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गुरुवार, 29 मई 2014





 चुनाव परिणाम का साइड इफ़ेक्ट जारी है …!!





मोदी ने ममता और जयललिता को संकेत दे दिया है कि सुधर जाओ वर्ना देश की राजनीती में शून्य से ज्यादा अहमियत नहीं मिलनेवाली है इसीलिए तो उनकी ख़ुशीका परवाह किये बिना बंगला देश के प्रधानमंत्री और श्रीलंका के राष्ट्रपति को सादर आमंत्रित किये और सम्भावना है कि वे खुद व उनके प्रतिनिधि सपथ समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज करेंगे। बेचारी ममता और जयललिता अपने -अपने प्रान्त में जीत का परचम तो लहराया पर दिल्ली के गलियों में फिर भी कोई उन्हें भाव देने को तैयार नहीं। हालाँकि ममता को यह भलीभांति ज्ञात है कि दिल्ली में उनकी लोकप्रियता के नाम पर ५०० लोग भी इकट्ठा नहीं सकते और ऐसा ही हुआ था जब उन्होंने आम चुनाव से पहले अपनी ताकत का प्रदर्शन करने की गुस्ताखी की थी। बरहाल दिल्ली में मोदीजी के ताजपोशी के तैयारी जोरो पर है।  ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------


कांग्रेस के बड़े -बड़े पहलवान आम चुनाव के दंगल में चित्त हो गए है। एक तरफ सोनिया गांधी को कुछ सूझ नहीं रहा हालाँकि राहुल गांधी अपनी काबलियत का दिलाशा देकर अपनी माँ को सान्तवना देने का पुरजोर कोशिश में लगे है तदोपरांत माँ को उनके क्षमता पर यकीन नहीं हो रहा है और अन्य विकल्प को लेकर आत्मचिन्तन कर रही है। इन्ही गहमा -गहमी के बीच कई बकरे तैयार किये जा रहे है जो राहुल गांधी के दीर्घायु और पुनः खोये हुए ताकत को सृजन के खातिर बलि दिए जाना है।  फिलहाल कांग्रेस कोर कमिटी ने आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हारका का घड़ा राहुल गांधी के बदले सबके सिरे फोरने पर हामी भर दिए है।  ऐसे में बड़े- बड़े बड़बोले को चुप करने के लिए रणनीति बनायीं जा रही है जबकि राहुल गांधी के नए सिपाह - सलाहकार के भर्ती के लिए यथाशीघ्र बिज्ञापन दिए जायेंगे क्यूंकि दिग्गी राजा  इन दिनों कंही और व्यस्त है जबकि बाकि चुनाव में जमानत जब्त करवा कर काफी हतोत्साहहित है इसीलिए ज्यादातर ने तो इंडोनेशिया और शेष स्विट्ज़रलैंड जाकर गहन सोच -विचार करने का मन बना लिए  है।  ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

आम चुनाव के पश्चात यदि सबसे ज्यादा नुकसान किसी भी व्यक्ति को उठाना पड़ा है तो वह नितीश बाबू जो पिछले महीने तक प्रधानमंत्री बनने के हसींन सपने देखा करते थे पर जब आँखे खुली तो सच्चाई से रूबरू होना ही पड़ा नतीजन प्रधानमंत्री बनने का सपना सपना ही रह गया जबकि हकीकत में मुख्यमंत्री के भी कुर्सी खिसक गई। बेचारे नितीश बाबू कल तो उनके गाल फूल जाता था अगर कोई किसी और व्यक्ति के तारीफ उनके सामने करते पर आज जो अपने वे भी इन्हे ही कोसतें है पर क्या करे?, सब कुछ बदल चूका है हालात भी और बात भी। वक्त का मारा हुआ सुशाशन बाबू उनके ही दामन थामे जिनसे २० साल पहले नैतिकता और वैचारिक टकराव के चलते अलग होकर समता पार्टी का गठन किये थे। जॉर्ज फर्नाडीज के आत्मा भी नितीश के करतूत पर जरूर खिन्न होंगे क्यूंकि उस विपरीत परिस्थिति में अकेला वही थे जो नितीश बाबू के साथ थे पर जब उनको नहीं बक्शा तो औरो को उनसे उम्मींद करना ही मूर्खता होगा। हालाँकि मांझी के सहारे उन्होंने अपनी नैया पार लगाने को सोच रहे है मगर मांझी के लिए भी इतना आसान नहीं है क्यूंकि एक नाव में लालू और नितीश दो सौतन ही मानों सवार है जिनकी मज़बूरी है कि किसी भी हालत में इस किनारे से उस किनारे जाना है अन्यथा अभी तक कमाए हुए रुशुख का मटिया पालित होना सुनिश्चित है जिसे ये दोनों इतने आसानी हरगिज़ नहीं जाने दें सकते है। हालाँकि अपने रुशुख को बचाने के चलते दोनों एक ही नाव पर तो सवार हो गए है लेकिन अंदेशा का गुंजाईश है कि कही मझधार में ये दोनों फिर से उलझ गए तो नाव का डूबना तय मानों फिर मांझी तमाशबीन बनके देखतें रह जायेंगे और लाख प्रयन्त करने के वाबजूद भी बचा नहीं पाएंगे। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------


