्रेन्स को लाइव टेलीकास्ट किया जाना हैं , इसलिए इस ब्रेकिंग न्यूज़ को यही ब्रेक देना।

बड़का  चाचा एक बात जरुर सच कह गए कि मीडिया वाले किसी भी खबर इस कदर बढ़ा चढ़ा कर पेश करते हैं कि उनके व्यंग और कटाछ में खबर की तथ्य ही तर्कहीन हो जाती हैं। दरशल में लाइव टेलीकास्ट और ब्रेकिंग न्यूज़ का जमाना जबसे आया हैं,  हर न्यूज़ को टी.आर.पी के पैमाने पर मूल्यांकन किया जाता हैं और किसी भी न्यूज़ को चलाने से पहले या तो मीडिया कंपनी की आर्थिक लाभ को टटोलें जाते हैं नहीं तो न्यूज़ के जरिए पत्रकार और एंकर अपनी भविष्य को परस्त करते हैं अन्यथा पत्रकारिता से जुड़े हुए लोग सभी नेता को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़तें अचानक नेताजी का टोपी पहनकर खुद नेताजी बन जाते।  आखिरकार अतीत में झांककर तो देखे ही जा सकते हैं कि अभी तक उन्होंने जो भी अपने पत्रकारिता के आढ़ लेकर काम किये उनमें खुदका भी हित तो कहीं विद्दमान नहीं थे।
 नेता अपने रसूख़ के दम पर हो या पैसो की खनक पर अभिनेता को नाचते हैं जबकि अभिनेता पैसा को देखकर नाचने से मना नहीं कर पाते हैं क्यूंकि अभिनेता का कहना हैं" पैसा फेक तमाशा देख"। कदाचित उनके दिल में देश की आवाम प्रति संवेदना के लिए कोई जगह है।  अन्तः इस लोकतत्र में मीडिया का ही भरोषा हैं इसीलिए मीडिया से दरखास्त है कि आप अपनी भूमिका निस्ठा और संवेदना के साथ निर्वाह करे नहीं तो लोकतंत्र  में सिर्फ तंत्र बच पायेगा जबकि लोक का नामोनिशां इस कदर गुम जायेगा कि ढूढ़ना सरल नहीं होगा जिस तरह का आज की परिदृश्य हैं ………………।

सोमवार, 13 जनवरी 2014


फिर वही पूस की रात.………………!

कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात 
ये  रात चाह कर भी नहीं गुजरती
पर वे रात चाह कर भी नहीं ठहरती 
बैरण हो गयी निंदिया जो मेरे अखियन को आती नहीं ,
ग़ैर हो गयी निंदिया जो उन अखियन को भाती नहीं 
इस तरफ हैं ग़रीब की रात जो नग्न हैं अँधेरे की आग़ोश में 
उस तरफ जश्न की रात जो रोशनी से नहाये न दिखे होश में
वे सावंतवादी रात से कम नहीं ये समाजवादी रात 
गरीबो को डसतीं रही हैं हमेशा ये पूस की रात
कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात

मैं भी आम आदमी हूँ पर मेरी परवाह नहीं 
इस जख्म में भी दर्द है पर अपनों का आह नहीं 
कहाँ गए वे कदरदान,अब किसी का दरस नहीं 
आवाम हूँ, ग़ुलाम नहीं, क्यूँ हम पर तरस नहीं
दिखे न आग जो मेरी ठंडक को जलाये 
कहाँ गए ओ शोले जो मेरे अरमानो को जलाये 
दो अखियन के अश्क़ इस सिहरन में कब तक प्यास बुझायेगी
सबनम तो अब आफत बनी हैं न जाने कबतक सितम ढाएगी 
 मेरी मायूशी पर जिसने अपने अरमानो का निकाले हैं बारात 
उनको  अब फुरसत कहाँ हैं जो जान सके मेरी जज़्बात
कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात


सत्ता के चकाचौंध में कब देखा उसने, ऐसी पूस की रात
आकर तो देखो मेरी उस ज़ंग को, कैसे मौत को देती मात 
फिदरत वही दिल में लिए बदल आये लिबाज़ 
 कोई तो अब रहम करो सुनकर मेरी फ़रियाद 
आखिर किसपर भरोषा करे इस बेमुरव्वत ज़हान में 
आ अब लौट चले अपने पुरखों के खेत खलियान में 

नहीं तो यूँही आती रहेगी ये क़यामत की रात 
क़हर बरपाती रहेगी हम गरीबो के साथ

कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात

 






शनिवार, 11 जनवरी 2014





राजनीती वास्तव में इतनी बदनाम है!!


आज़ादी के बाद देश में कई आंदोलन हुए  पर सभी आंदोलन के कोख से किसी न किसी पार्टी का जन्म हुआ, चाहे कुमुनिस्ट पार्टी हो या जनता पार्टी या आम आदमी पार्टी।  आंदोलन बस माध्यम बन चूका हैं राजनीती पार्टी की जमीन तैयार करने का,  यद्दिप ध्यान देनेवाली बात यह है कि आंदोलन के आढ़ में पार्टी तो बनायी जाती हैं कि जनता के मूलभूतं समस्याओं से छुटकारा दिलाने के हेतु पर ऐसा हुआ नहीं हैं अर्थात जो भी पार्टी बनायीं गयी जिसमें जनता के नाम को तो पार्टी के नाम में सम्लित करना नहीं भूलें परन्तु पार्टी के अस्तित्व में आने के बाद  जनता की समस्या को कौन सुध ले,  जनता को ही भूल जाते हैं। जनता के समस्याओं  को छोड़ अपनी स्वार्थ को पुरे करने में लग जाते हैं।

