सोमवार, 12 दिसंबर 2022



 दिल्ली का क्या होगा ?


दिल्ली में जो दर्दनीय घटना घटित हुई, इसके लिए मुख्यतः दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार दोनों जिम्मेवार है क्यूंकि लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के नेताओं ने अस्वासन दिए थे कि अवैद्य कालोनी में जो बंगला देशी है उन्हें सत्ता में आने के उपरांत पुनः बंगलादेश भेजा जायेगा परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ।  प्रायः  अधिकांश दिल्ली के लोग इससे इत्तेफ़ाक़ रखता है कि कांग्रेस का अवैद्य कॉलोनी में रह रहे बंगलादेशी पारंपरिक वोट बैंक है। हालाँकि आप पार्टी जबसे स्थापित हुई तबसे केजरीवाल इनके सरंक्षक के किरदार में बने हुए है और इस पार्टी के कई नेता ने खुलकर इनके समर्थन खड़े दिखे गए नतीजन इस तरह के लोगों का उत्साहित होना लाज़िमी है जिन्हे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मौका परस्तियों का समर्थन हासिल है जो भी हो परन्तु यह अत्यन्त दुःखद है जिस कारन से अधिकाधिक दिल्ली के शांतिप्रिय लोग त्रस्त है।  जँहा तक केंद्र सरकार  का मनसा को लेकर प्रश्न उठता है इसका मुख्य कारन है कि उनके अधीन दिल्ली पुलिस होने के वाबजूद इसका सदुपयोग करके इस तरह के आपराधिक तत्व को अपराध को रोक सकते थे अथवा उनके ऊपर लगाम लगाए जा सकते है पर केंद्र का भूमिका भी सकारात्मक नहीं देखा जा सकता मसलन रोज पंकज नारंग जैसे निर्दोष लोगों या  परेशान किये जाते है व हत्या कर दिए जाते है। 

दिल्ली पुलिस का भूमिका बेहद असंवेदनशील है क्यूंकि दिल्ली पुलिस इन तरह के अवैद्य कॉलोनी में आपराधिक लोगों से उगाही करती है और उनके सभी अपराध को नज़रअंदाज करती है।  जबकि दिल्ली के अंदर कई ऐसी गली या इलाके है जंहा पुलिस भी जाने से डरती नतीजन वँहा पर हर तरह के गैर कानूनी काम खुलेआम व भयमुक्त तरीके से किये जाते है।  ब्रेसेल में जिस कदर दहलाने वाली त्रासदी को अंजाम ऐसी ही इलाके के लोगो के माध्यम  दिया गया, जिनके डर से वँहा के पुलिस उनके इलाके में प्रवेश करने से परहेज़ करती  थी परिणामस्वरूप  बीते दिन फिदायीन हमला में तकरीबन पचास बेकसूर लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी.  दिल्ली पुलिस को चाहिए कि ब्रेसेल के घटना से सीख लेकर ऐसे इलाको नामांकित करके इनमें पनप रहे कट्टर वादी, आतंकवादी  और असमाजिक सोंच को रोके।

दिल्ली के पंकज नारंग के घटना को लेकर जो सक्रीय मीडिया का भूमिका रहा, इनसे प्रायः दिल्ली के ज्यादातर लोग दुविधा में है कि जिस मीडिया को चौथ स्तम्भ का दर्जा  दिया गया, क्या इसके काबिल है अथवा नहीं ?  वासतव में कई मौके पर मीडिया द्वारा नकारात्मक सोंच का उजागर होता जिससे उनके साख पर बत्ता लगना बिलकुल जायज़ है क्यूंकि मीडिया हमेशा सकारात्मक और सच के प्रतिबद्ध माना जाता पर इन दिनों  इन सब को भुलाकर बाजारू मीडिया के दौड़ में एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में व्यस्त, इसके लिए सच और सकारात्मक खबर को ही क्यूँ  न गला घोटने पड़े, इसके लिए बेहिचक तैयार है।  फिलहाल मीडिया को लेकर  लोगों के जो अवधारणा थे धीरे -धीरे से धूमिल हो रहे है जिस कारन बाज़ारू मीडिया को ज्यादा दिन तक तीके रहना मुमकिन नहीं है इसीलिए मीडिया को चाहिए कि यथसीघ्र पुनः अपनी साख को संचित करके खोये हुए विस्वास को हासिल करे ताकि लोगों का जो पुराने अवधारणा है फिर से कायम रहे।

 बरहाल दिल्ली के सभ्य और संवेदनशील जनता दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार दोनों के तरफ आँख पसार कर देख रही है कि पंकज नारंग जैसे निर्दोष लोगों के सुरक्षा के प्रति क्या -क्या कठोर कदम उठा रही है, ताकि भविष्य में इस तरह के दुबारा घटना देखेंने को नहीं मिलें?

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016




 दिल्ली की सरकार और तुगलकी फरमान 


क्या सत्ता एक नशा है जिसे कोई भी पचा नहीं पाते नतीजन जैसे ही सत्ता पर काबिज होते है फिर क्या है मनमौजी की तरह हरकतें करने शुरू कर देंते है?, तानाशाहों की भांति अपनी इच्छा और महत्वाकांक्षा दूसरे पर थोपना आरम्भ कर देतें  है, हद तो तब हो जाते है जब मिशाल पेश करने के चाह में हर एक मर्यादा को लांघ देंते है।  प्रश्न अत्यन्त ही गंभीर है क्योंकि लोकतंत्र में इस प्रश्न का समाधान जब तक नहीं ढूंढा जाता तब तक लोकतंत्र को सुरक्षित नहीं माना जा सकता है कारन स्वरुप आप झूठे वायदे और जनता को दिग्भर्मित करके चुनाव जीतन के पश्चात जनता का हित का ख्याल से ऊपर अपनी महत्वाकांक्षा को रखना लोकतंत्र के लिए विनाशकारी सोंच है जिसे यथाशीघ्र त्यागना होगा अन्यथा वे दिन दूर नहीं जब जनता के बीच हताशा और आक्रोश का ऐसा उबाल देखनो को मिलेगा जो निश्चित रूप से अलगाववादी नीतिकारों के पक्षधर होंगे।

दरअसल में दिल्ली में दो सरकार रहती है और दोनों का एजेंडा बिलकुल आपस में मेल नहीं खाते है पर इसे अस्वाभिविक नहीं कह सकते है क्यूंकि दोनों सरकार अलग -अलग पार्टी के हाथों में  और दोनों के नीती और नज़रियाँ  भिन्न हो सकते है, हालाँकि प्रश्न यह है कि दोनों के नीती और नज़रियाँ भिन्न है किन्तु इनके नीती और नज़रियाँ जो भी, पर जनता के प्रति जवाबदेही होनी चाहिए उसे कैसे भुला सकते है?, सत्ताधारी पार्टी उसमें शामिल महापुरुषों ने भ्रष्टाचार से निजात दिलाने बात कह कर सत्ता पर तो काबिज हो गए हो परन्तु सत्ता हथियाने के उपरांत जनता का हित का ख्याल का ध्यान न करके सिर्फ अपनी तुगलकी फरमान जनता पर थोपना शुरू कर दिए, क्या लोकतंत्र में इसे स्वीकार किया जा सकता है? हरगिज नहीं क्यूंकि जनता ने आपको चुना है इसीलिए क्यूंकि आपने जनता को अस्वासन दिया था कि आप जनता को सर्वोपरि समझकर ही कोई फैसला लेंगे फिर अचानक जनता को नज़रंदाज़ करके आप कोई भी फैसला कैसे ले सकते है?  अगर फैसला आप लेते है तो आप जनता के साथ विश्वासघात कर रहे है।

इनदिनों दिल्ली सरकार ने दिल्ली जनता के ऊपर न जाने कितने ऐसे कानून और सोंच थोप रही है जिससे दिल्ली के जनता काफी विस्मय है। प्रदुषण रोकने के लिए जरुरी है कि आप कठोर कदम उठाये फिरभी जनता के परेशानियों से मुंह कैसे फेर सकते है, क्यूंकि प्रदुषण रोकने के लिए कई उपाय करना आवश्यक है पर सभी विकल्प को नजरंदाज करके एक ही विकल्प को अपनाते है जो दिल्ली के जनता के परेशानी का सबब बन पड़ा है इससे यही निष्कर्ष निकला जा सकता है कि जनता वेचारे है और न चाह कर आप के सभी फैसले को स्वीकार करते है क्यूंकि फैसला का बहिष्कार करना अलगाववादी विचारधारा माना जायेगा कि सभ्य जनता तनिक भी इसका समर्थन नहीं करती है। हालाँकि दिल्ली सरकार वाकये दिल्ली में प्रदुषण के प्रति गंभीर है तो सबसे पहले दिल्ली में ८५% प्रदुषण जिन स्त्रोत से होता है उसे रोकने की जरुरत थी जिससे जनता प्रत्यक्ष रूप से परेशानी से साक्षात नहीं होते तद्पश्चात यह नियम लागु किया जा सकता है पर ऐसा नहीं करके सिर्फ जनता के ऊपर अपने विचार को लांद देना यह सिर्फ यही दर्शाता है कि लोकतंत्र में लोकशाही सिर्फ दिखावा जबकि जनता तो बस सत्ता के हुक़ुमराणो के रहमो करम पर ही रहती है। माना कि प्रदुषण के कारन जो भी दुष्प्रभाव है उससे सबसे ज्यादा जनता ही प्रभावित हो रही है लेकिन जनता को स्वच्छ पानी और स्वच्छ हवा मुहैया करवाना सरकार की कर्तव्य है यदि सरकार जनता को ये भी सुविधाये नहीं दें पा रही है तो इसका तातपर्य यह कि सरकार अपने कर्तव्य से बिमुख हो रही है। बरहाल दिल्ली की सरकार प्रत्येक मोर्चे पर विफल ही रही यही कारन है कि भ्रष्टचार युक्त दिल्ली में दिल्ली के हवा हो या व्यवस्था सब प्रदूषित हो गए है अब देखना है कि दिल्ली सरकार कितने हद तक इसे स्वच्छ कर पाएंगे परिणामस्वरूप दिल्ली के अधिकाधिक लोग स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी के आभाव में अनेको प्रकार के बीमारी से ग्रस्त है अगर स्वच्छ हवा और पानी दिल्ली को लोगों मिले इससे अन्तः दिल्ली के लोगों का ही भला होगा  ......


 





सोमवार, 23 नवंबर 2015





 हम आखिर कब तक ?


जँहा पर राजनीती और सियाशी दाँव -पेंच में उलझे हुए अतीत और भविष्य है, जँहा राजनीती के सरंक्षण के बिना ना अपराध, ना व्यापार संभव वँहा पर राजनीती के कदरदानों ने सिर्फ और सिर्फ सांत्वना और झूठे वायदें के बुनियाद पर आज़ादी के बाद से यंहा के जनता का शोषण करते आ रहे हालाँकि इन्होने बेशक काम करने का तरीका व स्वरुप में बदलाब अनेको बार किये परन्तु इनके मकसद कल, आज और कल एक ही रहने वाला है।  चाहे जय प्रकाश नारायण को वह जन आंदोलन व  इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ आंदोलन, फिलहाल के अनेको आंदोलन।जय प्रकाश नारायण  के जनांदोलन के बाद भी भ्रष्टाचार देश को खोखला  क्या नहीं करते रहे?  इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के नारे बाद पुनः सत्ता पर तो काबिज़ हो गए पर देश से गरीबी हटा पाये नहीं बिलकुल नहीं क्यूंकि लक्ष्य यह नहीं था कि गरीबी हटाना वस्तुतः ऐसे नारे के सहारे सत्ता पाना ही उद्देश्य रहा है।

आज की परिदृश्य में जन लोकपाल जनांदोलन जिनके माध्यम से भ्रष्टाचार को हटाना था पर अवसर मिलते ही सत्ता हथिया लिए और मुलभुत एजेंडा को तिलांजलि देकर सत्ता का आन्दन ले रहे है।  इस तरह के सैकड़ो उदहारण है जिसके आधार पर यह शुनिश्चित किया जा सकता है कि इस लोक तंत्र में सत्ता तक पहुँचने के लिए नेताजी क्या- क्या नहीं करते जैसे ही सत्ता पर आसीन हो जाते कभी पीछे मुड़ कर देखने की जरुरत नहीं समझते इसी को तो लोकतंत्र कहते है जो जनता के द्वारा जनता के बीच में से जनप्रतिनिधियों को सत्ता का कमान सौपें जाते है और बदले में जनप्रतिनिधियों का उपेक्षा का शिकार हो कर प्रत्येक दिन उन्हें कोसते रहते है, इसी जद्दोजहद में पांच साल बीत जाते है अचानक वही जनप्रतिनिधियों आपके सामने प्रकट होते है एक नए एजेंडा  के साथ एक नए अवतार में फलस्वरूप जनता सब भूल कर फिर से उन्हें जीता देतें है।  इस प्रकार के लोक तंत्र से बढियां तो हमारे यंहा को राज तंत्र थे यद्दीप उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार सिर्फ राजा के पास थे लेकिन राजधर्म का पूणतः  निर्वाह करते हुए सदैव योग्य व्यक्ति के हाथ में देश कमान देंते रहे फिर भी कई बार चूक हुए परन्तु  आज से तो बेहतर ही कहा जा सकता है।