 अब एक नज़र उत्तर प्रदेश पर जँहा भी राजनीती के खूब उथल -पुथल है। आज़म खान ने तो वेचारे बेजुबान होकर चुप्पी साध लिए है अब तो कई दिनसे कुछ कहने के हिमाकत नहीं किये है, उधर अबु आजमी तो इन दिनों सहमे-सहमे हुए है जबसे मिडिया ने उनके पुराने दोस्तों में से के एक का जिक्र छेड़ा है जो एक इंडियन मुजाहिद्दीन के आंतकी है नाम है फैजान, जिसको इस साल फरवरी में दुबई में गिरफ्तार किया गया था और इनदिनों यहांके खुफिआ एजेंसी के हिरासत में है। मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को कुछ खरी -खोटी सुनाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बरक़रार रखा यद्दीप जितने भी जिला और ब्लॉक स्तर के पदाधिकारी थे उनको नहीं बक्श पाये हालाँकि ३६ ऐसे सर्वमान्य लोगोंको भी लालबत्ती उतारने के लिए फरमान जारी कर गए, अब देखना है कि उनके फरमान को ज्यादा तज़्ज़्वो उनके ही गणमान्य नेताओं देतें है अथवा अन्दरन्दाज करके खारिज करते है। ख़ुशी की बात यह रही कि आम चुनाव में बेशक सपा को पांच सीट ही मिल पाये हो पर मुलायम सिंह यादव के परिवारका का उत्तर प्रदेश के राजनीती में दबदबा अभी भी कायम है नतीजन पांच सीट ही सही पर परिवार के कोई भी सदस्य हार की मुंह नहीं खायी। 

दरअसल में हाल के आम चुनाव में ने तो अनेकोअनेक दिग्गज और दल ने अपनी साख और धाख गवां चुके है पर बसपा का तो जो हाल हुए है शायद मायावती कभी सपने में भी नहीं सोची होगी। सुफरा साफ़ हो गया यानि खाता ही नहीं खोल पाये जबकि चुनाव परिणाम के पूर्व कयास ये लगाये जा रहे थे की यदि किसी भी गठबंधन को न बहुमत मिलने के आसार में यदि थर्ड फ्रंट सरकार बनाने का दावा पेश करता है तो प्रधानमंत्री के रेस में बहन मायावती भी सुमार है पर इस तरह का परिणाम होगा ये किसी ने भी सोचा नहीं। मायावती इनदिनों अपनी खीश कांग्रेस पर निकाल रही है जो किसी भी दशा में तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है। वास्तविक में धर्म निरपेक्ष के आध में सियाशी मेवा सब खाने के लिए लार टपका रहे थे पर जनता ने उनके मनसूबे पर पानी फेर दिए तो एक दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप लगाने पर आमादा हो गए। 
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 आआपा के संयोजक माननीय केजरीवाल हाल के आम चुनाव में पराजित होकर इस कदर सर्मसार हो गए है कि लोगों से आँख मिलाने से बेहतर जेल में ही रहना पसंद कर रहे है अन्यथा उनको ये पता होना चाहिए कि देश में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है ऐसे में वे खुदको क्यों कानून से ऊपर समझ रहे है? इसके ऊपर बुद्धजीवियों का आत्मंमंथन जारी है और अतिशीघ्र केजरीवाल के मंसूबा जगजाहिर होंगे पर लोगों ने उनका सुनना बंद कर दिए इसीका नतीजा है जिन केजरीवाल के लिए ज्यादातर दिल्ली वासी सड़क पर उतर जाते थे आज उनके अपील को अनसुना कर रहे है। वाकये में केजरीवाल के अच्छे दिन गए लोगो को उनका मौकापरस्ती ही दीखता है इसीलिए लाख प्रयन्त के वाबजूद लोग उनके झांसे में नहीं आ रहे है। केजरीवाल वास्तविक में जनाधार और लोकप्रियता पर खुद ही ग्रहण लगा गए।  दिल्ली के लोगों ने उनको अपने आँखे और दिल में बैठने का जगह दिए पर लोगों को क्या पता था की दरअसल में केजरीवाल को सिर्फ जुबाँ पर बैठने की आदत है जो उन्हें दिल्ली में रहकर संभव होने वाले नहीं है इसीलिए तो अचानक दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर वाराणसी के तरफ कूच कर गए मोदी से दो-दो हाथ करने के लिए पर जितने उत्साह के साथ वाराणसी गए थे जब वापस आये थे उतने ही मायूस दिखे क्यूंकि जो भी था सब खो चुके थे हार-थक के उन्होंने गहन विचार करके दिल्ली में पुनः सरकार बनाने के लिए प्रयास में जुट गए पर कांग्रेस ने इस बार समर्थन देने से मना कर दी। आखिरकार कांग्रेस के सब कुछ पहले ही लूट गई और फिलहाल खोने के लिए कुछ भी नहीं है ऐसे में केजरीवाल को क्यों समर्थन दे?, जिनके बदौलत ही दिल्ली में अर्श से फर्श पर पंहुच गई। केजरीवाल को नितिन गडकरी के ऊपर अथवा अन्य नेता के ऊपर जो भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे इस तरह प्रतिकूल मौहाल में भारी पड़ रहा है क्यूंकि कसी भी आरोप को साबित करने के लिए सबूत की जरुरत होती जो केजरीवाल ने न्यायलाय के समक्ष नहीं रख सके, ऐसे में निजी बॉन्ड भरने के लिए न्याय उनको आदेश दिए पर वे इसके पक्ष में नहीं दिखें क्यूंकि उनको ये लगता है कि उन्होने आरोप लगाकर कोई गलती नहीं किये इसीलिए निजी बॉन्ड भरने का मतलब होता है कि उनका दोष साबित होना, यह केजरीवाल साहेब का मानना है। यदि केजरीवाल ने बिना सबुत के किसी के ऊपर आरोप लगाये है तो वास्तव में वे दोषी फिर भी अगर नहीं मान रहे है तो इसका एक ही मतलब होता है कि फिरसे लोगो का ध्यान अपने ऊपर आकर्षित करने के लिए निर्थक का ड्रामा कर रहे है जो लोगो को हज़म नहीं हो पा रहा है। यद्दीप हाल में मनीष तिवारी माफ़ी मांग चुके है क्यूंकि उन्होंने भी बिना सबुत के उन्ही व्यक्ति के ऊपर इसी तरह के आरोप लगाये थे जैसा कि  केजरीवाल साहेब लगा चुके है फिलहाल मनीष तिवारी के माफ़ी के बाद वह मामला उसी वक्त खत्म कर दिए गए। ऐसे में केजरीवाल क्यों नहीं संयम काम ले रहे और बिना तिल के तार बनाये हुए मामला ख़त्म करना चाहते है? 
सचमुच में केजरीवाल को भरम हो चूका है कि इस तरह के कारनामे को अंजाम देने से मिडिया का मुफ्त का पब्लिसिटी मिलेंगी जो दिल्ली के आगामी के विधानसभा के चुनाव में कारगर साबित होगा। बरहाल दिल्ली के आम आदमी बड़ी ही दिलचस्पी केजरीवाल के नौटंकी का लुप्त उठा रहे और बड़े ही उत्सुक से उनके आगे के खेल का इंतज़ार कर रहे है।