 

  जनता के हितेषी कहो या जनता दुःख चिंतक जो सत्ता के चकाचौधं में चौंधियाने से परहेज़ नहीं कर पाते, इसलिए तो  आजभी राजनीती से ज्यादातर साफ सुथरे लोग दुरी बनाये हुए हैं  क्यूंकि जो लोग अपनी ईमानदारी की डंका पीटते नहीं थकते पर जैस ही सत्ता पर काबिज़ होते, सभी कसमें - वायदे तोड़कर सत्ता का भोग भोगने के खातिर उसी के मुहाल में रम जाते हैं। शुरू में संयम का  कौशिश तो करते हैं पर लाख कोशीश के वाबजूद सत्ता के ऐशो-आराम से खुदको  रोक नहीं पाते। अतीत में झांके तो आज़ादी के आंदोलन के बाद महात्मा गांधी ने अपनी मनसा जतायी थी कि अब कांग्रेस पार्टी  को निरस्त कर देना चाहिए पर उस समय उनकी इस इच्छा को सबने सिरे से खारिज़ कर दिए क्यूंकि सबको भलीभांति पता था कि कांग्रेस पार्टी जिसका अहम् योगदान रही आज़ादी के लड़ाई में इसके इसी अहम् योगदान को देश की जनता कभी नज़र-अदाज़ नहीं कर पाएंगे। अन्तः लोगों का निस्ठा हमेशा कांग्रेस पार्टी के नाम के साथ जुड़ा रहेगा जिसके बुनियाद पर बिना मशक्क़त के सत्ता की स्वाद जखने को मिलता रहेगा।

 

 यही कारन हैं कि कांग्रेस पार्टी हमेशा सत्तारूढ़ पार्टी बनी रही और कोंग्रेसियों को लगने लगा कि उनके आलावा कोई और विकल्प इस देश के समक्ष नहीं हैं, जब इस तरह के सामंतवादी प्रवृति सत्तारूढ़ पार्टी यानि कांग्रेस पार्टी के कर्णोद्धार यानि उस समय के प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के जहन में पनपने लगे, उनके इस तरह के सामंतवादी प्रवृति और तानाशाह सरकार के खिलाफ जय प्रकाश नारायण का आंदोलन का आगाज़ हुआ।  लोग सरकार के तानाशाह रवैये से इस कदर खिन्न थे कि लाखो कि संख्या में रामलीला मैदान में इकट्ठा होकर सरकार के खिलाफ अपनी को आवाज़ को बुलंद किये जबकि उस समय न इतने मीडिया के रूप ही थे और न ही मीडिया आज के मुकावले इतने शशक्त थे फिर भी लोंगो का आक्रोश ही था जिसने सबको घर से निकालकर रामलीला के मैदान में खड़ा कर दिया। यही कारण आंदोलन ने क्रांति का रूप अख्तियार कर लिया और सत्तारूढ़ पार्टी को घुटने के बल लाकर खड़ी कर दिया। फलस्वरूप सत्तारूढ़ पार्टी सत्ता से बेदखल कर दिए गए।

 

  वर्त्तमान काल में जनलोकपाल आंदोलन का वही रूप देखने को मिला, जो अन्ना की अगुवाई में अपने अंज़ाम तक पहुँच ही गए। अभीतक देश में कई बड़े आंदोलन हुए जिसमें में इस सदी के कई क्रन्तिकारी ने अपने अहम् योगदान दिए जिन्हे कभी भुलाये नहीं जा सकते हैं।  इतिहास हमेशा उनके इस वलिदान और योगदान के लिए उन्हें शत-शत बार नमन करेगा और उनके इस उत्कृष्ट योदान के लिए उनको हमेशा इतिहास के पन्नो में सर्वोच्य स्थान दिए जाते रहेंगे। सचमुच में उन महापुरूषों के बिना भारत के लोकतंत्र का शायद स्वरुप ही पूरा नहीं होगा। जिनके सर्वेश्रेष्ठ योगदान से हम अपनी आज़ादी को अभी तक कायम रखने में कामयाब हुए हैं , जिनके आंदोलन से हमें प्रेरणा मिलता हैं लोकतंत्र में जनता से बढ़कर कोई नहीं पर जनता अगर चाहेगी तब। क्यूंकि लोकतंत्र में जनता किसी भी तानाशाह और भ्रष्ट सरकार को उखाड़ फेकने का दम ख़म रखती हैं बस इसके लिए एकता और जूनून की जरुरत हैं इसी कथन को जय प्रकाश नारायण ने चरित्रार्थ किये थे उस समय के तानाशाह सरकार को  खात्मा करके और सामंतवादी प्रवृति के लोगों से सिंहाशन हटा कर ततपश्चात राजनीती के एक नए अध्याय का शुरुआत की  गई ।

 