दरअसल में इसके लिए जनप्रतिनिधि ही केवल दोषी नहीं है ब्लिक हमलोग और हमारे व्यवस्था कम दोषी नहीं है। कुछ जनप्रतिनिधियों ने अपने हित के खातिर आरक्षण का  दीमक ला कर छोड़ दिए है जो दिन ब दिन  हमारे बुनियाद को कमजोर करने में लगे है जिसके आढ़ में सियाशी पुलाउ खूब पका रहे है और खा रहे परन्तु राष्ट के नींव को इस कदर खोखला कर रहे है कि भविष्य में एक बड़ी त्रासदी से रूबरू होना निश्चित है।  क्या ऐसे लीडर जो खुद ही कई भ्रष्टाचार के मामले में संलिप्त है क्या उनसे पारदर्शी और साफ सुथरी सरकार की उम्मीद की जा सकती है, कतई  नहीं।  जिस तरह अमेरिका की चुनाव प्रणाली है उसके मुताबिक हमारे यंहा भी चुनाव प्रणाली बनायीं जा सकती है फिर क्यों ना संविधान में संशोधन करके जनता के प्रति ज्यादा से ज्यादा जवाबदेह जनप्रतिनिधियों का चुनाव को तज्जुब दी जाती है प्रत्येक जनप्रतिनिधि के लिए एक मापदण्ड निर्धारित की जानी चाहिए ताकि कभी भी और कंही भी अपने व्यक्तिगत हित खातिर अपने पद का दुरुप्योग न कर पाये।

देश आज भी आज़ादी के ६५ बर्ष बाद पूर्णतः आजाद नहीं हो पाये इसका मुख्य कारण है कि हमारे यंहा जन प्रतिनिधि को सिर्फ जनता को मुर्ख बना कर सत्ता हाशिल करने का स्पर्धा में लगे रहना,  काश इसीलिए चुटकी भर जनप्रतिनिधियों को छोड़ दें तो बाकियों में देश के प्रति समपर्ण कभी भी नहीं देखा गया नतीजा आज हमारे सामने है कि हमारे देश संप्रभुता स्वालम्बी होने वाबजूद वह उपलब्धि नहीं हाशिल कर पाई जो कई अन्य देश ने हाशिल कर पाये। चीन को ही देखिये आज कहाँ है यद्दीप इन दिनों बुरे दौर से गुजर रहे है फिर भी हमसे २० साल आगे है।  जिस देश केजनप्रतिनिधियों  में से ज्यादात्तरजनप्रतिनिधि भ्रष्टचार और अनिमियता के मामलों में दोषी ठहराए जा चुके है व इसके सन्दर्भ में उनके खिलाफ मामले की सुनवाई चल रही उन्ही के हाथो में हमारी तकदीर और तस्वीर है ऐसे लोगों से सकारात्मक प्रतिक्रिया उम्मीद करना हरगिज़ मुनासिब नहीं है।  जिन्होंने अपने हिट के लिए क्या-क्या नहीं किया , पहले तो अमीरी और गरीबी की दीवार खींच दिए फिर भी बात नहीं बनी तो जात -पात के आधार पर बाँटने लगे  परिणामस्वरूप हम तो बँट गए, कमजोर हो गए पर इनसे फायदा किसको मिला हमारे जनप्रतिनिधि को जो हमें कई भाग में बाँट कर खुदको इतना मजबूत कर लिए शायद उन्हें रोकना अब  संभव नहीं है।
वास्तविक में आज के परिस्थिति में जनता को जितना मिल जाता उसी में खुश रहने की कोशिश करती है जबकि जनता के हाथ में सिर्फ लोली पॉप थमाने का काम करते है जिनसे हक़ीक़त में कुछ होना ही नहीं है।  हाल में दिल्ली सरकार ने पानी और बिजली के बिल में रियायत दी बदले में ईंधन के मूल्य में विक्रेता कर तहत भारी बढ़ोत्तरी कर दिए नतीजा एक तरफ से थोड़ा बहुत मिला  दूसरे तरफ अत्यधिक ले लिया  गया मसलन किसी भी हाल में जनता का जेब ढीली करी जाएगी ।  इस तरह के परिदृश्य में जनता, जनप्रतिनिधि से कुछ अपेक्षा अथवा आंकक्षा रखना ही जायज़ कभी भी नहीं माना जा सकता। लोगो को भी चाहिए कि अपनी समझदारी दिखाए किसी भी प्रतिनिधि को चुनने से पहले जाँचे -परखे फिर उनके दावेदारी के ऊपर मुहर लगाये अन्यथा बिना समझदारी के कर्मनिष्ठ और तटस्थ प्रतिनिधि  का कल्पना करना कदाचित उचित नहीं है।

अँधा गाँव में कान्हा राजा अर्थात जब जनता खुद अँधा हो जायेंगे तो कान्हा जो थोड़ा बहुत देखते है वही आपके ऊपर राज्य करेंगे व आपके जनप्रतिनिधि कहलाएँगे इसीलिए आप अँधा होने के बजाय अपने आँख खोलिए और अपने बीच से ऐसे जनप्रतिनिधि को आगे कीजिये  जिनमे वाकये आपके प्रनिधित्व करने की काबलियत हो जबकि उनकी ईमानदारी का मापदंड सर्वोपरि हो। जिस कदर एक सरे आम पूरी टोकड़ी के आम को सराने का काम करता है उसी प्रकार एक बईमान जनप्रतिनिधि पुरे व्यवस्था को भ्रष्ट करने के लिए काफी है। जब तक प्रदूषित व्यक्ति को हम चुनकर भेजते रहेंगे तब तक स्वच्छ वातावरण व व्यवस्था का उम्मीद करना अशोभनीय  होगी।  सही मायने लोकतंत्र का दबदबा तब कायम होगें जब लोकशाही की बरियता दी जाएगी इसके लिए हम सभी को आगे आकर अपना अधिकार जताना होगा अन्यथा हम आँख मूंदकर बैठे रहेंगे और ये मुट्ठी  भर लोग हमारे अधिकार का मर्दन करके हमारी असमत के साथ खेलते रहेंगे।  जरा सोचिये मुट्ठी भर ही अंग्रेज थे जिन्होने हमें बर्षो तक गुलामी की बेरियों में जकड़े रखा और आज मुट्ठी भर हमारे बीच का ही लोग  है जो हमें विकाशशील से विकशित नहीं हो देना चाहते है इसके पीछे उनका मनसा सिर्फ एक है कि कही हम जागरूक न हो जाये जिससे उनके मनमानी रोक रुक जाएगी। जरा सोचिये फिर आत्मचिंतन कीजिये …………………… !!



बदलते हुए  कई चहरे को आइना में देखा शरमाते हुए क्यूंकि खुद से वे नहीं नज़र मिला पाते
पर एक शख्श ऐसे भी है जो कभी नहीं शरमाते क्यूंकि आइना ही उन्हें देखकर शरमा जाते
इसीलिए तो गिड़गित ने छोड़ दिए अपने परम्परा जबसे नेता ने इसकेलिए मजबूर हुए,
जिनके खिलाफ थे उन्ही के साथ हुए, क्या केजरीवाल इसी  कारन से इतने महसूर हुए ?



क्या राजनीती में सबकुछ जायज़ है ?


इतिहास ने कभी भी अवसरवादी और खुदगर्ज विचारधारा को ना ही जगह दिया और ना ही तहजीब दिया शायद इसका आभास केजरीवाल हुए हो अथवा नहीं पर अन्ना तो अवश्य ही आत्मघात हुए होंगे और खुदसे नज़र भी नहीं मिला पा रहें होंगे क्यूंकि वे अन्ना ही है जिनके जन लोकपाल आंदोलन  के जरिये राजनितिक जमीं तैयार कर और उनसे वैचारिक और सैद्धांतिक समर्थन पा कर दिल्ली के मुख्यमंत्री के गद्दी तक फासला तय करके फिलहाल दिल्ली मुख्यमंत्री बने हुए है, यह सब केजरीवाल के लिए सिर्फ मौकापरस्ती हो सकती है व एक सोंची समझी रणनीति हो सकती है पर अन्ना तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी थी वह उनके सैद्धांतिक वैचारिक लड़ाई थी क्यूंकि उन्होंने सदैव भ्रष्टाचार से घृणा करते रहे है।  अब देखना है कि उनके सबसे प्रिय और यशश्वी शिष्य भ्रष्टाचार को गले लगाकर खुदको उस जमात में शामिल कर लिए है जिनमें भ्रष्टाचार के बड़े -बड़े दिग्गज पहले से ही मौजूद है और वही सभी शियाशी दल है जिनके नेता किसी ना किसी तरह से भ्रष्टाचार के मामलें में लिप्त पाये गए है व इस कारन से सजायाप्त है एक साथ मंच साझा किये जिनके विरुद्ध अन्ना का मुहीम जारी है, केजरीवाल के इस परिवर्तन को लेकर अन्ना का क्या प्रतिक्रिया होता है?

हालाँकि एक बात तो श्पष्ट हो गयी है कि केजरीवाल बेशक अपनी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किया हो पर अब भ्रष्टाचारियों से थोड़ी  भी परहेज़ नहीं है इसीलिए तो लालू,  राहुल, पवार के साथ मंच साझा करते दिखे गए है , ऐसे में अन्ना केजरीवाल को अपने वैचारिक समर्थन जारी रखेंगे या उनके विरुद्ध भी खड़े हो कर अपने भ्रष्टाचार की लड़ाई को फिर से देशव्यापी आंदोलन का शंखनाद करेंगे क्यूंकि केजरीवाल का भ्रष्टाचारियों के साथ आना महज एक संयोग नहीं ब्लिक उनके एक रणनीति का हिस्सा है इस कारन से उनके मंशा के ऊपर कई सवाल खड़े होते है। 


वास्तविक में केजरीवाल मंच साझा करने वाबजूद भ्रष्टाचार में सजायाप्त लालू प्रशाद यादव के साथ जिस तरह गले मिल रहे थे और लालू के समर्थक का अभिवादन कर रहे थे इस से बच सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया मतलब आने वाले दिन में लालू के महागठबंधन में शामिल होने का अटकल लगायी जा सकती क्यूंकि केजरीवाल को भलीभांति ज्ञात है कि दिल्ली के चुनाव में बिहारी वोट बैंक बहुत बड़ा भूमिका है।  तकरीबन ४०%, जिसे हाशिल करने  लिए नितीश और लालू जैसे नेता का समर्थन अहम हो सकते है इसी कारन से नजदीकियां बनाने में लगे हुए।

अब प्रश्न यह उठता है कि केजरीवाल के लिए भ्रष्टाचार कोई सैंद्धातिक मुद्दा नहीं था, ये सिर्फ ढोंग था  फिरभी  अन्ना के साथ जो जनलोकपाल आंदोलन चलाये थे वह सिर्फ सत्ताधारी दल के खिलाफ शियाशी साजिश थी जिसके बुनियाद पर अपने  महत्वाकांक्षा को पूरा करना था और जैसे ही महत्वाकांक्षा पूरा हुए उससे पला झाड़ भविष्य के मद्दे नजर नयी रणनीति को तैयार करने में लग गए, इसी कारन से अब भ्रष्टाचारियों के साथ आने में थोड़ी भी हिचक नहीं है । 

प्रश्न यह भी उठता है कि केजरीवाल की लड़ाई में उनके प्रतिद्वंदी सिर्फ एक ही दल है भाजपा क्यूंकि दिल्ली के शियाशी जमीं पर उन्ही से मुकाबला होना है इसके लिए उन्हें किसी भी दल और उनके प्रतिनिधि से किसी भी प्रकार का परहेज़ नहीं है चाहे वे भ्रष्ट क्यूँ ना हो। 