 अच्छे दिन वाकये में आनेवाले है !!


इस बार के चुनाव जँहा धर्मनिरपेक्ष के वकालत करनेवाले का हवा निकाल दिए वही जातिवाद के जरिये राजनीती के शीर्ष पर मौजूद आकाओ को भी लोगों ने बक्शा नहीं नतीजन बसपा, जदयू , सपा , राजद, सबको दहाई के भी अंक नसीब नहीं हुए जबकि बसपा अपनी खाता भी नहीं खुल पाये। कांग्रेस का तो लोगों ने ऐसा हाल किया कि कांग्रेस की कुर्सी भी गयी और विपक्ष में बैठने की औकाद भी गवांयी। असल में इसीको लोकतंत्र कहते है जँहा लोकशाही और तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं दीखता, वाकये में इस चुनाव के परिणाम ने बड़े -बड़े सुरमा को धूल फाँकने पर विवश कर गया। कई ने तो अपना जमानत जब्त करावा लिए तो कई ने सिर्फ अपनी साख गँवा कर बिल में घुस गए। बड़े -बड़े बड़बोले की बोलती बंद हो गए  अब तो पता ही नहीं चलता है कि यही वे है जो बड़े -बड़े डिंग हाकतें थे।

मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा था की मोदी लहर नहीं सुनामी चल रही है जिनसे आज़ाद भारत के लोकतंत्र के कई नए अध्याय लिखे जायेंगे फिर भी यह अंशका मेरे जहन में भी जरूर था कि यदि अल्पसंख्यक वोट नहीं मिला तो ऐतिहासिक जीत को पाना संभव होगा पर अन्तः मुमकिन हुआ क्यूंकि मेरा अंदाज़ा था की लोग इस बार जात -पात से ऊपर उठकर देश के विकास के लिए मतदान करेंगे और वैसा ही हुआ। मोदी के सुनामी में बड़े-बड़े राजनीती के चट्टान कहे जानेवाले के अरमान ढह गए। नितीश, माया, शरद पवार, मुलायम, लालू, करूणानिधि जैसे दिग्गजों का मटिया पलित हो गए या यूँ कहिये कि कांग्रेस के गोद में बैठे सभी को कांग्रेस के समेत मोदी के सुनामी ने बहाकर ले गई। जो केजरीवाल, शीला दीक्षित के विरुद्ध चुनाव जीतने से इस कदर गड -गड थे कि मोदी के सख्सयित को समझते हुए भी नज़र अंदाज़ करने की हिमाकत की नतीजन न खुद का साख बचा पाये और न ही पार्टी के साख बचा पाये मसलन दिल्ली में खाता भी नहीं खोल पाये विडम्बना तो तब हो गया कि इनके ज्यादातर शीर्ष नेता के  जमानत जब्त हो गयी।

शायद मोदी के लिए अब संसद में कुछ ज्यादा जद्दोजहद करने के लिए कुछ रह नहीं गया क्यूंकि सिर्फ और सिर्फ वह अपना पूरा ध्यान विकास पर ही केंद्रित रखेंगे। हालाँकि इनके लिए उन्हें ईमानदार और कर्मठ सदस्य के जरुरत पड़ेंगे जिन्हे वे खुद ही तलाश कर तराश सकते है। नई सरकार के विरासत में जो भी मिलनेवाला है मोदी को इनसे निपटने के लिए काफी मसकत करना होगा क्यूंकि मंहगाई के त्रासदी के बीच इस तरह कई फैसले लिए जाना बाकि है जो किसी हद तक मंहगाई को बढ़ायी गई न कि मंहगाई को काम करेगी। अन्तः लोग मंहगाई से पहले ही त्रस्त होकर मोदी के तरफ निहार रहे है की मंहगाई से निजात दिलाएंगे वैसे में मोदी को कई कठोर फैसले इस तरह के लेने होंगे जो कंही न कंही लोगो को आहात करेंगे इसलिए अब मोदी अपने सूझ-बुझ का किस तरह से इस्तेमाल कर लोगों के ऊपर मंहगाई का मार दिए बिना इन सभी समस्याएँ को दरकिनार कर अच्छे दिन आने का दस्तक सुनाएंगे, इस पर भी सबके पैनी नज़र है।