 पर इन्ही आंदोलन के इर्द -गिर्द कई राज भोगी और सत्ता के स्वार्थी ने भी राजनीती के धरातल पर अवतरित हुए हैं जिन्हो इस तरह के आंदोलन के दौरान अपना हित खूब साध सके। आंदोलन में मुलभूतं समस्याओ को निज़ात दिलाने का बिगुल फूकें गए थे यद्दिप वे समस्याए तकरीबन अभी तक ज्यों का त्यों हैं पर जो महानुभाव इस आंदोलन में सिपह -सलाहकार के भूमिका थे वे आज के राजीनीति के कदर दान बन गए। आनेवाले दिनों में जनता अपनी वही आस्था किसी आंदोलन के प्रति दिखा पाएंगे इसके बारे अभी शायद पूर्वानुमान लगाना मुमकिन नहीं हैं क्यूंकि सदेव उनकी आस्था से खिलवाड़ करने में सत्ता-भोगीयों ने कोई कसर नहीं छोड़े। किसी ने भर्ष्टाचार, किसी ने बेरोज़गारी, किसी ने मँहगाई,  न जाने इस तरह कई अहम् मुद्दे लेकर जनता के हितैषी के रूप में प्रगट हुए और जैस ही सत्ता के क़रीब पहुंचे सब भूल गए।



जिनके आंदोलन के कोख में राजनीती पार्टी का जन्म होता हैं और अचानक कुछ ही दिनों में वही पार्टी सत्ताधारी पार्टी बन जाती हैं। फिर भी जब उन महापुरुष को सत्ता में भागीदारी के लिए कहा गया तो यूँ विदक गए और अपने को किनारे कर लिए। क्या उनको आभाष था कि राजनीती एक ऐसी दरिया हैं जिसमें गोटा लगानेवाले  कीचड (दाग) रहित नहीं रह सकता ? इसलिए तो कभी सत्ता और सरकार के आस पास नज़र नहीं आये वे महापुरुष। यंहा प्रश्न ये उठता हैं कि राजनीती वास्तव में इतनी बदनाम है कारणस्वरूप ये महापुरूष इसमें कभी रूचि नहीं ले पाये या राजनीती वास्तव में ऐसी नीति हैं जिसमें नैतिकता और अनैतिकता के परिभाषा में ज्यादा भिन्नता नहीं हैं या राजनीती में शक्रिय होने से पहले ही अपने उसूलों, अपने जज़्बात और आदर्शवादी विचार को तिलाञ्जलि देना पड़ता है जिसे कोई निस्ठावान व्यक्ति हरगिज़ स्वीकार नही सकता अर्थात राजनीती में विवेक और निस्ठा के लिए कोई जगह नहीं हैं जो किसी आदर्शवादी व्यक्ति की पूंजी होती जिसे किसी भी हाल में वह खोना नहीं चाहते।



ऐसा तो नहीं होता है कि राजनीती के आस पास इतने सारे सुख सुविधायें  अथवा सहूलियतों का भरमार हैं कि लोग न चाह कर भी खुद को ज्यादा दिन तक वंचित नहीं रख पाते हैं जैसे कि भरपेट भोजन किये हुए व्यक्ति के सामने छप्पन  परोसें लगा दिया जाय तो न चाह कर भी उनके मन में कुछ खाने का भूख जग ही जाते हैं।  इसीप्रकार हमारे नेता जो कि निस्ठा के साथ तो गद्दी तक पहुंचते हैं पर वंहा पर जाकर वह छप्पन परोसें अर्थात अनेकों सुख सुविधायें को देखकर उनके निस्ठा डगमगाकर दिल के इसी कोने में लुढक जाते हैं और लालच की  भूख के अधीन होकर सब कुछ करने लगते हैं जो एक निस्ठावान व्यक्ति कभी भी नहीं कर सकते।  वेसे भी राजनीती में मुख्यः दो तरह के लोगो ही ज्यादा मिलेंगे जिसमें एक जो  सुख सुविधाओं के आदि होते हैं जो इसको पाने के खातिर कुछ भी कर सकते हैं दूसरे जो सुख सुविधाओं को देखकर कर खुदको रोक नहीं पाते अन्तः  इसको पाने के खातिर कुछ भी करने के लिए राज़ी हो जाते हैं। 

 

  बुद्धजीवियो का मानना हैं कि लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए सरकार के प्रति आस्था रखना चाहिए अर्थात जनता का दायित्व होता हैं कि तंत्र और व्यवस्था का सम्मान करे और अनुकरण करे नहीं तो आराजकता फ़ैलने का खतरा होगा। लेकिन इस तरह के जन प्रतिनिधि सरकार में सम्लित किये जाते रहेंगे जो जनता को झूठी अस्वासन देकर  उनके उम्मीदों पर बरसो से पानी फेरतें आये है, जो आंदोलन के बहाने अपने हित साधने से वाज़ नहीं आते, जो भर्ष्टाचार, मंहगाई और बेरोज़गारी जैसी मूलभूतं समस्याओं से छुटकारा नहीं दिला पाये आज़ादी के ६५ साल बीत जाने के वाबजूद, क्या इस तरह के नेताओ से आवाम का भला होगा क्यूंकि राजनीती के कदरदानों ने लोकतंत्र का परिभाषा ही बदल दिए?,  दरशल में  उनको ये बहम  हो गया कि जनता के मूलभूतं समस्याओं को हल कर दिए गए फिर जनता किस मुद्दा के आधार पर अपनी प्रतिनिधित्व का हक़ उनको देगी। मसलन जबतक  जनता के मूलभूतं समस्या जीवित रहेगी तबतक सत्ता के स्वार्थियों को आवाम के प्रतिनिधित्व की दावेदारी बरकरार रहेंगी। लेकिन इतिहास हमेशा अपनो को दोहराता हैं और कोई भी समस्या अति से अत्या के मापदंड को नाप लेता है अर्थात संतृप्तीकरण विन्दु से ऊपर चली जाती ऐसी स्थिति में समस्या का अंत होना सुनिश्चित है यही हमें प्रकृति सिखाती हैं। 


रविवार, 5 जनवरी 2014


 अन्तोगत्वा, "आप" और कांग्रेस के बीच अनैतिक गठजोड़ हो ही गई !