दिल्ली के लोग उनसे बड़े बदलाव का कोई अपेक्षा कभी भी नहीं किये थे ब्लिक लोग उन्हें एक ईमानदार और भ्रष्टचार के खिलाफ लड़ाई लड़नेवाला एक प्रतिनिधि के रूप में देखते थे पर जब इस तरह का बदलाव भ्रष्टचार के प्रति उनमें देखकर, लोग खुदको ठगा महसूस करते होंगे। शायद ही केजरीवाल अपने अंदर के परिवर्तन से आश्चर्यचकित हुए होंगे पर दिल्ली के जनता अचम्भित है इस परिवर्तन को  देखकर और फिलहाल असहज होंगे जो कि भविष्य के चुनाव में अपना असर दिखाएँगे। 

फिलहाल लालू यादव खुदको पवित्र माने क्यूंकि केजरीवाल अपने गले लगाकर उन्हें ईमानदारी  ख्याति   दिया है क्यूंकि राजनीती के गंगा तो केजरीवाल खुदको ही मानते है बांकी तो सब मैले है, हालाँकि देश के जनता केजरीवाल को कितने पवित्र मानती यह कहना बहुत जटिल है।  इस परिदृश्य में वाकये ही संभव नहीं जब केजरीवाल उन्ही के बींच में है जिनके प्रायः अधिकतर  दल के  प्रतिनिधि  भ्रष्ट है जैसा वही कहते  थे और यही कह -कह कर दिल्ली  सत्ता तक पहुंचे ।

 दरअसल में राजनीती के गलियारों में जो परिपाटी बरसो से आ रही है उसी परिपाटी को केजरीवाल ने भी जीवित रखा है उनसे हटकर उन्होंने कुछ भी नया नहीं किया फिर भी खुदको अलग कैसे कह सकते है ? यद्दिप लोगों का उनके प्रति इस तरह का बदलाव होने के कारन अचम्भित होना स्वाभाविक है क्यूंकि आप जिनसे कुछ भिन्नता  आकांक्षा रखते है पर उसके अनुरूप वे नहीं देखँते है इस प्रकार का वाक्य आप को  विचलित कर देंते है और विचलित होना अस्वाभाविक नहीं है पर इसको स्वीकार करना ही पड़ेगा आखिकार यही तो राजनीती परंपरा है जो कि लोंगों को सिर्फ एक वोट बैंक के नज़र से देखना सिखातें है इसीलिए लोगों के भावना के प्रति राजनीती कदरदानों में तनिक भी जवाबदेही न ही दिखता और न ही कोई गलानी होती है, है ना !!!


सोमवार, 9 नवंबर 2015


 शाह के नीती, चाणक्य के जमीन पर गौण हुआ ?



बिहार चुनाव में जिस कदर सवर्ण ने नितीश कुमार के समर्थन में वोट दिया है इससे यह तो स्पष्ट होता है कि अब जनता जाति से ऊपर उठकर विकास परस्त सरकार को चुनती है। हालाँकि  बिहार के अधिंकाश लोग के मन में  डर था कि लालू के साथ नितीश है जिस कारन से विकासशील सरकार देना नितीश के लिए आसान नहीं होगा फिर भी नीतीश के दस साल के काम -काज को आंकलन करके उसी के आधार पर अपने मन के डर  को किनारे कर नीतीश के ऊपर  विश्वास बरकरार रखा।  हालाँकि नीतीश को अब बिहार के लोगों के आंकाक्षा पूरा करना इतना सहज भी नहीं होनेवाला है क्यूंकि लालू इनके इस नेक काम में अब तक सहयोगी का  भूमिका निभाते है यह कहा नहीं जा सकता है। वास्तव में लालू को विकास प्रेमियों के साथ नहीं भाता ऐसे में दोनों के बीच वैचारिक अशंतुलन होना स्वाभाविक है जिस कारण सरकार की भविष्य अधर में ही रहेगी कारणस्वरूप यह कोई वैचारिक गठबंधन की सरकार नहीं बनने वाली है ब्लिक यह एक मजबूरी का गठबंधन है जो कभी भी और कंही भी टूट सकता है बहरहाल इस गठबंधन के भविष्य को लेकर सदैव संशय का   वातावरण बनी रहेगी।

अगर इस चुनाव में सबसे बड़ी हार किसी को  हुआ तो वह मोदी , अमित शाह और मोदी सरकार में बैठे नीतिकारों का ही हुआ है क्यूंकि नीतीश हारता, लालू  हारता तो देश के जनता के लिए शायद ही अपेक्षा से परे होते पर इस हार से मोदी सरकार की पूरी जड़ हिलनेवाले है क्यूंकि मोदी और अमित शाह के जोड़ी ने कई हिट फिल्म देने के बाद इस तरह के लगातार दूसरी फ्लॉप्स फिल्म दिया है कि इनके शाख और काबलियत के ऊपर प्रश्न चिन्ह लगना तय है। भाजपा के अध्यक्ष  के तौर पर अमित शाह का परफॉरमेंस में वो बात नहीं रही  जिसके लिए वे जाने जाते रहे है  दरअसल में इनके नजर में कार्यकर्त्ता का कोई पूछ नहीं है यह सिर्फ एक बैशाखी है जिसका इस्तमाल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया करते है और फिर बिसार देंते है नतीजा जो जोश भाजपा के कार्यकर्ता को लोकसभा के चुनाव के दौरान देखने को मिलता था अब ऐसा तनिक भी नहीं मिलता है।  एक तरफ अमित शाह को बुद्धजीवियों व पार्टी के बरिष्ठ  नेताओं ने चाणक्य  की संज्ञा दिए जा रहे है , दूसरी तरफ अमित शाह जमीन से जुड़े कार्यकर्ता  से कट रहे है नतीजा दिल्ली के चुनाव और फिर बिहार के चुनाव में करारी हार मिलना।  यद्दिप मोदी सरकार चाहते तो फिर भी इस खाई को भरी जा सकती थी परन्तु केंद्र सरकार के मंत्री ने मंहगाई को लेकर जिस कदर आँख मुंड लिए थे इस कारन भी जनता में आक्रोश है  इसका और भी प्रतिक्रिया देखनो को मिल रहे है और आगे भी देखने को मिल सकते है  ।


देश के जनता सरकार से हताश है और सरकार यदि यथाशीघ्र कई उपयुक्त और सकारात्मक कदम नहीं उठाती  है तो आगमी पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के चुनाव में अनुकूल परिणाम मिलने का भी आसार नहीं है  क्यूंकि जनता के जहन में अब धीरे -धीरे यह बात घर बना रही है कि सभी दल का एक ही लक्ष्य है सत्ता हथियाना और एक बार सत्ता मिल जाता है फिर सबका व्यवहार एक जैसा ही हो जाता है मसलन कांग्रेस , भाजपा और आप, सबके काम करने की तोर -तरीके एक जैसे ही है। अब मोदी सरकार को जनता के जहन से इस बात को घर बनाने से पहले निकालने होंगे अन्यथा भविष्य में एक  भी चुनाव जीतना मुमकिन नहीं होने वाला है इसके लिए चुनाव के दौरान जो अच्छे दिन का जो नारा लगाये गए थे उसे बिनाविलम्ब अम्ल में लिए जाना चाहिए क्यूंकि समय बहुत ही कम है और काम बहुत ज्यादा किया जाना है।

सरकार को असहिष्णुता के प्रति गंभीर होने की जरुरत है यदि यह अफवाह है तो इसे उजागर किया जाना चाहिए यदि इसके पीछे कोई साज़िश है तो इसका भी पता लगाना चाहिए कारणस्वरूप सरकार के विरोधी ने इस तरह का परिवेश भी बनाने में कामयाब रहे है जिसका फायदा उन्हें बिहार के चुनाव में मिला, नतीजन हर गली नुक्कड़ में असहिष्णुता को लेकर बहश छिड़ी हुई है जबकि वास्तविक में लोगों के लिए शायद ही गंभीर मसला है सिर्फ मिडिया और उन्ही के इर्द -गिर्द नाचने वालों के सोंच के उपज है जिसे परिपक्ता से रोकना अत्यंत  आवश्यक है। अन्तोगत्वा बिहार का चुनाव मोदी सरकार के लिए सबक साबित होनेवाला जो इन्हे आगे की राजनीती को दिशा- दशा  देनें में अहम साबित होनीवाली है यद्दिप इस सबक को सकारात्मक दृष्टि में लेकर भविष्य की रोडमैप  सुनिश्चित करे।

















रविवार, 20 सितंबर 2015




 बिहार चुनाव में ये बेगाने कौन ?


बिहार में शिवशेना और ओबैशी चुनाव लड़ेंगे आखिर चुनाव के जरिये क्या टोटलने का प्रयास में लगे है दोनों पार्टी  या इनके मकसद चुनाव जीतनका नहीं बल्कि कुछ और ही है ? क्या चुनाव के जरिये ओबैशी आगामी उत्तर प्रदेश के चुनाव के रणनीति  को जोरकर तो नहीं देख रहे है क्यूंकि बिहार और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम की जनसँख्या लगभग में १ ५-१७  प्रतिशत है जिसमें से ज्यादात्तर लोग ओबैशी को अपने रोल मॉडल मानते है ऐसे ही लोगो के झुकाव को देखते हुए ओबैशी उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनाव लड़ने की जुर्रत करेंगे अन्यथा इन्होने बिहार और उत्तर प्रदेश के मुस्लिम भाइयों के लिए अभि तक कुछ  भी नहीं किया और जँहातक इनसे कुछ उम्मीद करना भी मुनासिब नहीं होगा क्यूंकि इनके फिदरत में कुछ करने की चाह है ही नहीं, वे सिर्फ अलगाववादी राजनीती के हिमायती है, जो धर्म और महजब के नाम पर जहर उगलते है और इस जहर को लोगो के बीच परोसकर अपना उल्लू सीधा करते है।

दूसरी तरफ शिवशेना भी बिहार के चुनाव  के लिए कमर कस ली है  यद्दपि जीतने के लिए तो कतई नहीं पर अन्य पार्टी की चुनावी समीकरण को तहश -नहश करने लिए हो सकता कुछ सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारे  जो कि  भाजपा और उनके गठबंधन के अंकगणित बिगाड़ सके।  वास्तविक में राजनीती में शर्म और हया के लिए कोई जगह नहीं होता है एक तरफ शिवशेना मुंबई में प्रवाशी बिहारी को नीचे दिखाने व पीटने का कोई मौका नहीं छोड़ते वहीँ बिहार चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारने के लिए काफी अग्रसर है आखिर किस भोरषे, क्या बिहार के मतदान में मराठी मानुष वोट गिराने के लिए तो नहीं आने वाले है?  अनुमानतः  भाजपा के साथ कटुता रही है इसी खातिर जो थोड़ा बहुत परेशान कर सकते उसमें कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते है शायद इससे बेहत्तर मौका फिलहाल मिलने है भी नहीं फिर क्यों छोड़ें ? हालाँकि शिवशेना यंहा जीतने के लिए  कदचित्त चुनाव नहीं लड़ेंगे यद्दपि भाजपा का एक दो प्रतिशत भी वोट काट काफी आघात पहुँचा सकते है और   महाराष्ट्र के चुनाव में भाजपा ने जो रणनीति अपनाई थी  उसका खामियाज़ा किस हद भाजपा से वसूल की जाती है इस बिहार के चुनाव में और ये भी सहज नहीं होगा कि इसकी  भरपाई कँहा और कैसे कर पायेगी ?  अब देखना यह भी है कि बिहारियों  के बीच में शिवशेना क्या छवि है, और कितने सीट पर  शिवसेना ज़मानत बचा पाती है क्यूंकि बिहारियों को भी ठाकरे बंधू के खिलाफ खीश है और हो सकता वे भी इसी चुनाव के माध्यम से बदला लेने में सफल हो जाये और ठाकरे बंधू को सबक सिखा पाये।

बरहहाल बिहार के चुनाव में कितने दोस्त दुश्मन बन जायेंगे और कितने दुश्मन दोस्त बन जायेंगे फिलहाल इनका अंदाजा लगाना आसान नहीं पर जो भी हो बिहार के चुनाव से पुरे भारत की राजनीति की तस्वीर और तक़दीर बदलने वाली है।  हाल में ही जनता परिवार महा गठबंधन में से सपा अलग हो गयी जो इस गठबंधन के लिए बहुत बड़ा झटका है अब इनसे जनता परिवार को कितना नुकशान होगा यह चुनाव के बाद ही निश्चित होगा पर इस बिखराव से महागठबंधन के विस्वनीयता के ऊपर ग्रहण तो लग ही गए।  अंतोगत्वा बिहार का चुनाव कई मायने से दिलचस्प होने वाले है अब देखना है कि  एक बिहारी सब पर कितना भारी है?