दरअसल में कांग्रेस सरकार ने जाते -जाते कुछ इस कदर के फैसले कर गए जो जनता के हिट में कतई नहीं है। कांग्रेस ने गैस का कीमत बढाने पर राजी थी बस चुनाव के चलते इसे रोके थे इसी कारण रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सरकार को लीगल नोटिस भी भेजा था परन्तु चुनाव के दौरान सरकार में बैठे आला अफसर हो या मंत्री इनको शायद आभास था फिरसे उनको मौका नहीं मिलने वाला है इसीलिए तो खामोश होकर आनेवाली सरकार के मत्थे मङने का काम कर गए।  दूसरी तरफ रेलवे ने भी यात्री किराये में भारी बढतोरी के सिफारिश अपने मंत्रालय को भेज रखे बस नई सरकार के गठन होते ही फैसला लिए जाना है। मोदी के लिए रेलवे मंत्रालय सबसे बड़ी चुनौती होनेवाली है क्यूंकि UPA-२ के कार्यकाल में ५-६ बार इनके मंत्री बदले गए थे, किराये में बेंतहा बढ़ोतरी के उपरांत भी सुरक्षा और सुविधा के नाम पर यात्री ठगा ही महसूस करते रहे जबकि इन्ही के मंत्रीको पद्दोन्नति के बदलें रिस्वत लेने का आरोप भी लगे है।  ऐसे में रेलवे मंत्रीके लिए योग्यता के साथ - साथ ईमानदारी भी जरुरी है ताकि इस तरह के आरोप से बचा जाय।

बरहाल देश के जनता को कांग्रेस के कहर की परेशान अभी तली नहीं है जबतक नई सरकार के द्वारा राहत के अनेको-अनेक कदमें यथाशीघ्र नहीं उठाई जाती है।  एक तरफ असुरक्षा जो लोगों के दिलो-दिमाग में पैठ बना लिया है उसके लिए कई कारगर कदम उठाने है और इसकेलिए सबसे पहले देश से बंगलादेशी को बेइज्जत निकालना होगा क्यूंकि बंगलादेशी ने देश के तमाम शहरों में तकरीबन पचास फ़ीसदी क्राइम को अंजाम देते है अगर इनको इन शहरों से भगाया जाता है तो शहर में पचास फ़ीसदी क्राइम में निश्चित कमी दर्ज़ होगी। अभी तक कांग्रेस हो, आआपा हो अथवा अन्य पार्टी वोट के लिए इनके हिमायत किया करते थे और इनको अपना सरक्षण देते रहे थे पर लोगों के लिए अच्छा होगा कि इन बांग्लादेशी को बिना बिलम्ब इस देश से बाहर का रास्ता दिखाया जाय ताकि इनको दिए जानेवाले सहूलियत देश के जनता को मिलें और देश जनता को इनके द्वारा रोजमर्रा के आतंक से राहात मिलें।
सुरक्षा के संदर्भ में सबसे पहले पुलिस सुधार कानून को लागु किया जाना अतयंत आवश्यक है, जिसका खाका पहले सी तैयार है क्यूंकि पुलिस को जब तक जवाबदेही और उनके काम काज को लेखा -जोखा के लिए निगरानी कमिटी नहीं बनाई जाती है तब तक लोगों के जहन से  असुरक्षा का भावना निकालना कदापि संभव नहीं है।

आखिकार जनता ने अपनी वोट को जिम्मेवारी और जवाबदेही के साथ प्रदान की है इसीलिए सरकार का अब दायित्व बनता है कि सरकार जनता के सपने को साकार करे और किये गए सभी वदाओं को पुरे करने के लिए अभी से कटिबद्ध हो जाये ताकि जनता को दिलाशा मिले की सचमुच में अच्छे दिन आने वाले है।

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सोमवार, 19 मई 2014


क्या अल्पसंख्यक समुदाय फिरसे मौका गवां दिए ?



 इन दिनों प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो अथवा सोशल मीडिया सब जगह यह आत्ममंथन करने में लगे है कि यदि मोदी लहर चल रह था, वाकये में इंदिरा गांधी के देहांत के उपरांत राजीव गांधी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवारी के सन्दर्भ में लहर देखा गया था उनसे भी बढ़कर था तो वह वोटो में तब्दील क्यों नहि हुआ ? वास्तविक में मीडिया के द्वारा एक्सिट पोल से लहर व सुनामी क आभाष  नहि किया जा सकता है पर ये भी संकेत दे रहे है कि एनडीए गंठबंधन को सरकार बनाने की मेजोरिटी मिल रही है जो आज के परिवेश में काफी है क्यूंकि पिछले दो दशक में किसी भी पार्टी को इतने सीट नहि मिलें जितने इस बार भाजपा को मिलता दिख रहा है।