"आप" और कांग्रेस के बीच का गठबंधन क्या अनैतिक हैं ?, यह प्रश्न तो उठना लाज़मी हैं क्योंकिं यह प्रश्न दिल्ली के हर एक जनता के जहन में हिचकोले ले रहे होंगे, जिन्होने अबकी बार दिल्ली चुनाव में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और अपना मतदान किया। नेता जो अपने उसूलो से समझोता करने में कभी हिचकते नहीं और न ही कोई  अभी तक अपनी पार्टी के उसूलो का मापदंड निर्धारित कर पाये हैं। नतीजन सत्ता के गलियारो तक का पहुंचने  का सफ़र हो या फिर सत्ता हथियाने के लिए जोड़-तोड़ करना, कभी भी सैद्धांतिक माप दंड पर उतरना किसी भी पार्टी या नेता के लिए असहज रहा हैं फलस्वरूप जिनके विरुद्ध में, जिनके नीती के विरुद्ध चुनाव लड़ते हैं बाद उन्ही पार्टी के साथ गठबंधन करके उन नेता के खेमे में जाकर बैठते हैं, जिस  नेता और पार्टी को अधिकाधिक जनता ने नक्कार दी थी। पर जनता के उस मलाल पर कभी आत्मा चिंतन नहीं कर पाते हैं कि जनता जो मतदान करती हैं, किसीके विरुद्ध में किसी पक्ष में, जिसके विरुद्ध वह मतदान करती है वजह कि उस पार्टी और उस पार्टी के नेता से खुश नहीं और जिसके पक्ष में मतदान इसलिए करती हैं  क्यूंकि उस पार्टी और उस  नेता से अपेक्षा रखती  हैं। क्या  पार्टियों का दायित्व यह नहीं होता कि जनता के मत को सम्मान करके अपनी -अपनी भूमिका को निभाए।

इस दिल्ली विधानसभा  का चुनाव में "आप" जो खुदको ईमानदार और आम आदमी के हित का ख्याल रखने वाली पार्टी के रूप में राजनितिक धरातल पर अवतरित किये जिसकी मुख्य उद्देश्य थी कि उस सत्तारूढ़ पार्टी के तानासाह और भर्ष्टाचार से निज़ात दिलाना इसलिए "आप" ने  मतदाता के नज़र में खुदको कांग्रेस का विकल्प साबित की और जनता ने इनकी यही खुबियो को देखकर अपना फैसला "आप" के पक्ष में दी और "आप" से अपेक्षा रखी कि सत्तारूढ़ पार्टी के तानासाह और भर्ष्टाचार से उन्हें मुक्त कराये। लेकिन सत्ता के भूख के आगे किये गए सभी वायदे और सिद्धांत दम क्यूँ तोड़ देते हैं ? इस सवाल का जवाब ढूढ़ना कतई आसान नहीं हैं आज की राजनीती परिवेश में जहाँ सिद्धांत सिर्फ दिखावे के लिए होता हैं जबकि जनता सिर्फ वोट बैंक बनके रह गयी हैं। "आप" एक ऐसी पार्टी जिसमें ज्यादातर नेता नौसिखुआ और जिन्हे राजीनीतिक उठा पटक की अ आ सीखना बाकि हैं इसीलिए तो वे न राजभोग के आदि और न ही उन्हें सत्ता के भूखे। सबकुछ अनुकूल होते हुए भी अरविन्द केजरीवाल ने खुदको संयम से काम लेने के वजाय अपने को उनके ही बीच में लाकर खड़ा कर लिए जिनके लिए नैतिक और अनैतिक में ज्यादा फ़ासला नहीं दीखता। वास्तविक में अरविन्द केजरीवाल को अपनी टीम के साथ उसी सिद्धांत पर टिके रहना चाहिए जिसके बुनियाद पर यंहा तक का सफ़र तय किया था पर अफसोश उन्होंने अपनी राजीनीतिक पहला कदम ही समझोता के पायदान पर रखा आगे क्या करेंगे जब इन्ही टीम के लोंगो में सत्ता का भूख विद्दमान हो जायेंगे और राज भोग के आदि भी हो जांएगे?, जबकि इनदिनों इनके पार्टी में सत्ता के भूखे लोगो का आने का सिलसिला शुरू ही हुआ हैं।  लालू हो या मुलायम नजाने कितने लोग राजीनीतिक पृष्ठ-भूमि पर इसी नियत के साथ कदम रखा कि वे ईमानदारी और सच्चाई से जनता का सेवा करेंगे पर ज्योहीं राजीनीतिक पृष्ठ-भूमि पर चलना क्या सीख लिया, ईमानदारी और सच्चाई को पीछे छोड़ सिर्फ सत्ता का भोग का लुप्त उठाने के लिए  दौड़ने लगे, ऐसे लोग कितने मजे से सत्ता का लुप्त  उठाते हैं, ये जगजाहिर हैं। 