जँहातक  समर्थन  की बात है तो मैं भी चाहता हूँ कि बिहार में भाजपा की सरकार हो पर ऐसा होता नहीं दिख रहा है क्यूंकि इसका मुख्य वजह भाजपाई का अत्यधिक आत्मविस्वास जो इनके लिए नुकशानदेह हालाँकि  इसी प्रकार का आँकलन  दिल्ली के चुनाव भी दिया था पर किसी ने भी इनपर विस्वास नहीं कर पाया नतीजा सबके सामने है। कभी- कभी अत्यधिक आत्मविस्वास भी निराशा का कारण बनता है और यही हुआ था दिल्ली के चुनाव में पुनः एक बार यह देखने को मिलेगा बिहार के चुनाव में  यदि यथाशीघ्र जरुरी कदम नहीं उठाया गया।  बिहार के चुनाव का परिणाम लोगों को झकझोड़ देने वाले होंगे इंतज़ार कीजिए उस क्षण को जब कल्पना से परे सबकुछ होनेवाले है।  यदि भाजपा को फायदा मिलेगा तो एक ही कारण  से कि नीतीश जो  लालू के साथ गए अन्यथा सब कुछ वँहा पर विरुद्ध ही जा रहे है। यद्दपि  टिकट वटबारें को लेकर भी भाजपा को आगाह करना चाहूंगा कि बाहरी और अयोग्य उम्मीदवार को जीतना बड़ी मुश्किल है पचास प्रतिशत ही उम्मीद किया जा सकता है कि इस तरह का उम्मीदवार चुनाव जीत पाएंगे।  एक बात तो शुनिश्चित है कि बिहार चुनाव के परिणाम आने के बाद बड़े -बड़े ज्योतिषिचार्य और अंकगणित विशेषज्ञ का सभी सभी के जोड़ -घटाऊ का हवा निकलनेवाला है। वेट एंड  वॉच ......................... !!!


शुक्रवार, 4 सितंबर 2015


घर की मुर्गी दाल बराबर..........?

"घर की मुर्गी दाल बराबर" वास्तविक में इन दिनों यह कहावत का तातपर्य रह नहीं गया क्यूंकि इनदिनों लोग मुर्गी नहीं दाल के लिए तरस रहे है।  मंहगाई के मार में प्रायः अधिकतर लोगो के घर इनदिनों दाल नहीं गलते इसीलिए तो दाल और मुर्गी के मूल्यों में तुलना करेंगे तो पाएंगे कि मुर्गी खानेवालों के लिए मुर्गी सस्ती हो गयी और दाल मंहगा।  सरकार क्या करे? जमाखोरों ने जो लागत लगाये थे चुनाव के दौरान उस ऐवज़ में मुनाफा तो वसूलेंगे ही, क्यूंकि बिना फायदा का तो बाप भी बेटा का भला नहीं करते फिर चुनाव में करोडो -अरबो का खर्च के लिए पार्टी फण्ड में जो चंदे दिया उसके बदले में कुछ फायदा तो बनता ही है।
फिलहाल मुर्गी खाने वाले भी खुश नहीं है, क्यूंकि क्या करे, मुर्गी से ज्यादा मसाला भारी है नहीं समझे तो समझने  कोशिश कीजिये, फिर भी नहीं समझे , चलो  बता ही  देते है, " दो रुपये की मुर्गी नौ रुपये का मसाला" ऐसे में कौन मुर्गी खाए?, जनाब, बिना प्याज के सब्जी का स्वाद नहीं लगता फिर बिना प्याज का मुर्गी का स्वाद क्या होगा?, बरहाल मुर्गी भी नहीं खा सकते फिर क्या करेंगे नमक रोटी खा कर गुजारा कर लेंगे लेकिन बिना प्याज के नमक रोटी भी गले से नीचे उतरने में शरमाते हालाँकि चीनी के मिठांस का  मजा लिया जा सकता पर सिर्फ चीनी का ,  मिठाई का नहीं क्यूंकि मिठाई का मूल्य में दिनों दिन बढ़ोतरी हो रही है बेशक चीनी शुष्ट पड़ी हो वस्तुतः चीनी का भी ज्यादा मजा नहीं लिया जा सकता क्यूंकि इनका साइड इफ़ेक्ट का कोई तोड़ नहीं है और एक बार इन्होने अपनी ताक़त का अजमाइश कर दिया तो जिंदगी भर आपको  भुगतना पड़ सकता है ऐसे में चीनी से ज्यादा करीबी, नुकशानदेह है,  सावधान रहे!

दरअसल में एक तरफ ईंधन के मूल्य में गिड़ावत वही सभी प्रकार के रोजमर्रा के वस्तु हो अथवा खाद्य प्रदार्थ उनके दाम नीचे जाने के बजाय आसमान को छूने में लगे हुए है ऐसे परस्थिति में सरकार और वृत्त मंत्री  के योजना पर प्रश्न चिन्ह  लगाना कतई अनुचित नहीं है क्यूंकि किसी भी तरह के उत्पाद वस्तु हो व आनाज अथवा साग सब्जियों का मूल्य जिस तरह से बेहताशा इजाफा  हो रहे है अत्यंत  चिंता का विषय है क्यूंकि देश के अधिकाधिक लोग के आमदनी में बढ़ोत्तरी काफी जद्दोहद के वाबजूद शुनिश्चित नहीं है कि होगी ही , जबकि मंहगाई रोज एक नयी कृतिमान स्थापित करने में लगी है। यद्दीप सरकार को सब कुछ ज्ञात है इसीलिए तो केंद्रीय कर्मचारी को मंहगाई के आधार पर DA में बढ़ोत्तरी करती रहती है पर ज्यादात्तर गरीब और किसान लोगों का क्या होगा?, जो कि   ८० से ८५ प्रतिशत जनसख्या के लिहाज से है, क्या वे इस बेइंतहा महंगाई से प्रभावित नहीं हो रहे है?, क्या सरकार को इनके लिए कोई जवाबदेही नहीं बनती है?, अगर सच में सरकार इन लोगों प्रति संवेदना रखती है तो क्यों न यथाशीघ्र कारगर कदम उठाती है सरकार और अफसरशाहों  सरक्षण में ही जमाखोरी का खेल हो या उत्पाद वस्तुओं का दाम बढ़ाने का प्रतिस्प्रधा संभव है  अन्यथा सरकार पूरी सिद्दत  से इनके ऊपर नकेल कसें तो इस तरह अन्यास दामों में बढ़ोत्तरी को रोकी जा सकती है , पिछले एक साल में ज्यादात्तर दवाइयों  के दाम में  २० से ४० प्रतिशत  बढ़ोत्तरी देखे गए है इसीलिए  लोग मंहगाई से लड़ने  में असमर्थता के कारण बीमारी से लड़ते रहते है हालाँकि सरकार छोटी -छोटी बातों का ख्याल कहाँ तक करे कारणस्वरूप जनता को उनके हाल पर छोड़ दिए है। 

आखिरकार कब तक एक वर्ग के लोगो के हित का उपेक्षा की जाती रहेगी क्यूंकि सियाशी दाँव -पेंच में संवेदना और विवेक भूल जाते है जिस कारण इनलोगों को सरकार के प्रति उदासीनता भलीभांति देखि जा सकती है जो कि भविष्य में एक क्रांति का जन्म देने के लिए काफी सिद्ध होगी। 

 
आपका क्या प्रतिक्रिया है मंहगाई के संदर्भ में जरूर अवगत करायेगा अपने टिप्पणी के माध्यम से।

गुरुवार, 3 सितंबर 2015


मानिये प्रधानमंत्री,
मैं आपसे अनुरोध करना चाहता हूँ कि इन दिनों ईंधन  के मूल्य और चीनी के मूल्यों काफी गिड़ावत  हुई वाबजूद इसके न मिठाई का दाम कम  किये गए और न रोजमर्रा के जरुरत के चीजों  के दामों  में गिड़ावत दर्ज देखे गये, मसलन सस्ते ईंधन होने का फायदा आम आदमी को नहीं मिल रहा है जबकि मुनाफाखोरों ने आम आदमी के जेबों को ढीले करने में लगे हुए है इसका मुख्या कारण  है कि  हमारे देश में  कॉमन प्राइस कंट्रोल कमिटी का न होना इसीलिए  खुदरा मुनाफाखोरों अपने सहूलियत के हिसाब से  वस्तु  का मूल्यांकन करते है।  दरअसल में जैसे  ईंधन का मूल्य बढ़ जाता है तो तुरंत मूल्यों में बढ़ोतरी करने से बाज़ नहीं आएंगे जबकि मूल्य घटाने के नाम पर कनि काट जायेंगे।  अन्तः  मैं देश के प्रधानमंत्री से सादर निवेदन करूँगा कि देश हित  व देश के  लोंगो  के हित को ध्यान में रख कर एक  कॉमन प्राइस कंट्रोल कमिटी का संरचना करने का  कृपा करे जो खुदरा जैसे रोजमर्रा के वस्तु, मिठाई  व पब्लिक परिवहन के किराये के ऊपर नियंत्रण रखे और ऐसे मुनाफाखोरों के ऊपर लगाम कसे जो अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी भी वस्तु के मूल्य तय कर रहे है वे भविष्य ऐसा न करे।  जय हिन्द …। 

आजादी  तो हमने हाशिल कर लिए हैं पर आज भी हमारे बीच में बहुतो है जिनको  यह रास नहीं आते है पर   हम फिक्र क्यूँ करे इन अवसरवादी और ख़ुदगर्जों का,  आज़ादी हमारे पुरखो की विरासत है जिन्होने इसके खातिर क़ुरबानी दी है इसलिए आज़ादी हमारा मौलिक अधिकार है जबकि इनको बरकरार रखना हमारा कर्तव्य है, जय हिन्द, जय भारत!!

ब्राह्मण वर्तमान परिदृश्य में  सबसे नीच जाति है और शायद इसी के काबिल भी है  क्यूंकि ये सिर्फ खुदको लेकर ज्यादा चिंतित होते है जबकि  उनके आत्मसम्मान और विवेक अपनी जाति और धर्म के प्रति  तनिक भी शेष नहीं बचा ऐसे में जिस हाल में है इसके खुद ही जिम्मेवार है।  क्यूंकि चाहे शाशन हो या प्रशाशन आज भी इनके परामर्श के बिना कोई आरक्षण व कोई अन्य राजनितिक प्रेरित आत्मज्ञान इन आरक्षण के पुजारी हो अथवा राजनीती के दिग्गज हो ही नहीं सकता। मसलन एक हार्दिक पटेल पुरे  पाटीदार समुदाय को एक मंच पर  ला कर खड़ा कर देता है चाहे आरक्षण के समर्थन में ही क्यों ना हो पर यदि हम सवर्ण जो आज भी देश के बुद्धजीवियों में अच्छी खाशी तादाद में है, होने के वाबजूद भी  एक मंच पर नहीं  आ रहे जबकि यह लड़ाई पुरे देश के हिट में है क्यूंकि आरक्षण युक्त महापुरुष पद तो हाशिल कर लेते पर उसके गरिमा के साथ पूर्णतः न्याय नहीं कर पाते है नतीजा  देश में तीव्र दिम्माग के लोग मुंह तक्कु बने रहते है जबकि आरक्षण के कृपा से ऐसे लोग शीर्ष पदो पर आशिन होते है जिनके  निर्णयन लेने के क्षमता के प्रायः अनुकूल नहीं है। दरअसल  मैं  काफी जद्दोजहद के बाद ये विचार किया की क्यों ना  एक ऐसा मंच तैयार किया जो आरक्षण का वरोध करे इसके लिए मैंने आपको लोगो को भी सन्देश भेजा पर आपलोगों  का जिसतरह का प्रतिक्रिया मिला वह किसी भी स्थिति में  इसके पक्ष  में  नहीं थे अर्थात मंच को लेकर आज भी अंसमंजस में हूँ और गहन आत्ममंथन कर रहा हूँ क्यूंकि बिना समर्थन का कुछ भी संभव नहीं है।  जहाँ तक मैं इस मंच पर एक साथ देखना चाहते वे न सिर्फ ब्राह्मण ब्लीक पुरे सवर्ण को एक साथ ला कर एक जन आंदोलन का आगाज़ करना चाहता हूँ ताकि सरकार आरक्षण को लेकर पुनः विचार करे और इसे पूर्णत व धीरे -धीरे बंद करे नहीं तो सवर्ण सरकार को तब तक आयकर का भुगतान नहीं करे, जब तक सबको सामान्य कैटगरी का दर्जा  नहीं देती है व आरक्षण को पूरी तरह निरस्त न कर देती, तबतक यह लड़ाई जारी रहेंगे। इसके लिए सभी जाति  जो सवर्ण कैटगरी में आते है एक साथ -एक मंच पर आकर तब तक लड़ाई लड़ना होगा जब तक उनके मांग को मान नहीं ली जाती है।  यदि आपलोग वाकये इसके पक्ष में है तो आप अपना समर्थन देने का वायदा करें , जो हजार नहीं लाखो में हो इसके लिए अपने सम्पर्क में जितने सवर्ण जाति के लोग है उनको शामिल होने के लिए  प्रोत्शाहित करे और अपना समर्थन like, cooments के साथ रिप्लाय करे।  ध्यानबाद !!!