दरअसल में मोदी लहर आजाद भारत में अभी तक के सबसे बड़ा सत्ता परिवर्त्तन का लहर है जिसमें सिर्फ बहुसंख्यक वोट एक मुस्त होकर किसी एक दल को मिला यदि अल्प् -संख्यक लोग भी भाजपा को समर्थन देते तो एक्सिट पोल तथापि एक्चुअल परिणाम १९८४ से चुनाव परिणाम के भाँति अव्वल ही होते है। इस चुनाव परिणाम से भाजपा और आरएसएस के पूर्णतः ज्ञात हो जाना चाहिए कि देश के अल्पसंख्यक क़िसी भी हाल में उनको वोट नहि दे सकते, यदि एक तरफ़ त्रासदी और तानाशाह देने वाली पार्टी हो जबकि दुसरे तरफ़ भाजपा हो तो ऐसे आफद के घड़ि में अल्पसंख्यक भाजपा को चित्त करने के लिये आफद और त्रासदी से प्रेरित पार्टी को ही वोट करेँगे।  फिर भी बिहार, उत्तर प्रदेश और पस्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक से उम्मींद सिर्फ दिल को तस्सल्ली देने के लिये ही  किया जा सकता है।

हालाँकि गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के अल्पसंख्यक में भाजपा के प्रति सकारात्मक रवैया देख जा सकता है जिस कारण उन प्रांतो में भाजपा क्लीन स्वीप कर सकती है। देश में अल्पसंख्यक क वोट लगभग  २० -२२ प्रतिशत है जो यदि एक पार्टी के पक्ष में दिया जाता है तो उन पार्टी को हराना कतई  आसान नहि है। चाहे क्षेत्रीय पार्टी हो अथवा राष्टीय पार्टी हो  अल्प-संख्यक  का वोट अगर उनके पाले में जाता है उन्हे जीत पक्की मानी जाती है। इसीलिए देश के जितनें भी क्षैत्रिय पार्टी वह खुदको धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़ा पुजारी के रुप में सैदेव अल्प संख्यक सामने पेश करते रहते है जबकि राष्ट्रीय शियाशी दल अनेकौ प्रकार के ताना -बाना बुनते रहते है ताकि अल्प संख्यक वोट किसी भी हाल में न खिसके। जबकि देश के अल्प संख्यक अपने एक मुस्त वोट सिर्फ़ भाजपा को हरानेवाली पार्टी को पड़ोसते आरहे है इसिलिये तो सिर्फ़ बार जाति और क्षैत्रिय स्वार्थ को छोड़कर पुरे देश एक सरकार का सपना देखेँ जो उन्हे विकास और समृद्धी की ओर ले जाए ऐसे में अल्प संख्यक समुदाय से भी सकारात्मक योगदान का आपेक्षा करना वाजिव था।

आज के परिदृश्य में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक मौजूदा सरकारके खिलाफ जो आक्रोश था उसीका  नतीजा है कि अल्पसंख्यक समुदाय के नकारात्मक झुकाव के वाबजूद भाजपा अपने पिछलें सभी रिकॉर्ड को ध्वस्त करके इस चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन करने जा रही है।  एक तरफ परिवर्तन के महायज्ञ में सबने बड़े उत्साह के साथ अपनी-अपनी आहुति देने क काम किये है फिर भी कोइ समुदाय चुक गये तो वह हो अल्प-संखयक समुदाय का बड़े तबक़े जो देश के इस बदलाव के बीच अपने व्यक्तिगत खीश को तज्जुब दी इन्हीके चलते देश के समृद्ध और संप्रभुता सरकार की  बात करने वाले लोगो को अनदेखी करके अपने बहुमूल्य वोट को उनको दें दिये जिनके कार्यशैली से तकरीबन समस्त देश हतोत्साहित थे।  यद्दिप इस चुनाव में अल्पसंख्यक के लिये एक बेहतरीन मौका था जिनको न कि खुद हि गंवा दिये ब्लीक एक बार फिर ये साबित कर गये कि उनके लिये देश से पहले उनका निजी हित ही सर्वोपरि है जिसे किसी भी हाल में छोड़ा नहि जा सकता है।

बरहाल १६ मई को पुरे आवाम को बड़े वेसर्बी से इन्तज़ार है जिस रोज रुझान वास्तविकता से रूबरू होंगे।  वस्तुतः  चुनाव परिणाम आने के बाद ही सरकार के शक्ति का  आँकलन करना मुमकिन होगा क्युँकी जितनें छोटी गठबंधन क स्वरुप होंगे उतने ही अपेक्षित और दीर्घायु सरकार का  कल्पना की जा सकती है और भावी सरकार के लिये भी सम्भव होगे कि जनता के उम्मीद पर बखूबी उतरने का प्रयास करेंगे।