जनता जब किसी पार्टी के पक्ष में खड़ी होती हैं तो तन, मन,  धन के साथ इसीलिए तो "आप " को चंदा के नाम पर करोडो रुपैये मिले, दिन रात एक करके  मुहीम में लगे रहे फिर अपना मत भी दिए। आखिरकार दिल्ली के चुनाव में "आप " ने अपनी परचम लहराई पर जादुई आकड़े से जरुर पीछे रह गयी। अन्तः  सत्ता पर काबिज़ होने के लिए गठबंधन की आवश्यक्ता पड़ी।  एक तरफ ना -ना "आप" कर रही थी वही दूसरी तरफ अपनी छवि को सुधारने के ललक में कांग्रेस  ''आप '' के तारणहार के भूमिका में बिना बिलम्व किये अपना समर्थन की चिट्ठी उपराज्यपाल को थमा दी। जँहा कांग्रेस अपनी गिड़ती साख को बचाने  के लिए "आप" को समर्थन दी वही "आप"  भी जाहिर नहीं होने दी कि उनको कांग्रेस की समर्थन जरुरत हैं।

( मैंने एक ब्लॉग लिखा था ३०  नवंबर को जिसमें मैंने "आप" और कांग्रेस के बीच गठबंधन के आसार का जिक्र किया था और अन्तः हमने जो लिखा था वह सही साबित हुआ।)

अरविन्द केजरीवाल का साख,  समर्थन के  पहले और बाद का  शायद  एक जैसा न हो क्यूंकि दिल्ली की जनता बीजेपी के विरुद्ध नहीं ब्लिक कांग्रेस के विरुद्ध मतदान किये थे हालाँकि बीजेपी के सबसे ज्यादा विद्यायक जीतकर आने के वाबजूद  मेजोरिटी से चार सीट पीछे रह गयी। इस चुनाव के परिणाम से अर्थ तो यही  लगाया जा सकता है कि दिल्ली के चुनाव में "आप" हो या बीजेपी दोनों में से किसी एक पार्टी को भी पूर्ण वहुमत नहीं मिली क्यूंकि ज्यादातर जनता दोनों पार्टी में से श्रेष्ठ कौन सी पार्टी हैं यह तय नहीं कर पाई जबकि सभी ने कांग्रेस को नक्कार दी इस परिस्थिति में कांग्रेस के साथ मिलकर कर सरकार चाहे बीजेपी हो या "आप" कोई भी बनाती हैं तो इसका यही मतलब निकला जा सकता हैं कि पार्टी को किसी से भी परहेज़ नहीं, चाहे क्यूँ न जनता से वहिष्कार किये गए पार्टी हो। अरविन्द केजरीवाल  की  सरकार जिसे विस्वास मत तो हासिल हो गयी पर ये सरकार को दीर्घायु बनानी अभी भी  आसान नहीं हैं। कांग्रेस और "आप" के बीच में जिस तरह का वाद-विवाद हो रही हैं इससे तो यही अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं कि ६-१२ महीने  से ज्यादा सरकार नहीं चल पायेगी अगर अरविन्द  केजरीवाल इस परिस्थिति में सरकार को एक साल से जयादा चला लेंगे तो बड़ी उपलब्धि मानी जांएगी। बायदवे, मध्यावि चुनाव के नौबत में अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के जनता के बीच में जाकर क्या कहेंगे?, जब जनता उनसे पूछेगी कि भेजा था तुम्हे वहाँ जाकर सिस्टम को दुरुस्त करने पर तुम खुद वहाँ जाकर उन्ही सिस्टम का हिस्सा बन गए, जिसे दुरुस्त करना था उस समय के लिए, केजरीवाल साहेब, अभी से ही ताना -बाना बुनना शुरू कर दीजिये नहीं तो आसान नहीं होगा दिल्ली की जनता को समझाना क्यूंकि दिल्ली में पानी और बिजली कभी इतना बड़ा मुद्दा था ही नहीं जिसके लिए आपको जिताया गया। यदि दिल्ली की जनता में आक्रोश थे तो भर्ष्टाचार और कांग्रेस के उस तानासाह रवैये को लेकर जिसके शिकार जनता के साथ -साथ हर आंदोलनकारी थे जो कभी भी कांग्रेस के खिलाफ बोलने की  ज़ुरत की चाहे वे अन्ना हो या रामदेव बाबा या दिल्ली के आम आदमी। अधिकतर लोंगो का यही मानना हैं भर्ष्टाचार एक ऐसी क्षय  रोग हैं जिसके गिरप्त में जनता के हर बुनियादी सुविधा ह, जैसे ही भर्ष्टाचार मुक्त समाज और व्यवस्था होंगे अपने आप सभी रोग मिट जायेंगे।  हैरतंगेज़ नहीं होंगे "आप" को जब लोग उन्ही के कतार में  ला कर"आप" को भी खड़ी करेगें, आखिर कोई भी,  कितना भी मूर्ख क्यूँ न हो पर जिस तना पर बैठे  होते हैं उनके ऊपर कुल्हाड़ी नहीं चलाते फिर कैसे लोग ये उम्मीद करेगा कि "आप"  कांग्रेस के हाथ थाम कर "आप" कांग्रेस के गिरबान को नापेंगे? इस बात से प्रायः कोई भी इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता अर्थात कांग्रेस 'आप" को समर्थन देकर अपनी भूल का भरपाई करके जनता के बीच यह मेसेज देने की  कोशिश की जनता के हित को मद्देनज़र रखते हुए "आप" को समर्थन दी जा रही हैं ताकि "आप" जनता के उम्मीद पर खड़े उतरे पर "आप" जनता के उम्मीद पर खड़े उतरती हैं जब भी उनका श्रेय कांग्रेस ही लेगी और जनता के उम्मीद पर "आप" खड़ी नहीं उतरती तब भी कांग्रेस यह कहने से बाज नहीं आएगी कि उन्होंने तो "आप" को समर्थन दिया पर "आप" में ही काविलियत नहीं थी जो जनता के उम्मीद को पूरा करे क्यूंकि इन्होने सिर्फ वोट लेने के लिए लोकलुभावने  वायदे किये जो कभी पूरा  नहीं किया जा सकता था।