 केजरीवाल और जनता परिवार…………………… 


केजरीवाल  वाकये में आज की राजनीति के सबसे मजे हुए खिलाडी खुदको साबित करने में लगे है, जनाब जिन्होंने कांग्रेस के नीतियों के खिलाफ शंखनाद करके राजनीती के पृष्ठभूमि पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई हो लेकिन वही महान व्यक्ति आज कांग्रेस और उनके सहयोगी के साथ भविष्य की राजनीति की ब्लू प्रिंट तैयार कर रहे हो, इस तरह महत्वाकांक्षी सोच रखनेवाले आदमी से कोई सकारात्मक अपेक्षा रखना शायद ही उपयुक्त हो क्यूंकि राजनीती में छूट और अछूत को परिभाषित करना  कभी भी सहज नहीं रहा फिर भी जिनके नीति और नियति पर प्रश्न चिन्ह लगाकर खुदको जन हितेषी बताकर अपनी राजनीती के सितारे को बुलंद करते रहे है बाद में उन्ही पार्टी के साथ अनैतिक सांठ -गाँठ करके आगे की राजनीती को दशा और दिशा देने के तत्पर हो   अब उन्हें किसी भी तरह के लोगो से परहेज़ नहीं है, ऐसे लोगो से आम आदमी का भला कतई संभव नहीं परन्तु ऐसे लोगो से  देश और प्रान्त के नुकशान शुनिश्चित है इनमें किसी तरह का संकोच नहीं होनी चाहिए।

केजरीवाल  आज के राजनीती के शायद पहला मुख्यमंत्री जो बिना स्टेपनी के एक कदम भी नहीं खिसकते है। उनके यह सावधानी से जरूर सीख मिलते है कि इक-इक  ग्यारह होते है इनसे अपनी सोच और कार्य करने की क्षमता पर  काफी बल पड़ता है इसीलिए तो शोले में जय और वीरू की जोड़ी और आजके राजनीती के परिदृश्य में सिशोदिया और केजरीवाल की जोड़ी काफी हिट है।  केजरीवाल ने अब नीतीश कुमार के साथ मिलकर लालू यादव के पद चिन्ह पर चलकर भविष्य की शियासी समीकरण को नज़र में रखते हुए जाति और प्रान्त आधारित राजनीती की अंकगणित को दुरुस्त करने में लगे  है  फलस्वरूप  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लालू और मुलायम से अब केजरीवाल को दिक्कत नहीं और वे दिन  दूर नहीं जब केजरीवाल भ्रष्टाचार के स्तम्भ के साथ मंच साझा करते दिखे।  वैसे भी राजनीती के स्तर का कोई मापदंड तो कुछ  चिन्हित होता नहीं फिर भी राजनीतज्ञ को कुछ तो अपने विवेक का लिहाज़ रखनी चाहिए ताकि आखरी पड़ाव में जब राजनितिक जीवन का आकलन करे तो खुद ही शर्मसार अपने किये हुए पर न होना पड़े।

दरअसल में केजरीवाल को भलीभाँति ज्ञात हो गया की मुलभुत मुद्दा अब रहा नहीं, किये गए वायदे को पूरा करना कतई संभव नहीं है यद्दीप  लालू और मुलायम की राजनीती को अपनाने से ही दीर्घकाल तक सत्ता का स्वाद चखा जा सकता है।  बिहार और उत्तर प्रदेश से आये हुए भरी तादाद में लोग को ध्यान में रखकर जनता परिवार का जो गठबंधन है उनके इर्द-गिर्द घूम रहे है क्यूंकि बिहार और उत्तर प्रदेश से आये हुए लोगो का समर्थन मिलता रहे तो शायद ही  कोई सत्ता से वंचित रख  सकता , वस्तुतः बिहार के ३१ प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के लगभग ४० प्रतिशत दिल्ली के मतदाता है जो किसी भी पार्टी को सत्ता पर काबिज़ करने के लिए काफी मन जा सकता है यदि इनको रीझां पाये तो केजरीवाल की राजनीती सितारे सदैव चमकते रहेंगे और इनको रिझाने में लालू , नितीश और मुलायम अहम रोल निभा सकते है।  इस समीकरण को ध्यान में रखकर केजरीवाल ने जनता परिवार के साथ  जाने में थोड़ी भी संकोच नहीं है।

वास्तविक में लालू, मुलायम और केजरीवाल की राजनीती में कुछ भी भिन्नता नहीं है क्यूंकि इन तीनो का राजनीती करियर का आगाज़ कांग्रेस को खात्मा के लिए होते है पर समय के साथ इन सबका नजरिया बदल जाते है और ये लोग कांग्रेस के साथ मिलकर कांग्रेस के मुलभुत विपक्षी को अपना दुश्मन मान कर एक खेमे में आकर खड़े हो जाते है हालाँकि इस तरह का अनैतिक गढ़बंधन समय के साथ- साथ  अपना स्वरुप बदलते रहते है क्यूंकि इस तरह के गठबंधन का भविष्य सुनिश्चित नहीं होती है क्यूंकी इस गठबंधन के प्रति लगाव तभी तक रहता है जबतक ये मददगार हो जैसे ही मौका निकल गया फौरन एक फिर अन्य गठबंधन का ताना -बाना बुनने लगते है।  फिलहाल  केजरीवाल और नितीश एंड कंपनी का वर्तमान में जो करीबी है भविष्य में देखना है की कबतक रह पाते है और किस हद तक रह पाते है ।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015



 हार बड़ी या जीत ?


चाहे लोक सभा का चुनाव हो अथवा दिल्ली के विधान सभा का चुनाव हो लहर में नौसिखुआ जहाँ फ़तेह कर पाने में कामयाब रहे वही सूरमाओं ने पटकनी ही खा कर पस्त हो गए  इस तरह के परिणाम से अब यह भी तय हो गया कि जनता अब पार्टी और नेता के कद देखने के वजाय उसे सबक़ सिखाने से हिचकते नहीं अर्थात अब सभी प्रदेश व देश के सरकार को इससे सबक लेकर बिना विलम्ब सभी वायदे को पूरा करने का पुरजोरकोशिश करनी चाहिए अन्यथा कुर्सी से हाथ ढोने को तैयार रहनी चाहिए।  लोकतंत्र का इससे बढियां स्वरुप शायद ही कोई और होगा जो सभी प्रकार के विभिन्नता को पीछे छोड़ किसी एक पार्टी को  ऐतिहासिक जीत दिलाने में प्रति समपर्ण हो।  हालाँकि ये जीत को सरलता से नहीं लिया जाना चाहिए क्यूंकि जनता सिर्फ वायदे के आधार पर यदि किसी भी पार्टी को पक्ष में मतदान करती है इसका तात्पर्य यह है कि जनताके  अपेक्षा पर खड़े उतरे नव गठित सरकार।

दरअसल में जनता को अब चेहरा और पार्टी का मतलब समझ में नहीं आती सिर्फ उनके उपलब्धि को सामने रखकर वोट करती है।  जिस कदर लोकसभा चुनाव में आप को सबक सीखने के लिए दिल्ली के सभी सीटों पर बीजेपी को जीत दिलायी गयी उसी तरह इस विधानसभा में बीजेपी को सबक सीखने के लिए आप के पक्ष में ज्यादातर दिल्लीवासी वोट डालें नतीजन ७० में से ६३ सीट आप ने प्राप्त की। दिल्लीवासी में अधाधिक वे लोग है जो रोजमर्रा के परेशानी और मंहगाई से त्रस्त से जिन्हे शायर मार्किट का उछाल हो अथवा जीडीपी ऑन ट्रैक हो के बारे में क्या लेना देना है क्यूंकि बेशक ईंधन के मूल्य में भारी गिरावट दर्ज हो पर चावल-दाल का रेट घटने के वजाय ऊपर ही जा रहे है इसीलिए तो लोंगो ने बड़े बड़े कूटनीतिज्ञ को चित्त कर दिए।

आखिरकार कुछ ऐसे भी लोग है जो अपने दम पर मुखिया का चुनाव नहीं जीत सकते लेकिन देश की हर छोटी बड़ी नीति उनके ही घर के कोनो में बनते -बिगड़ते है जिसको सिर्फ अपने स्वेच्छा के आधार पर मूल्यांकन करते है जिसे जनता न ही समझ पाती  है और न ही लाभ उठा पाती जबकि ऐसे लोगो खुद ही मियाँ  मिट्ठू बनकर फिरते है जो देश और जनता के लिए ही नहीं ब्लिक वे खुद के पार्टी और पार्टी में काम करने वाले के हजारों कार्यकर्ता लिए घातक है।  यदि दिल्ली विधानसभा के चुनाव को गंभीरता से नहीं लिए गए तो आने वाले दिनों में बिहार और बंगाल के चुनाव और भी हताशा से भरे मिलेंगे जो बड़े - बड़े बांकुरों को खाक मिला देंगे।राजनीती के दिग्गज को यह भलीभांति ज्ञात होनी चाहिए कि जनता वह पारसमणि है जो भंगार लोह को  भी सोने में तब्दील कर सकते है व बिलकुल सूर्य के भांति है जिनके रहमो करम पर चाँद सितारे की तरह रोशन कर सकते है और जैसे ही बिमुख हुए आपका चमक तो गायब होगी ही साथ में आपके नामोनिशान ढूढने पर नहीं मिलेंगे।  बरहाल जीतनेवाले को भी आत्म मंथन करके विन्रमता से जनता से किये हुए वायदें को पूरा करना चाहिए जबकि हराने वाले को आत्म चिंतन करके अपने खामियों को दुरुस्त करना चाहिए।


 सूट है या सुहानुभूत ?

 


जिस सूरत शहर के नामचीन उद्योगपति एक सूट के लिए चार करोड़ से ज्यादा खपत कर सकते, जँहा तक मेरा निजी अनुभव है  वँहा  के लोग मुफ्त में एक पैसा खर्च नहीं कर सकते क्यूंकि जिस कदर एक नामी ग्रामी उद्योगपति का व्यवहार मैंने देखा है जिनको तीस से चालीस लाख रुपैया का भुगतान करने के लिए पिछले एक साल से लगातार आग्रह करने के वाबजूद न ही रकम अदा कर रहे है और न ही नुकशान के भरपाई करने के लिए इच्छुक है। जँहा के लोगों के ऐसी प्रवृति है जो बेहद मनी माइंडेड है, क्या वे शौक के खातिर इतना खपत कर सकते है पर कर जाय तो  सवाल तो उठाना लाज़मी है क्यूंकि बोली लगानेवाले ज्यादातरलोग आयकर विभाग के निशाने पर पहले से रहे है? ऐसा तो नहीं है कि ये लोग इस बोली के जरिये प्रधानमंत्री का सुहानुभूति अर्जित करना चाहते हो जिसके बल पर अपनी काली कमाई का सरक्षण कर पाये ।  जो भी हो अधिकाधिक लोगों के इस तरह के कारनामों से काफी हैरान है और सबके जहन में एक ही प्रश्न उठ रहा होगा, क्यूंकि ये बोली अन्यत्र भी लगाये जाते पर गुजरात और उसमें भी सूरत को ही क्यूं चयन किया गया? बरहाल इसका सवाल अतिशीघ्र मिलना शायद मुमकिन न हो पर ज्यादा दिन इसको ढूढने में नहीं लगेंगे………………………!

सोमवार, 15 दिसंबर 2014



दिल्लीवाले माफ़ कर पाएंगे .........................?