मंगलवार, 13 मई 2014



ऐसे में सत्ता हाथ से कैसे छूटे………………………

टूटे मर्यादा तो टूटे 

रूठे अपनो तो रूठे 

बिन सत्ता के सब है झूठे

ऐसे में सत्ता हाथ से कैसे छूटे 

पतली गली से होकर 

सत्ता के गलियारी में पहुँचना आसान नहीं

भइया, सत्ता के गिरफ्त में सब 

अपितु सत्ता के खातिर इतना घमासान नहि 

सत्ता कोइ कामधेनु गाय नहि 

फिर भी बंधे है इन्हिके खुंटे

ऐसे में सत्ता हाथ से कैसे छूटे………………………

मंदिर हो या मस्जिद

भरे पडे है सत्ता के चाहनेवालो से

अल्ला हो या राम

उनको भी बाँट रहे है अपने सवालो से 

फिसल रहे है मुददा हाथोँ से 

अबकी बार तूँ - तूँ , मैं -मैं के ही बूते  

ऐसे में सत्ता हाथ से कैसे छूटे………………………

बनारस में जमबाड़े है दिग्गज का 

जनता को गर्मी में पिला रहे बिन दही के लस्सी 

कोई बाहुंबली तो कोइ सपने का सौदागर 

फांसने की करली तैयारी बस ज़नता ठामे रस्सी

सावधान, कोइ फिरसे आपको न लूते

ऐसे में सत्ता हाथ से कैसे छूटे………………………

सत्ता से है सबको प्यार 

सत्ता के दंगल में सब है, बुर्जग हो या बच्चे 

दागी से परहेज़ नहि 

चुनावो में तो दागी ही लगते है अच्छे 

खुदके हड्डी में जोर नहि, तो चल पड़े है बैसाखी के बूते 

ऐसे में सत्ता हाथ से कैसे छूटे……………………… 

बेचारे जनता करे तो क्या करे,

चुनना ही पड़ेगा अन्यथा कोइ विकल्प नहि 

NOTA तो सिर्फ़ सांत्वना है 

फिर करें क्या जिनका खुद ही कोइ सँकल्प नहि 

मंहगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी हो या बेरोजगारी 

इनके उपर गाली- गलोज पड़े है भारी

जनता तो तमाशबीन बनी है 

नेताजी पी रहे खुदही आम्ल के घुटें

ऐसे में सत्ता हाथ से कैसे छूटे………………………

 









इस चुनाव परिणाम के लिये सब है बेक़रार !



पुरे देश को गर्मी ने बुरा हाल कर रखे है जबकि चुनावी सरगर्मी भीषण गर्मी के भारी पर रही है नतीजन लोग गर्मी को दरकिनार कर इतने उतावले और दिसचस्पि से, गर्मियो से बेखबर होकर सिर्फ़ चुनावी परीणाम को निहार रहे है। कई ने तो नई सरकार के लिए स्वागत गान भी लिख डालें और इंतज़ार उस सुभमूर्हत को जब अपने मुखारविंदू से गुनगुनाएंगे। जहाँ कई मंत्री और संत्री अपने बूरिया -बिस्तर समेतने में व्यस्त है तो कईयो नये चेहरे ने अभी से ही मंत्री के सपथ पत्र  पढनें का अभ्यास करने लगे है। हमारे वर्तमान के प्रधानमंत्री इन दिनों केवल नये घर को डेकोरेशन और शिफ्टिंग को लेकर ही गंभीर है और इतने उतावले से लोग तो ७ रेस कोर्स में शिफ्ट होने के लिये नहि होंगे उससे कहीं ज्यादा हमारे प्रधानमंत्री यहाँ से विदा होने के लिये उतावले दिख रहे है। दरशल में जबसे संजय बारु ने अपने पुस्तक में प्रधानमन्त्री के कार्यशैली को लेकर प्रश्नचिन्ह लगाये थे तबसे प्रधानमंत्रि को अपने इर्द -गिर्द जमे लोगो पर से विस्वास ही ऊठ गया इसलिए तो इनदिनों गंम्भीर मौन मुद्रा में है और हो सकता है कि नये घर में निवास के उपरांत ही अपने मौन मुद्रा को त्यागेंगे।

लालूजी को ही देखिये, कुछ दिन पहले जब लालूजी जी जेल में थे बुद्धजीवियो ने मान लिये थे उनका राजनीती करियर बिल्कुल खतम हो गयी और रजद के लालटेन से रोशनी से गुंजाईश नहि पर सब तर्क मिथ्या हीं साबित हुए क्यूंकि फिलहाल न लालूजी जेल मेँ है हलांकि रजद के लालटेन के रोशनी से चकाचोंध कर रखे अन्यथा लालूजी को इतने ऊर्जा कंहाँ से मिलता कि रावडी देवीं के गाडी और सूटकेस के जॉंच करने वाले अधिकरी को जूता से पिटने की बात करतें?

दरअसल  में राजनीती में  वक्त का पहिया बहुत ही तेजी से घूमते है यहाँ लोग अर्श से फर्श पर चंद मिनटों  में पहुँच जाते है उसी तरह लोग फर्श से अर्श पर पहुँचने में ज्यादा मस्कत नहीं करने पड़ते है। इसलिए तो नेता किसी भी दल के क्यूँ न हो पर शियाशी फायदे के लिये चाहे कितने भी लांछन एक -दसरे पर लगाते दिखते हो पर निजी ज़िंदगी में किसी को किसी से भी परहेज़ नहीं है ऐसे में राजीनीति के नुमायँदे निभीर्क हो कर तामाम ऐसे कारनामे को अँजाम देतें है जो न सामाजिक दृष्टिकोण से और न ही संवैधानिक दृष्टीकोन से ज़ायज मानें जाते है। फलस्वरूप राजनितिक दिग्गज को अपने कुकर्म पर शर्मसार होने के वजाय उसे हीं राजनैतिक रँग देने में लगे रहते है। इसलिए दिन -ब - दिन दागदार नेताओ का भरमार होते जा रहे है जबकि संवैधानिक पदो पर बैठे लोग भी इन्हे ही पसन्द करते है क्यूंकि इनके बदौलत ही उन्हे भी सरक्षण मिलते है।