दरशल में "आप" का भला कंही होते नहीं दिख रहा हैं,हो सकता कि फिर एक चमत्कार हो और "आप" के पक्ष में सब कुछ  कर दे। वेसे भी  "आप" एक चमत्कार का ही देन और इतने कम समय में इतनी लम्बी छलांग लगाना  भी एक चमत्कार से कम नहीं । जाहिर है कि हमेशा "आप" चमत्कार चाहेगी पर ये भी मुमकिन नहीं हमेशा चमत्कार "आप" के लिए हो। फिर शायद याद रखियेगा कि यही शब्द फिर दोहराएगा कि जीत ईमानदारी और सच्चाई की हुई हैं। 

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014


ममता तेरी ममता किस काम का !!

क्या राजनीती में लोग इतने नीचे लुढक सकते हैं शायद उस पायदान के बाद मानव और दानव के बीच में कोई फ़र्क़ शेष रह नहीं जाता हैं। पर इनदिनों राजनीती करनेवाले इनसे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते क्यूंकि किसीकी लुटती अस्मत में भी उनको साज़िस की बू आती हैं,  किसी के मौत में भी उन्हें विपक्षी के चाल नज़र आती हैं।

जी हँ, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री साहिबा यानि ममता बेनेर्जी को तो यही दीखता हैं उनके विरोधी उन्हें बदनाम करने के लिए उनके खिलाफ साज़िस कर रहे हैं।  ममता जी, आप  तो औरत हैं क्यूंकि औरत ही माँ भी होती हैं, सचमुच औरत ममता के प्रतिक होती हैं पर आपके इस बयां से जरुर औरत के रूप पर प्रश्न चिन्ह लग गया होगा क्यूंकि यह बात कोई और कहता तो शायद इतना दिल को नहीं छूटा पर आप ?



२४ परगना के मध्यमग्राम में एक और निर्भया के अस्मत को सर्मसार ही नहीं ब्लिक उनको जिस कदर आग के हवाले कर दिया गया,  इनसे यही कहा जा सकता हैं कि हेवानो के होसला इतना बुलंद क्यूँ हैं?,  कि इस तरह के कुकर्म करने से पहले और कुकर्म करने बाद भी डर का लेशमात्र  नहीं उन सबके जहन में यदि होता तो अपराध को दुहराने का जुरअत नहीं करते और ना ही उस मासूम को आग में जला देते।  पुलिस का जो रवैया देखा गया इससे बिना शक़ कहा जा सकता है कि प्रान्त की सरकार और उनकी पुलिस तंत्र भी इस घिनोने अपराध में बराबर के शरीक़ रहे हैं  जिस प्रकार अपराधियो को मदद की गयी चुप्पी साध कर अन्यथा पीड़िता के शिकायत के ऊपर अतिशीघ्र करवाई करी होती तो शायद पीड़िता कि जान बचायी जा सकती थी। प्रशासन के नापाक कोशिश के चलते ही पीड़िता को अपनी जान की आहुति देनी पड़ी पर व्यवस्था जिसे लकवा मार गया है उस क्या फ़र्क़ पड़ता है ? अन्यथा १६ दिसंबर २०१२ के बाद पहली और आखिरी घटना तो यह नहीं हैं वस्तुतः १६ दिसंबर २०१२ के बाद लगभग देश  में हज़ारो घटना घटे मसलन कुछ तो हाई प्रोफाइल घटना थे जो मीडिया द्वारा हाईलाइट करने के बाद उनके जाँच में चुस्ती तो दिखाई पड़ी, बाकि को रफा -दफा कर दिया गया या तो ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया।



न ही कोर्ट अभी तक  इस घटना का संज्ञान लिया और न ही केंद्र सरकार के कोई नुमाइंदो इस घटना को संजीदीगी से लिया। राज्य के मुख्य मंत्री जबतक विपक्ष में बैठती  थी  तब के तेवर और आज के तेवर को देखकर यही कहा जा सकता हैं कि हाथी के दांत और लोगो का बर्ताव दिखाने के लिए और उपयोग काने के लिए अलग -अलग होते।  काश यही  घटना दिल्ली शहर में होती और ममता बेनेर्जी  दिल्ली की मुख्यमंत्री होती तो शायद ओछी बात कहकर इतने आसानी से अपनी जिम्मेवारी से भाग नहीं पाती।

आखिरकार ममता के ममता किस काम के जब उनकी राज्य में एक तरफ लोगो का मेहनत की कमाई लुटी जाती हैं और दूसरी तरफ मासूम- लड़कियो की अस्मत लुटी जाती हैं। 


दिल से न जाने कितने तरप एक साथ निकले,
हर तरप में न जाने कितने दर्द छुपे थे,
दर्द बेजुबाँ फिर भी एक सवाल लिए हुए
ममता, तेरी ममता किस काम का !!


गुरुवार, 2 जनवरी 2014



  नेता हो या अभिनेता  मीडिया के सामने सब बोने है !