 वैसे सभी पार्टी कुछ न कुछ नुश्खा अपनाते रहते है ताकि चंदा और वोट इकट्ठा करने में काम आये  लेकिन केजरीवाल का जो नुश्खा है वाकये में बेमिशाल है इसलिए तो अपनाकर जिस तरह इन दिनों डिनर और लंच पार्टी देने में व्यस्त है ये हैरतअंगेज कारनामा कहा जा सकता है। बेशक चुनाव-ए-दावत के माध्यम से चंदा तो इकट्ठा कर ही रहे है साथ में मीडिया का शुर्खिया मुप्त में बटोर  रहे है। इसे चंदा का फन्दा ही कह सकते है जिसके जरिये लोगो को उल्लू बनाकर खूब मोती रकम इकट्ठा किये जा रहे है।  जबकि दिल्ली के लोगो का मोह उनसे भंग हो गया इसी कारन से इस तरह के नुख्शा अपनाने पर आमादा होना पड़ा क्यूंकि जो मध्यमवर्गीय लोग तन मन , धन से आम आदमी को समर्थन कर रहे थे पर लोगो को जैसे ही ज्ञात हो गया कि इनके टोपी पर ही सिर्फ लिखा है आम आदमी अन्यथा इनके चरित्र और आचरण तो खाशमखस है ऐसे में अब इनको हमारी क्या जरुरत ? कारणस्वरुप जाहिर है पार्टी के प्रति जो स्थान लोग के दिल में था अब शायद कदाचित ही देखने को मिलें।

लोग का सोच वाकये में सटीक है क्यूंकि जो आदमी ३० हजार की थाली परोसने का दम  रखता है या जिनके साथ खाने के लिए कुछ खाश वर्ग के लोग तीस हजार तक चुकाने को तैयार है ऐसी परिस्थिति में इन लोगो को आम आदमी का संज्ञा देना तनिक भी मुनासिब नहीं है।  इसका तातपर्य है कि दिल्ली के ज्यादातर मध्यमवर्ग और गरीब जनता आम  आदमी पार्टी से बिमुख हो रहे है फिर केजरीवाल का चुनावी महा संग्राम में विजयी कौन बनायेगे क्यूंकि अपर क्लास तो पहले से ही इनको नाक्कार चुके है ऐसे में अपर मिडिल क्लास के ऊपर दारोमदार होंगे जो इनको दिल्ली के सत्ता पर काबिज करेंगे हालाँकि तादाद के आधार पर देखा जाय तो अथक प्रयास के उपरांत भी २ -४ सीट भी जीता दें उनका गनीमत होगा।

दरअसल में दिल्ली के जनता केजरीवाल के द्वारा दिए गए दुर्दशा को अभी तक बिसार नहीं सकें है और उनके द्वारा उठाये गए ऐसे अनेको कदम, जिसका हर्जाना दिल्ली के जनता पिछले एक साल से चूका रही है जिसके लिए शायद ही उन्हें माफ़ कर पायेगी। जो ख्याली पलाऊ उन्होंने गत चुनाव के दौरान पकाये थे खुद ही चुनाव के बाद उस पर रायता फैला कर भाग गए, नतीजा आज भी जनता भुगत रही है।  जो व्यक्ति विवेक और संवेदना से ज्यादा अहमियत अपनी आकांक्षाएं को देता है उनके पर आखिर जनता कैसे विस्वास करेगी।  जब चारो खाने चित्त हुए अन्य कोई विकल्प के आभाव में फिर से दिल्ली के तरफ रुख किये ऐसे में दिल्ली वासी क्यों उनको समर्थन करे। ऐसा भी हो सकता है कि फिरसे अचानक अहसास हो चले कि प्रधानमंत्री का प्रबल उम्मीदवार वही है इसके लिए बिना विलंब फिर दिल्ली से कँही और चला जाए तो फिर दिल्ली का क्या होगा ? क्या दिल्ली वालें इस तरह का  प्रतिकूल स्थिति के लिए पुनः तैयार है? हरगिज़ नहीं क्यूंकि  दिल्ली के ज्यादातर लोग  पढ़े लिखे और भद्र है जो व्यवस्था में आस्था रखते है और वे कतई नहीं चाहेंगे कि  किसी भी महत्वाकांक्षी के भेंट दिल्ली को चढ़ाये जाए।  जँहातक  लोक सभा चुनाव के बाद भारत के राजनीती का परदृश बिलकुल बदल गए है,  एक तरफ पुरे देश के छोटे -बड़े दल एक शख्श के इर्द -गिर्द सिमट कर रह गए  फिर बोन व असहज दिखाई दें रहे जबकि विपक्ष अपने वजूद को पुनसर्जित नहीं कर पा रहे है।  ऐसे में जंहाँ क्षेत्रीय पार्टी स्वंय को स्थापित करने के लिए पुरजोर कोशिश में लगे है वही महागठबंधन की भी कवायद जोरो पर है हालाँकि अभी इसका सकारात्मक परिणाम का कयास लगाना अत्यधिक कठिन है क्यूंकि आज तक इस तरह का गठबंधन भारत के राजनीती को न कभी उपयुक्त दिशा और न हीं अनुकूल दशा दी है फिर भविष्य में कितना कारगर होगा यह अभी तय करना बेशक बेतुकी होगी।


 लोकतांत्रिक देश में लोकतान्त्रिक पार्टी अत्यधिक आवश्यक है फिर भी यदि पार्टी के अंदर ही उनके लोकतंत्र पर सवाल उठाये जा रहे हो फिर इस तरह के पार्टीयों के हाथ देश और प्रदेश का कमान कितना सुरक्षित है यह आत्मचिंतन का विषय है क्यूंकि एक लोकतंत्र देश में सदेव और सर्वत्र लोकतंत्र व्याप्त होना चाहिए इसके लिए सभी राजनितिक गणमान्य बांकुरों को सतत प्रयास करना चाहिए कि पहले अपने दल के अंदर फिर राजनीतिक परिवेश में लोकतंत्र को जीवित रखे। जिस तरह से आआप से एक - एक कर कई महारथी पहले तो पार्टी से खुदको अलग किये फिर पार्टी के अन्तरलोकतंत्र के ऊपर जो कटाक्ष व टिप्पणी किये इनसे साफ़ जाहिर है कि पार्टी के अंदर कुछ तो  है जिससे सबको राश नहीं आ रहा है अर्थात उसके लिए सर्वसम्मति नहीं रखते है।  जो पार्टी अपने चंद मुठ्ठी भर लोगो को खुश नहीं रख सकते है उसके लिए प्रदेश के आवाम को खुश रखना मुमकिन नहीं है।

 दिल्ली  प्रदेश के चुनाव शायद कुछ बढियां होने वाला है तो वह है कि इस बार कोई भी पार्टी झूठे वायदे करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे क्यूंकि दिल्ली वालें पिछले चुनाव से अगर कुछ सबक लिया तो वास्तव यही हो सकता है। आआप ने जाने कितने वायदे किये पर जब इस निभाने का वक्त आया तो बहाना  बना कर भाग गए जबकि अन्य पार्टी बेशक अनेकोअनेक वायदा करे पर निभाने का दम शायद ही किसी में हो अन्तः समस्या यथावत ही रहेंगी क्यूंकि पार्टी जब तक चुनाव नहीं जीतते तब तक उनके लिए जनता सर्वोपरि रहती है जैसे ही चुनाव जीत कर सत्ता पर काबिज़ होती है तो जनता से ज्यादा फिक्रमंद सत्ता और व्यवस्था के लिए हो जाते है क्यूंकि इनको हकीकत आहिस्ता -आहिस्ता समझ में आने लगती कि सत्ता है तो हम है और हमारे आस पास चकाचोंध और हमारी साख है वर्ना हमारे और आवाम में फर्क ही क्या  रह जायेगा ? अन्तः पहले सत्ता को और खुदको स्थापित कर सत्ता से चिपके रहने के लिए प्रयास और उस सोच को बल देती है फिर व्यवस्था को अपने अनुरूप बनाने के लिए अग्रसर दिखते है यद्दीप इन कामो के लिए अगर धन की जरुरत पड़ेगी इसके लिए जनता के जेबें ढीली करने लग जाती है अर्थात पार्टी जबतक सत्ताधारी न हो तब तक के लिए ही जनता की हितेषी बनी रहती है एक बार सत्ता क्या हाशिल किया फिर तो कँहा फुर्सत रह जाती है  जनता का सुध लें।


राजनीती धरातल वास्तव में इस तरह का धरातल है जँहा धरा का तो नामोनिशान नहीं परन्तु तल में सिर्फ दल -दल है, इसीलिए स्वालम्बी और संवेदनशील व्यक्ति वंहा पर बेहद असहज दिखते अन्तः कुछ तो खुदको एक कोने धर लेते है जबकि ज्यादातर सहज और सुगमता से उस माहौल  के अनुकूल अपने को ढाल लेते है।  नेता जो जन प्रतिनिधि होते हुए भी उस सम्मान को हाशिल नहीं कर पाते है जिसके लिए वह निरंतर प्रयासरत रहते है। जबसे दुनिया में लोकतंत्र का नींव रखी गयी है तबसे अनगिनित कदावर और दिग्गज नेता राजनीती के पृष्ठ भूमि पर अपनी शख्सियत का इतिहास लिखना चाहा पर इतिहास गिने चुने नेताओं को भुला नहीं  पाये व उनकी शख्सियत के सामने नतमस्तक हुए अन्यथा बाकियों के  शख्सियत को झुठला दिए। अब देखना यह है कि इतिहास भारत के मौजूदा नेताओं जो सब अपनी शख्शियत को स्थापित करने में लगे है और स्वर्ण अक्षर से अपनी शख्सियत लिखने में व्यस्त है, उन्हें याद रखते है या उनकी भी शख्सियत को झुठला देते है।


सोमवार, 1 दिसंबर 2014


 तीस हजार का थाली......................... ?

विस्मय करने वाली बात है जिस देश में आधी आबादी को पुरे दिन भागम भाग के वाबजूद भी रात में सुखी रोटी से निर्वाह करने पड़ते है उन्हीके देश में लोग एक वक्त के खाने के लिए तीस हजार बड़े फक्र से अदा कर रहे है। यहाँ सोचने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति के साथ खाने के लिए इतनी मोती रकम वसूली जाती है और वे व्यक्ति जो तीस हजार ख़र्च करके  सिर्फ खाने के लिए उनके सम्पर्क में पहुँचना चाहता है या जो व्यक्ति इस तरह का दावत दे रहे है बदले में धन समेत रहे उनके नियत और नीति क्या पुरे आवाम के प्रतिबद्ध होंगे या कुछ लोगो के इर्द- गिर्द ही सिमट कर रह जायेंगे, यह सवाल उठना भी लाज़मी है? 

एक बात औरहै जिसको जानने को लेकर सब कोई काफी अग्रसर होंगे, तीस हजार का थाली में आखिर किस तरह का पकवान से खातिरदारी कीये गए होंगे ? यदि आप जानने के लिए ललायित है तो चलिए हम को बता ही देतें है खाने के पकवान के नाम पर वही सब होंगे जो आप अपने घर के उत्सव में या किसी के दावत के व्यंजन के मेनू में देखते होंगे फर्क सिर्फ इतना होगा कि कुछ चिकनी- चुपड़ी बातों का तरका जरुर लगाया होगा जो कितनो को हज़म हुआ होगा और कितनो इसी कारण से बेहाज़मी का शिकार हुए होंगे। कुछ नामचीन मीडिया जो ऐसे महानुभाव के पीछे घूमने का आदत पाले हुए है उन्ही के कार्यकर्म के माध्यम से पता चला कि सभी व्यंजन शाकाहारी है जो आकाओं के पसंद को ध्यान में रख कर मेनू  तैयार किया गया ऐसे में जिनके दारोमदार पर शीघ्र चुनाव के लिए  एड़ी - चोंटी एक कर रखे थे उन्ही का पसंद को इस मेनू में रखना भूल कैसे  गए यह बात भी कइयों को हज़म नहीं हो रहे होंगे? 

ऐसे थाली का राज हम आपको बताते है दरअसल में थाली तो बस बहाना है इसके जरिये पूंजी इकट्ठा करना है, जो आगमी चुनाव में धन-बल के साथ उतरने के लिए सहायक होंगे। जो लोग इस तरह के दावत में शरीक होते है वे लोग का सपना ही कुछ और होता है वास्तव में उनके सपने में चार चाँद तब लग जाते है जब उनके पार्टी को सत्ता का कमान मिलता है। फिलहाल जो एक थाली के लिए तीस हजार का भुगतान कर रहे है सत्ता के प्राप्ति के पश्चात अनेको तीस हजार का वापसी हो जाता है जिसे रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट कहा जा सकते है। 

इस तरह का परम्परा अब धीरे -धीरे करके अन्य पार्टी भी अपनाने के फिराक में है क्यूंकि चुनाव के  लिए धन संचय करने का सरल और सूक्ष्म मार्ग है।  निर्वाचन आयोग का रवैया देखकर यही समझा जा सकता है कि निर्वाचन आयोग को इस बात का भनक नहीं है यद्दिप अब तो जगजाहिर है फिर चुनाव आयोग को क्यों नहीं है पता ?  फिर भी बिना विलम्ब के इसका संज्ञान धरे अन्यथा इसे भी पार्टी अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझने लगे अन्तोगत्वा  यह भी तो एक प्रकार गतिविधि है जिनके माध्यम से भ्रष्टाचार को ही बल मिलता है इस सत्य को हरगिज़ ठुकराया नहीं जा सकता है ? जरा सोचिये ............................... !!