१६ मई के बाद दागदार नेताओ के आगे के रास्ते क अनुमान लग पाएगा, यदि इस चुनाव में जनता दागदार नेताओं के उम्मीदवारी को खारिज कर देती है तो इनके राजीनीतिक करियर का अन्त होना सुनिश्चित हो जायेगी लेकिन यदि चुनाव जीत कर आते है तो यह और धारदार हो जायेंगे जो देश और जनता दोनों के लिये घातक शिद्ध होने वाला है।  इस चुनाव में दागदार नेताओ क़ी बड़ी लम्बी सूचि है, कोइ भी पार्टी हो इससे अछूत नहि हाँलाँकि दो-चार पार्टी को छोड़ दें तो ज्यादातर पार्टी में ऐसे ही लोगों का बोलबाला है। ऐसे में नई सरकार से लोगों को काफी उम्मींद है कि दागदार लोगो को राजनीती में सक्रियता पर अंकुष लंगायेगी।

वर्तमान परिवेश को देखतें हुए बुर्जग राजनीतिज्ञ दिग्गज को कुछ करने  के लिये खास बचा नहि है ऐसे में उनके राजनीती मंच पर दीर्घकाल देखना मूमकिन नहि है कुछ ने तो पहले से ही सन्याश का एलान कर दिये जो नहि कर पाये उनके सन्याश चुनाव के उपराँत एलान करनेका आसार है। देश के तमाम राजनीती के भविष्य वक्ता के साथ -साथ आम जनता भी अपने सांस को थामे हुए है क्यूंकि जनता एक तरफ़ अपने इच्छाएँ और आकांक्षायें आने वाली सरकार से जोड़ कर रखी है वही भविष्य वक्ता के भी साख आनेवाली सरक़ार से जूडी है क्यूँकि देश तकरीबन सभी ने मान लिये है कि देश बहुत बड़ी बदलाव को स्वागत में है ऐसे में कुछ असंभावित हो जाता है तो उनके पूर्वानुमान के उपर प्रशन चिन्ह लगना तय है।  यदि इस चुनाव में किसी राजनीती घराने के छवि दांव पर लगे है तो वह है गांधी परिवार जिनके आगे के भविष्य इस चुनाव पर ही  निर्भर है कहना कदापि असत्य नहि होंगे क्यूंकि इन चुनाव के बाद जहॉं कांग्रेस के स्थिति देश के पतल पर होंगी वही गाँधी परिवार का भी भविष्य सुनिश्चित होगी कि उनके पीढ़ी में दमखम है जो कांग्रेस को आगे के रास्ता का मार्गदर्शन कर पाएंगे अपितु कांग्रेस पार्टी गाँधी परिवार को अलग- थलग करके खुद ही अपना मार्ग परस्त करेगी।

केजरीवाल और उनके तरह के नेताओं के लिये भी चुनाव अहम होनेवाले है क्यूँकि इस चुनाव के परिणाम के आधार पर ही उनके आगे के भविष्य का आकलन किया जाना सम्भव होंगे। वास्तविक में इस चुनाव का परीणाम शायद अतीत के सभी चुनाव परिणाम से अहम और अति प्रभावशाली होनेवाला है और चुनाव परिणाम के पश्चात देश के जनता शाक्षात् होंगे कि देश के लोगो आज भी महजब व जातीं के नाम पर पाराम्परिक वोट करते आये है या इस बार भ्रष्टाचार, मंहगाई , बेरोजगारी और ग़रीबी को मुद्दा मान कर प्रगतीशील सरकार के हेतु वोट डाले है। 

गुरुवार, 1 मई 2014

कांग्रेस की आखरी बाजी

भाजपा को रोकने के लिए जिस कदर कांग्रेस दिल्ली में आआपा को समर्थन दी थी, बेशक ४९ दिनों के लिए ही सही केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने में कांग्रेस अहम रोल अदा की थी, आआपा के सभी कूटनीति कांग्रेस के आगे धाराशाही   हो गयी आखिरकार आआपा इस तरह से विवश हो गयी फलस्वरूप आआपा खुद ही हथियार डालकर अन्तः  इस्तीफा देना ही पड़ा आआपा के सरकार भी गयी और जनाधार भी गया। उसी तरह किसी भी हालत में कांग्रेस नहीं चाहेगी कि केंद्र में भाजपा की सरकार बने। फिलहाल जो भी स्थिति दिल्ली प्रदेश सरकार के लिए लोगों के सामने बनी हुई है अगर इस तरह का स्थिति केंद्र सरकार को लेकर देश के समक्ष हो तो इसमें  कोई भी हैरत नहीं होना चाहिए क्यूंकि इस तरह के स्थितियों से एक तरफ कांग्रेस को फायदा मिलता है जबकि उनके विपक्षी दलों में मायूसी ही दिखतें है। इसी के तहत कांग्रेस अपने प्लान के ऊपर जोर-सोर से काम करना शुरू कर दिए है।  भाजपा को रोकने के लिए इन्हे वामदलों को समर्थन देने और लेने से भी से भी परहेज़ नहीं है कांग्रेस ने तो मोदी के रोकने के लिए दो तरह के  प्लान की तैयारी कर रहे है। प्लान -A के तहत वामदलों को छोड़कर खुद ही सरकार के अगुआई करेंगे जिनमें सपा, बसपा , डीएमके, एनसीपी, टीएमसी, BJD और अनेको छोटी-छोटी और क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन बनाएंगे और इसको सेक्युलर गठबंधन का संज्ञा देकर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार करेंगे और सभी दलों के उनके सीट के आधार पर कैबिनेट मंत्रालय में जगह दिए जायेंगे यद्दिप इसके लिए कांग्रेस को चाहिए कम से कम १४० सीट।