 "प्रभु, मुझे मार्ग दर्शन करे, मैं कितना भी प्रयास करता हूँ पर सफलता के स्वाद चखने से हमेशा वचिंत रह जाता हूँ। कोई ऐसा उपाय बताये जो मेरे प्रयास  को सार्थक बनाये ताकि मैं भी कामयाबी के मंजिल को अतिशीघ्र पाऊ।"
 "अति उत्तम, परन्तु पुत्र मैं माध्यम और दिशा बता सकता हूँ कि मंजिल किस दिशा में हैं परन्तु  चलना तो तुम्हे ही पड़ेगा " बड़ी विन्रमता से उन्होंने कहा।
"प्रभु , आप मार्गदशन तो कीजिये, चलने के लिए तैयार हूँ '' मैंने उतसुकता से आग्रह किया।
"वत्स, आज का  युग  दिव्य दर्शन से ज्यादा दूरदर्शन का हैं, इनदिनों दिवाइन ज्ञान के साथ -साथ  ऑनलाइन ज्ञान का भी आवश्यक्ता हैं , पुत्र, आज मेरे  जितने फोलअर हैं उनसे कंही ज्यादा  इन मीडियाओ का फोलअर हैं। अतः ऐसा कुछ कर जिसके चलते मीडिया के तेरे ऊपर नज़र पड़े बस देखो कुछ ही दिनों में ही सफलता आकर तेरे सामने नतमस्तक होंगे और कामयाबी तुम्हारे कदमो को चूमेंगे। "
"प्रभु, क्या सचमुच सम्भव हैं?'' मैंने हैरानी से पूछा।
"हँ वत्स, इस आधुनिकता में मीडिया ही हैं जिसके बल पर सबकुछ मुमकिन हैं। अपने आस पास  नज़र तो दौडाकर देखो, अज्ञानता की जो पट्टी बांधे हो अपने आँखों पर, उसको खोल। " "
"जैसे, प्रभु !" मैं फिर हैरानी से पूछा।
"देख, अन्ना का जनलोकपाल आंदोलन, वे कौन हैं जिसके बलबूते एक छोता  सा  आंदोलन इतना  बड़ा रूप अख्तियार कर लिया जो करोड़ो लोंगो को एक साथ लेकर आये,  इस आंदोलन से पहले अन्ना को एक प्रान्त से बाहर कोई जानता तक नहीं था पर इस आंदोलन के बाद आज अन्ना पुरे देश प्रतिनिधित्व् कर रहे हैं, उनकी एक आवाज़ पर लाखो का हुज़ूम एकत्रत हो जाते हैं। ये चमत्कार जो हुआ इसमें मीडिया का ही अहम् योगदान रहा  हैं। अरविन्द केजरीवाल जो दिल्ली के इनदिनों मुख्यमंत्री हैं उन्ही अन्ना के सिपह -सलाहकारो में से एक थे पर मीडिया की मेहरबानी का ही नतीजा हैं जो वे  दिल्ली के गद्दी पर काबिज़ हैं। रामदेव बाबा का योग का परचम चारो दिशा में लहराना हो या निर्मल बाबा अंधविस्वास -तर्क का बढ़वा देना हो सब मीडिया का ही देन हैं अन्यथा इनके लीला इतने भी अवरम्पार नहींजो चारो दिशाओं तक फैला होता।  मीडिया का जो रुसूख ही है जिसके सामने किसी का भी ज़ोर  नहीं चलता। लोग कोर्ट से ज्यादा मीडिया से डरते हैं, पता तो होगा हाल ही का घटना, आसाराम बाबा जो भी एक मीडिया के ही क्षत्र - छाया में इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था, पर दिनों मीडिया की सुर्ख़ियों में अपने को पाकर बहुत ही दुखी हैं जघन्य अपराध के वाबजूद  लोगो का मोह उनसे भंग नहीं हो पाया था  पर मीडिया ट्रॉयल के बाद जरुर बाबा का सिंहासन डोल गया और लाख कोशिश के उपरान्त भी मीडिया ट्रॉयल को रोकने नहीं पाये । यहांतक कि सुप्रेम कोर्ट का  भी दरवाजा खटखटाया था मगर सभी जगह  बाबा के इस मांग को खारिज़ ही किया गया। नेता हो या अभिनेता  मीडिया के सामने सब बोने है चाहे मीडिया कितनी भी उनके टिप्प्णी करे पर वे मीडिया को ठेश सपने में भी नहीं पहुंचा सकते हैं। क्यूंकि मीडिया ही हैं जो उनको इस मुकाम को हासिल करने में अहम् कीड़दार निभाए हैं। मीडिया का साथ हो तो आम से खास बनने में देर नहीं लगते पर मीडिया की  कुदृष्टि शनि की  कुदृष्टि से भी ज्यादा प्रकोप वाली होती हैं क्यूंकि शनि की  कुदृष्टि का प्रकोप  सात साल प्रभावित करती हैं, पर मीडिया की कुदृष्टि उम्र भर प्रभावित करती हैं।  इसलिए मीडिया के शरण में जा और मनवांक्षित फल पा। "

इतने कहते ही वे दिव्य पुरुष न जाने कहाँ गायब हो गए?, इधर -उधर उनको ढूंढते मेरे आँख खुल गए। फिर ज्ञात हुआ कि मैं सपना देख रहा था पर उनके हर एक शब्द मेरे कानो से सेकड़ो बार टकराते रहे फलस्वरूप मैं सोचने पर विवश हो गया कि वे महापुरुष जो सपना में कह गए सारे उनके कथन सत्य हैं अर्थात यूँ ही।