रविवार, 16 नवंबर 2014

 अच्छे दिन ऐसे ही आएंगे ( भाग -२  ) ?




हम अपने आलेख के इस भाग में प्रशाशनिक के कुव्यवस्था और उनके अपने जिम्मेवारी के प्रति उदासीनता के मद्दे नज़र चर्चा करेंगे।  नई  सरकार आने के बाद देश के बड़े ओहदे पर बैठे नौकर शाह के व्यवहार में बदलाव को लेकर काफी आस्वत  थे परन्तु कोई सकारात्मक परिणाम नहीं देखने को मिल रहा है क्यूंकि मोदी के प्रशाशनिक कुशलता को लेकर कसीदे पढ़े जाते है  मिशाल के तोर पर गुजरात प्रान्त के प्रशाशनिक कुशलता को टटोला जा सकता है लेकिन केंद्र में अभी इस तरह कारनामा देखने के लिए उत्सुक है देश के जनता। 
 लोकतंत्र  का प्रमुख तीन स्तंभ व आधार,  विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका हैं। हमने भाग एक में न्यायपालिका के खामिया के ऊपर संक्षिप्त आलेख प्रस्तुत किया था हालाँकि उसके ऊपर लिखने के लिए बहुत कुछ होते हुए भी नहीं लिखा क्यूंकि आज भी यही स्तम्भ है जिनके ऊपर लोकतंत्र का दारोमदार है बाकि अन्य तो अपने उत्तरदायित्व से मुख फेर रहे है। सर्वोच्चय न्यायलय का जो भी हाल में लिए गए संज्ञान हो अथवा फैसला बहुत ही संतोष जनक रहा जो अन्यन्त ही प्रसंशीय और सराहनीये है फिर भी न्यायपालिका के नीचले स्तर पर ढेर सारे खामिया जिसे अतिशीघ्र दूर  करने की आवश्यकता है। 
कार्यपालिका जो हमारे लोकतंत्र के दूसरा और अहम स्तम्भ है जिनके ऊपर देश का पूरा व्यवस्था निर्भर करता है  लेकिन  इस स्तंभ में  कई प्रकार के त्रुटियाँ देखे जा सकते है जैसे कि भ्रष्टाचार का दीमक, चाप्लूशी और चाटुकारी का सिरहण और कर्त्तव्य बिमुखता का दरार।  नौकरशाह जिसके ऊपर सरकार का पूर्णतः नियंत्र है परन्तु उनके कार्यशैली को लेकर सरकार कभी भी  गंभीर नहीं दिखे और न ही उनके काम काज को दुरुष्त करने के लिए सार्थक प्रयास किये नतीजन १ प्रतिशत नौकरशाह को छोड़ दे तो सभी के सभी अपने जिम्मेवारी से या तो भाग रहे है इसके प्रति लचीला रुख अपनाये हुए है।  बीजेपी के शुभ चिंतक होने के नाते जरूर शपष्ट करना चाहूंगा कि संजीव चतुर्वेदी के खिलाफ जो भी केंद्र सरकार का  भूमिका देखने को मिला वह अति कष्ट पहुँचानेवाला रहा है क्यूंकि हीरा तो देश में बहुत है इस तरह के कोहिनूर हीरा न के बराबर ही है अतः सरकार को चाहिए कि इनके स्वरुप और अस्तित्व को जीवित रखे नहीं तो सरकार और देश दोनों को  इसकेलिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।  कार्यपालिका का जैसे ही बात करते है जहन में इनको लेकर घृणायुक्त  भरम हिचकोले लेना शुरू कर देते है इसका मुख्य वजह है इनके अभी तक कार्य प्रणाली और उनके पहल। 



कार्यपालिका किस तरह अपने दायित्व का निर्वाह कर रहे है इसका इस आप बीती से बढ़कर शायद ही कोई दूसरा उदहारण होगा जिसका मैं खुदही भुगतभोगी हूँ अन्तोगत्वा आज भी नौकरशाहो के  असंवेदना और उदासीनता से प्रभावित होकर खिन्न हूँ ।  इन दिनों देश के ज्यादातर भागो में जिस कदर अवेद्द निर्माण जोरो पर है इसमें अधिकतर व्यसायिक स्वार्थ को साधने वाले  संगलगन है फिर भी इसे रोकने के लिए न ही सरकार और न ही प्रशाशन गंभीर है जहाँतक न्यायपालिका का भूमिका है वह भी इस मशले  को लेकर सजग  नहीं दिख रहे है यद्दिप सब कुछ जानते हुए भी अभी तक इनके ऊपर संज्ञान लेने से हिचकते है, कारन जो भी हो पर नतीजा बेहद चिंताजनक है। 

अवेद्द निर्माण को लेकर दिल्ली पुलिस, नगर निगम आयुक्त अथवा दिल्ली के उपराज्यपाल सबके यंहा शिकायत ईमेल के माध्यम से अथवा रजिस्ट्री के माध्यम से दर्ज करवाया गया।  एक महीना के उपरांत भी कोई ठोस करवाई होता नहीं देख और अवेद्द  निर्माण न रुकता देख दूरभाष के जरिये शिकायत के बारे जानकारी लेना शुरू किया हालाँकि कुछ अधिकारी इसको आगे जरूर किये थे पर इसको आगे करके भूल गए व निश्चिंत हो गए जबकि  संबधित विभाग इसके प्रति न कोई तत्परता दिखाये और न ही करवाई करते दिखे। जब एक महीना के उपरांत भी कोई सकारात्मक परिणाम आता न देख कर उपराज्यपाल के अधिकारियो से गुहार किये  गए अतिशीघ्र कदम उठाने के लिए। काफी आग्रह के बाद उपराज्यपाल के दफ्तर से उपायुक्त -नगर निगम  के दफ्तर से सम्पर्क किया और उन्हें फौरन करवाई करने को कहा फिर भी उपायुक्त (नगर निगम ) दफ्तर से कुछ होता न देख उपराज्यपाल के दफ्तर से पुनः सम्पर्क साधा गया और एक बार फिर उपराज्यपाल के दफ्तर ने उपायुक्त (नगर निगम ) को तुरंत करवाई के लिए कहा।  अन्तः उपायुक्त (नगर निगम) ने अपने जूनियर इंजीनियर को साइट निरीक्षण के लिए भेजा।  अचंभित करने वाली बात यह है जिसके निरक्षण के लिए हम लोग पुरेदिन बैठे रहे  और बार - बार राजनिवास से गुहार करते रहे पर वह आकर और अवेद्द निर्माणकर्ता से चुपके मुलाकात करके चले गए और इसका पता हमलोगो को तब चला जब वह साइट पर से जा चुके थे यह बात जब हमने उपायुक्त (नगर निगम ) को बताया और अपना संदेह प्रगट किया उनके कार्यशैली को लेकर तो उनके तरफ अस्वासन मिला कि वह अपडेट करेंगे जब वह सूचना देंगे पर काश हमलोंगो को वर्तमान स्थिति का जानकारी मिलता फिलहाल जो भी करवाई नगर निगम और सम्बंधित विभाग द्वारा हुआ है इसका मुख्य कारन है कि अभी तक किसी ने भी सुध नहीं लिया !

आलाधिकारी के यंहा जब आप शिकयत दर्ज करवाते है तो वह न आपको इसका जानकारी देंते है और न ही शिकायत के विरुद्ध जो भी कदम उठाते है उसे आप से साझा करते है इस तरह के व्यवस्था में पारदर्शिता का अपेक्षा करना कदापि संभव नहीं है और यह सिलसिला कई बर्षो से यथावत चलता आ रहा है।  वैसे भी कांग्रेस कभी भ्रष्टाचार के प्रति कठोर नहीं दिखे इसीका परिणाम था इनके ज्यादातर मंत्री व नेता इसमें संलिप्त  पाये गए।  बरहाल नई  सरकार से लोग बदलाव की अपेक्षा करते है जिन्हे पूरा किया जाना अभी भविष्य के गर्त में है, हालाँकि इसे निपटने के लिए प्रयाप्त समय की आवश्यकता है।  मोदी की रूचि  और व्यकित्व को देखते हुए लोगो को उनपर तनिक भी संदेह नहीं है कि इन सबको दुरुस्त करेंगे परन्तु उनके मंत्रिमंडल के बारे में पूछेंगे तो शायद जवाब इसके विपरीत ही होंगे। 
देश अनेको प्रकार के आतंरिक कलहो से झुंझ रहे है वह चाहे सामुदायिक रंजिश का हो अथवा अन्य अपराधिक मामला पर प्रशाशनिक भूमिका हमेशा सवालो के घेरे में रहे है यदि प्रान्त के आधार पर बात करे तो ज्यादा फर्क नहीं है सभी प्रान्त प्रायः इस तरह के समस्या से झुंझ रहे है।  इस कारन एक तरफ जँहा आपराधिक गतिविधि में संलिप्त लोगो को नैतिक समर्थन मिलता है वही आम आदमी इस तरह के तत्व से खुदको झुपते फिरते है कारन खौफ का मौहाल बना हुआ । 

 दरअसल में संदेह का गुंजाईश तब तक  कम नहीं होगा जब तक वितरण प्रबंधन और निगरानी तंत्र शशक्त नहीं होगा।  सरकार को चाहिए कि कार्य कौशलता के प्रशिक्षण के साथ नैतिक प्रशिक्षण भी मुहैया करवाये ताकि नौकरशाह ईमानदार और जवाबदेही हो सके। देश को प्रगति के पथ पर वाक़ये अव्वल लाना है तो पहले नौकरशाह यानि कार्यपालिका को दोषमुक्त करना होगा अन्यथा प्रगति सिर्फ दिग्भ्रमित करनेवाला होगा या क्षणभंगुर होगा जिसे दीघर्कालीन हरगिज़ नहीं कहा जा सकता है।  
वास्तविक में कार्यपालिका को जब तक स्वायत्ता के साथ जवाबदेही नहीं दी जाती तब तक इनसे अपेक्षाकृत परिणाम का परिकल्पना करना कतई मुनासिब नहीं। हालाँकि इनके कामकाज के निगरानी रखने के लिए जागरूक विभाग और अपील सम्बन्धी विभाग को भी चुस्त और दुरुस्त करने की आवश्यकता है।  स्वाभिक है एक तरफ काम करने वाले को आज़ादी मिलेंगी जबकि ऐसे लोगो के ऊपर अंकुश लगेंगे जो अपने उत्तरदायित्व को पूरी ईमानदारी से निर्वाह नहीं करते है।  जितने भी शिकायत किये जाते है उसके लिए एक चैन सिस्टम डेटाबेस बनाये जाने की जरुरत है जिसका मुख्य केंद्रविंदु प्रदेश में मुख्यमंत्री और देश में प्रधान मंत्री हो ताकि प्रधानमंत्री के दफ्तर को इसके जरिये देश के कई मुलभुत समस्याओ से रूबरू होंगे जो उनके किसी तरह के स्कीम लाने और चलाने में मददगार साबित होंगे वही नौकर शाह भी चाहकर भी अपने कर्तव्य से बिमुख नहीं हो पाएंगे इसके लिए हमेशा अपनी जवाबदेही के प्रति सजग रहेंगे क्यूंकि उनको यह भली भांति ज्ञात होगा कि उनके हर एक हरकतें पर सीधे देश अथवा प्रदेश के मुखिया के पैनी नज़र है।  हालाँकि  इस तरह का खाका तैयार करना शायद मुमकिन नहीं है विशेषतः ऐसे परिदृश्य में जंहाँ सीधे तोर पर प्रदेश और देश के मुखिया की जिम्मेवारी सामने आती हो। यद्दिप इस तरह का शिकायत उन्नमूलन प्रणाली बनाये जाते है तो इसका सबसे ज्यादा फायदा देश के आम लोंगो को होगा जिनका आवाज लचर व्यवस्था के कारन सुनी नहीं जाती व दम तोड़ देती है। कमोबेश सरकार से जरूर अपेक्षा कर सकते है  इस तरह के चमत्कार का जो सरकार और जनता के बीच की खाई को दूर कर सकेंगे। इनदिनों सरकार के तरफ से इस तरह का पहल भी किये गए है लेकिन ये अभी आधे अधूरे है क्यूंकि उनके इस पहल के माध्यम से सिर्फ सरकार के हर एक काम काज की जानकारी सीधे जनता तक पँहुच रही है  परन्तु  जनता की बात सीधे सरकार तक पहुँचे  इसका अभी  कोई आधारभूत संरचना नहीं हो पाया है। 