 जबकि प्लान-B के अनुसार कांग्रेस थर्ड फ्रंट को बाहर से समर्थन दें सकती है। हालाँकि थर्ड फ्रंट का अहम भूमिका होगा सरकार के स्वरुप को तैयार करके सरकार को चलाये जबकि कांग्रेस किसी भी दशा में सरकार में शामिल नहीं होगी। सरकार कांग्रेस बनाये अथवा थर्ड फ्रंट दोनों ही स्थितियों में कांग्रेस के ऊपर सरकार का दारोमदार होंगे जिसके दरमियान कांग्रेस अपनी खोई साख को सृजन करने को पुरजोर कोशिश करेगी । गैर एनडीए सरकार बनाने के अथक प्रयास इसलिए भी कांग्रेस करेंगे क्यूंकि कांग्रेस को पता है यदि एनडीए के सरकार बनती ही दस साल के सभी घोटालों का लेखा -जोखा जनता के समक्ष होंगे जबकि इनके दस साल के दौरान मंत्री रहे अधिकतर नेता कारागार में होंगे जिनसे कांग्रेस पार्टी को अत्याधिक नुकशान उठाना पड़ेगा, जिसका भरपाई करने के लिए व पुनः स्थापित होने के लिए बरसों लग जायेगा,  इस कारण कांग्रेस पार्टी कभी भी नहीं चाहेगी कि भाजपा के अगुआई वाली सरकार केंद्र में आये। हक़ीक़त में दोनों प्लान की ब्लू प्रिंट सरलता से तो तैयार किये जा रहे है परन्तु आसान नहीं होगा जब इनके ऊपर काम करना होगा क्यूंकि पहले ही इस तरह के कवायद पर विराम लग जायेगा जैसे ही एनडीए गठबंधन को २७२ सीट के करीब या उसके ऊपर मिलते है अपितु थर्ड फ्रंट को एक सूत्र में बांधकर ज्यादा दिन रखना कदापि सहज नहीं है। वाबजूद सरकार थर्ड फ्रंट की ही बने पर कई छोटे -छोटे पार्टी होने कारण सामंजस्ता और संतोष के आभाव में बहुत ही जल्दी बिखरने का अंदेशा बनना स्वाभविक है फिर भी कांग्रेस अपनी आखरी बाजी तो खेलेंगे ही।

दरअसल में महाराष्ट्रा के मुख्य मंत्री के संकेत से साफ़ जाहिर होता है कि कांग्रेस के नेताओं ने दोनों प्लान के ऊपर काम करना तभी से शुरू कर दिए जब उनको ज्ञात हो गया था कि यूपीए गठबंधन के  चुनावी परिणाम काफी प्रतिकूल होने वाला है और यूपीए गठबंधन हरगिज़ सत्ता के आस-पास नहीं पहुँच पा रहे है , ऐसे में नए प्लान के बदौलत ही सत्ता हासिल की जा सकती है अथवा एनडीए गठबंधन को सत्ता से दूर रखे जा सकते है। फिलहाल सबकी नज़र १६ मई के परिणाम पर ही है, उसके उपरांत ही सत्ता के लिए जोड़-तोड़ की राजनीती का असल क्लाइमेक्स देश के सामने आएंगे।  वास्तविक में कांग्रेस इस तरह के राजनीती में माहिर है जिस कारण ही १९९६ में अटल बिहारी वजपेयी को १३ दिन के पश्चात इस्तीफा देना पड़ा था क्यूंकि सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाये थे । परिणाम स्वरुप कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर दो साल में भारत के दो प्रधानमंत्री दिए यद्दिप उनके यह चाल उनके ही उलटे पड़ गए नतीजन १९९८ में एनडीए गठबंधन सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरे अन्तः अटल बिहारी वाजपेयी के अगुआई में सरकार का गठन हुआ जिनके आयु १३ महीने रहे उसके पश्चात देश को फिर से मध्यावि चुनाव का सामना करना पड़ा हालाँकि इस बार एनडीए गठबंधन इतने सशक्त सरकार दिए जो कि  गैर कांग्रेसी सरकार केंद्र  में पहली बार बनी जो अपनी पांच साल का कार्यकाल पूरी कर पाई।

बरहाल कांग्रेस और बीजेपी दोनों जद्दोजहद में लगे है कि अपनी-अपनी सरकार बनाये पर इन्ही जद्दोजहद के बीच कांग्रेस के एक समूह उन सभी विकल्प के ऊपर आत्म मंथन करने में लगे है कि कांग्रेस यदि बीमार भी हो जाये कि किसी भी दृष्टि से सरकार का बोझ उठाने के काबिल न रहे फिर भी  थर्ड फ्रंट या कोई अन्य विकल्प को तलाश रहे है जिनके माध्यम  से सत्ता के बागडोर उनके ही हाथ में हो। जबकि भाजपा एनडीए गठबंधन को मजबूत करने में लगे हुए ताकि किसी भी हालत में सरकार बनाने का मौका हाथ से जाने न दिया जाय। अन्तः देश लोग भी बड़ी ही बेशर्बी से १६ मई का  इंतजार कर रहे है क्यूंकि चुनाव परिणाम आने के पश्चात ही इन पार्टियों का दशा और दिशा समझ आ पाएंगे  … ................।