वेसे भी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ की संज्ञा दी गई हैं पर आज से शक्त पहले शायद मीडिया कभी भी न था। इन दिनों मीडिया अपने अनेको रूप के साथ उस बुलंदी के शिखर पर पहुंचा हुआ हैं जिससे ऊपर लोकतंत्र में कोई नहीं हैं। प्रिंट मीडिया, इलेकट्रोनिक मीडिया , सोशल मीडिया इनके मुख्य तीन रूप हैं इनमें इलेकट्रोनिक मीडिया सबसे अहम् हैं पर जिस कदर सोशल मीडिया फल फूल रहा हैं वे दिन ज्यादा दूर नहीं जब अपने अन्य रूप को पीछे छोड़ ये आगे निकल जाये।

 स्पर्धा के परिवेश में जंहा ताज़े और मसालेदार ख़बर पडोसने का होड़ लगे हैं उसमें गुणवत्ता का कोई मापदंड और मानदंड चिन्हित करना बहुत ही कठिन हैं।  भौतिकता के इस दौड़ में पत्रकारिता सिर्फ व्यवसाय बन चूका हैं वजह हर खबर की बोली लगती हैं उसमें दर्शक(जनता जनार्दन) के सरोकार को ध्यान में रखना कतई मुमकिन नहीं हैं। आज की  इस बज़ारीकरण में सबकुछ  बिकता हैं और बेचने का माध्यम ही मीडिया हैं ऐसे हालत में मीडिया के लिए भी सहज नहीं  हैं की खुदको बाज़ार से दूर रखे। यही कारन है कि TRP के खातिर अथवा विज्ञापन के खातिर उन्ही समाचार के इर्द -गिर्द घूमते हैं जिनकी कीमत कॉर्पोरेट हाउस ज्यादा से ज्यादा देने के लिए राजी हो। परन्तु यह भी सत्य नहीं है कि सभी के सभी एक ही पथ पर अग्रसर हैं अर्थात इन परिवेश में भी  ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ पत्रकार हैं  जो पत्रकारिता जीवित रखे हुए हैं, जो खड़ी और सच खबर को ही आगे करने के लिए  कटिवद्ध हैं जो खबर के साथ किसी भी हाल में छेड़ -छाड़ नहीं करते, ईमानदारी से खबर प्रस्तुत करने से कभी हिचकंते नहीं हैं। 

 चाहे आज़ादी की लड़ाई हो या जय प्रकाश का आंदोलन हमेशा से मीडिया ने अपना भूमिका बखूबी निर्वाह किया हैं, इसका  परिणाम हैं कि आपातकाल के दौरान भी सबसे पहले मीडिया और मीडिया से जुड़े हुए लोग पर पावंदी लगायी गयी थी, उसके बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगा दी। मीडिया किसी भी देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अहम् हैं जहाँ सरकार  को सोचने के लिए बाध्य करता हैं कि सरकार की हर फैसला में जनता का हित का ख्याल रखी जाय वंही जनता की बात को भी सरकार तक पहुचने में मीडिया का ही महत्वपूर्ण भूमिका होता हैं।
 
प्रिंट मीडिया और इलेकट्रोनिक मीडिया जिस पर सरकार और कॉर्पोरेट हाउस की दखलंदाजी को  किसी भी हाल में सिरे से खारिज़ नहीं किया जा सकता पर सोशल मीडिया जिस पर सरकार का नियंत्र नाममात्र भी नहीं हैं। वस्तुः इनदिनों लोगो की पहली पसंद सोशल मीडिया ही माना जा सकता क्यूंकि यह एक ऐसा मंच हैं जो बिना भेद भाव किये हर किसीको अपनी बात रखने की खुली  छूट ही नहीं ब्लिक उस बात को उनसे इत्तफ़ाक़ रखनेवाले के बीच पहुँचाने में भी मदद करता हैं। दरशल में सोशल मीडिया एक ऐसा जरिया हैं जिनका दायरा इतना अत्यधिक  हैं कि आसानी से तय नहीं किया जा सकता है, जो सभी बंधन तोड़कर और सभी विभिन्नता  को दरकिनार कर एक मंच पर लाकर खड़ा कर देता हैं। इसलिए तो युवा हो या प्रोढ़ या वुजुर्ग सबका पहला पसंद सोशल मीडिया ही हैं। इस पसंद को देखकर ही बड़े से बड़े सेलिब्रेटीज हो या राजनेता इनसे ज्यादा दिन दूर नहीं रह पाते । यही कारण हैं कि चुनाव का प्रचार हो या किसी मुहीम का प्रसार इनके लिए सोशल मीडिया का उपयोग करने को कोई भी भूलते नहीं।

 जैसे सिक्के का दो पहलु होते हैं, उसी तरह मीडिया के बढ़ते इस प्रभाव के भी अपने फायदे और गैर फायदे हैं जंहा एक तरफ लोकतंत्र में पारदर्शिता लाता हैं और अभिव्यक्ति की आज़ादी को सजीवन देता हैं पर  दूसरी तरफ मीडिया अपनी दायित्व को नज़रंदाज़ करके इस स्पर्धा की परिवेश में अपना पकड़ कायम रखने के लिए खबर के साथ समझोता करना शुरू कर देते हैं तो ऐसी परिस्थिति में इसका दुष्परिणाम इतना भयानक होगा जो समाज के जड़े को उखाड़ फेकेंगे चाहे जड़े कितने भी गहरे में क्यूँ न हो और लोकतंत्र के बुनियाद को हिला देंगे जो कभी भी स्वीकारा नहीं जा सकता। इस विषम परिस्थिति से बचने के लिए मीडिया हाउसेस को चाहिए को खुद ही एक लक्षमण रेखा खींचे और उसीके दायरें में रहकर काम करे।