पिछली सरकार जिस कानून को लेकर पुरे कार्यकाल में  खुद ही अपनी पीठ को थपथपाती रही वह कानून आज भी अपना वजूद को ढूढ रहा है और कुछ विभाग को छोड़ दें तो इस कानून के अंतरगर्त सिर्फ आपको यही देखने और पढने को मिलेगा कि यह मान्य व नहीं या बाध्य नहीं है अर्थात आपके आवेदन को निरस्त किया जाता है।  जिस सूचना के अधिकार के कानून को लेकर सरकार दावा करती रही कि जनता को बहुत बड़ा हथियार दे दिया और काश यह बहुत बड़ा हथियार साबित भी हो पता यदि नौकरशाह इसका तोड़ नहीं निकाल पाते अर्थात इस कानून के माध्यम से जो जनता को अधिकार दिया गया उसे छीन तो सकते नहीं पर दिग्भर्मित व दबा जरूर सकते है। आख़िरकार सूचना के अधिकार के कानून का जनता को न पूर्ण उपयोग का अवसर दिया जा रहा है और न ही इसके माध्यम से सटीक सूचना मुहैया करायी जाती है फलस्वरूप सूचना के अधिकार का कानून सिर्फ चंद कदरदानो के रहमो करम आश्रित है। सूचना के अधिकार कानून को लेकर जो भय का वातावरण बना है वह न सिर्फ नौकरशाहों के दफ्तर में देखा जा सकता है ब्लिक इसी तरह का परिदृश्य राजनीती गलियारों में भी महसूस किया जा सकता है इसीलिए तो पिछली सरकार कानून में संशोधन करने  का मन बना ली थी परन्तु लोकसभा चुनाव के चलते असमंजश रह गई।
प्रश्न यह उठता है कि जिन नौकरशोहों और राजनीती के दिग्गज के काम काज को सरेआम करने के लिए सूचना के अधिकार का कानून का इस्तेमाल किया जा रहा  है क्या इस बात को राजनीती के दिग्गज हो अथवा नौकरशाह हज़म कर पा रहे है ? बेशक हज़म कर भी जाय पर इस कर्तव्य को कितने विनर्मतापूर्वक और ईमानदारी से निभा रहे  इसके लिए आज भी दुविधा लोगो के मन में जमी हुई है जो लाख कोशिश के वाबजूद   तश से मश नहीं हो रही है।  फिलहाल  लोकपाल कानून के बारे टिप्पणी करना उचित नहीं होगा व बहुत जल्दी होगा पर यह तो तय है कि कानून को जितना समय अपने रूप को अख्तियार करने में लगता  उनसे पहले ही हमारे बुद्धजीवियों इनका तोड़ खोज लेते है बस देखना है कि इस कानून का तोड़ मौजूद है अथवा अभी भी तलाशे जा रहे है। अगर एक शब्द में लोकपाल के संदर्भ में जरूर कहूँगा कि इस कानून में भी कई प्रकार के त्रुटियाँ है जो इनको कारगर होने से रोकेंगे और इनके भी लाभ से अधिकतर जनता बंचित ही रहेंगे। 

मौजूदा परिवेश में देश को कानून से ज्यादा व्यवस्था व तंत्र को दुरुस्त करने की जरुरत है अब यह निर्भर हमारे सरकार के ऊपर है कि कितने जल्दी और किस हद तक इसको दुरुस्त करती है।  

गुरुवार, 13 नवंबर 2014


 अच्छे दिन ऐसे ही आएंगे ( भाग -१ ) ?

 
मोदी के द्वारा सभी प्रकार के उठाये गए कदम अत्यंत ही सहरानीय है परन्तु इसका परिणाम आना अभी शेष है।  लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या इस तरह का बातें करने से समस्या का समाधान हो जायेंगे क्यूंकि उनके ही इर्द -गिर्द ही ऐसे लोगो की कमी नहीं है जो बेशक प्रत्यक्ष रूप से तो विरोध करने से तो बच रहे है परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उनके सपने को साकार होने में बाधक का भूमिका निभा रहे है, इस तरह के परिस्थिति में मोदी का वह सपना जो भारत और भारत के लोगो के लिए देखें है व देख रहे है वह हरगिज़ पुरे नहीं होंगे क्यूंकि प्रबल इच्छाशक्ति के वाबजूद तत्परता अनिवार्य है अन्यथा आपके इच्छा शक्ति अद्भुत काम करने से वंचित रह जाते है और अंत में  उसका परिणाम असंतोष जनक ही रहता है ?

हालाँकि मोदी अपने आस -पास के परिदृश्य से भलीभांति वाकिफ़ है इसीलिए तो उन्होंने कुछ ऐसे शख्श  का चयन करके अपने मिशन से जोड़ रहे  है जिनका व्यक्तित्व फिलहाल परेणास्रोत एंव बेदाग रहे है। यदि मुझ जैसे लोग से पूछे कि हमारे प्रधानमंत्री को क्या करना चाहिए तो जवाब एक ही होगा कि आपको कुछ करने की जरुरत नहीं ब्लिक आप अपने अनुरूप कुछ ऐसे लोगो को सामने लाये  अथवा बनाये जो वाक़ये देश के प्रगति और समृद्धि के लिए प्रतिबद्ध हो क्यूंकि रचनात्मक सोच को हकीकत का जामा पहनना न ही सुगम और न ही असंभव है परन्तु इसके लिए हठ और समर्पण दोनों का अत्यधिक जरुरत होता है फिर भी इतना आसान नहीं होगा यदि आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में बहुतों  का सहयोग न मिलें।

प्रधानमंत्री जन धन योजना हो अथवा स्वच्छ भारत अभियान बहुत ही सार्थक और स्वार्थ विहीन प्रयास है लेकिन इसको पूरा करने के लिए एक बहुत बड़ा जनसमूह को एक साथ आना होगा जो अपने कर्तव्य को पूरी सिद्दत से निर्वाह करें अन्यथा इनका प्रचार प्रसार बेशक़ जितना करलें पर जमीनी हकीकत इससे परे होंगे।

दरअसल  में जिस देश का प्रधानमंत्री सीधे लोंगो के साथ जोड़ कर अपने विचार का आदान प्रदान करने में रूचि ले रहा हो उसी देश के बाबुओं जनता से मुखातिर होने में गलानी समझते है ऐसे में आज तक बापू और नहेरु का सपना तो अधूरे हुए पड़े है फिर मोदी का सपने कैसे पुरे होंगे? जिस देश में भ्रष्टाचार लोगो दिनचर्या बन चूका है,  जिसे नक्कार नहीं सकते ऐसे में उनसे किसी भी जवाब देहि और ईमानदारी का अपेक्षा करना सरासर बेईमानी मानी जाएगी।  हमारे देश के प्रधानमंत्री चाहे जितना जोर लगा ले पर लालफीताशाही तस से मस नहीं हो रहे है क्यूंकि उन्ही के ऑफिस में बैठे ऐसे भी बाबुओं है जो इस मुहीम में उनका संग कदापि नहीं देंगे इसीलिए इन्वेस्ट मौहाल को लेक, भारत को सौ तक सूचिआंक में जगह नहीं दिए गए, वावजूद हमारे प्रधान मंत्री अपने  कोशिश में कँही भी कोताही नहीं दिखाए। फिलहाल विश्व के समक्ष आज भी जिस तरह से हमें देखे जा रहे है उसके लिए सरकार, प्रशाशन और न्यायपालिका  तीनो ही बराबर के जिम्मेवार है। न्यायलय को क्या कहना, उसमें भी निचली अदालत में सिर्फ लोगो को तारिक ही मिलते है। उदहारणस्वरुप   ललित नारायण मिश्र का हत्या आज से चालीस पूर्व हुए थे उस मुकदमा का फैसला अब आया है वह भी निचले न्यायलय में जबकि अभी अनेको विकल्प मोहजूद है जँहा पुनः गुहार करने का गुंजाईश है।  ऐसे में कैसे सुनिश्चित होगा  कि असली दोषी को सजा मिलेगा ?, शायद कोई भी नहीं क्यूंकि व्यक्ति के औसतन आयु  ७५-८० साल होता है ऐसे में अगर कोई भी अपराधी गुनाह १५- २० साल के दौरान करते है जबकि चालीस में निचली अदालत से आरोप सिद्ध होता है उसके पश्चात ऊँच न्यायलय है तत्पश्चात सर्वोच्य न्यायलय इन दोनों न्यायालय से फैसला आने में तकरीबन १० साल तो चाहिए। इसी अवधि में आरोपी स्वर्ग सिधार जाते है  और मुकदमा बर्खाश्त हो जाता है  जबकि ललित नारायण मिश्र का  मामला काफी ही हाइ प्रोफाइल था …  ऐसे में आम आदमी को तो इनसे भी ज्यादा समय लगेगा क्यूंकि न्यायलय में मामला श्रेणी चिन्हित करके ही सुनवाई की जाती है या फैसला सुनाये जाते है। अन्तोगत्वा न्यायलय के प्रति आस्था और श्रद्धा रखना बहुत ही कठिन कार्य है।
वास्तव में सबसे पहले न्यायलय को सुधारने की जरुरत है हालाँकि न्यायलय सुधारक विधयेक लाया जा चूका है फिर भी कई प्रकार के अभी भी खामियाँ  जिनके ऊपर पुनः विचार करने की जरुरत है ताकि आमलोगों को  बिना विलम्ब के संतोषजनक न्याय मिल सके।

यह आलेख अभी जारी है अपने दूसरे भाग में …………………………………… .।

 केजरीवाल आखिर चुप क्यूँ है ?



केजरीवाल के बेटी को लेकर जिस कदर का खबर मीडिया में आ रहे है इसके लिए केजरीवाल को कठोर करवाई नहीं करना चाहिए उनके खिलाफ जो उनकी बेटी के बारे में अभद्र टिप्पणी करते है क्यूंकि किसी भी महिला के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करना गैर कानूनी है ऐसे में केजरीवाल  टिक्का टिप्पणी करने वाले के खिलाफ कुछ नहीं करना और माफ़ी दे देना क्या उनकी राजनीती का हिस्सा ही तो नहीं जो पुरे सुनिजीत तरीके से अंजाम दिए जा रहे है ? सवाल तो उठेंगे ही क्यूंकि अभी तक राजनीती के हिट के लिए कई बार इस तरह के काम किये जो लोगो के सोंच से परे है। इन्होने राजनीती में बढ़ते वंशवाद परंपरा का कत्तर विरोधी खुदको मानते थे पर अपने दो साल की  राजनीती के विरासत को संभालने के लिए नाबालिग बेटी को राजनीती में ले कर आना  और सक्रिय करना भी लोगो को अचंभित करता है इससे एक बार फिर अपने जुबान से फिसल गए केजरीवाल। फिलहाल लोग उनके किसी भी बात पर यंकी नहीं करना चाहते है इसी कारण हतोत्साहित हो कर कुछ इस तरह का अनाप -सनाप हरकतें तो जान बूझकर नहीं कर कर रहे ताकि जनता का ध्यान आकर्षण कर सके ? लोगों संदेह और लोग चाहते की अब भी अपने परिपक्कता का उदहारण दे पर उनके हरकतें देखकर तो लगता है कि ऐसा कभी भी मुमकिन नहीं है और आने वाले दिन में कुछ इस तरह का कारनामा करते दिखंगे जो लोगो को अचरज में डालेंगे।

दरअसल में केजरीवाल की राजनीती फिलहाल दो राहे  पर खड़ी है, एक रास्ता जो सीधे उनको खोये हुए शाख को पुनः जीवित करने का काबलियत रखता है जबकि दूसरा रास्ता इनके राजनीती के भविष्य को गर्त मिला सकता है। केजरीवाल अपनी राजनीती के अनुकूल रास्ता को चिन्हित करने में लगे जो सीधे उन्हें फिर से सत्ता पर काबिज कर दे परन्तु उनका यह लालसा उनके ऊपर इस कदर प्रबल  है कि उचित और अनुचित दोनों को तिलांजलि देकर सिर्फ सत्ता के उस कुर्शी पर केंद्रित कर रखे है। बिलकुल  उसी भांति जैसा अर्जुन को  पंछी के आँख नज़र आते थे उसी तरह इनदिनों केजरीवाल को सिर्फ दिल्ली की गद्दी नज़र आते है अन्यथा बिना विलम्ब के अपनी बेटी के ऊपर टिका टिप्पिणि करनेवाले के खिलाफ कठोर कदम उठाते है क्यूंकि जो बाप अपनी बेटी की अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकते उनसे देश की जनता क्या अपेक्षा करेगी ? आखिरकार केजरीवाल जी अब भी तो  कुछ कीजिये……… !!