रविवार, 13 जुलाई 2014

दिल्ली में बिजली गुल  !!

इन दिनों दिल्ली जिस कदर बिजली की किल्लत से जूझ रही है शायद अतीत में दिल्ली के लोगों को इतने बुरे हलात से शायद ही रूबरू हुए होंगे। इसकेलिए केजरीवाल तो मुख्य दोषी है जबकि बची -खुची कसर देश के तत्कालीन सरकार पूरी कर दिए। दरअसल में दिल्ली का इनदिनों सुध लेनेवाला  कोई नहीं है केजरीवाल का केजरी नाच का स्वाहा हो चूका है और उनके द्वारा किये गए करवाई का ही खीश कहिये जो इनदिनों बिजली कंपनी दिल्लीवासीयों पर निकाल रहे है।  अतीत में एक घंटे की कटौती के जगह इनदिनों ६ से ८ घंटे बेझिझक कटौती कर रही है।

वास्तविक में दिल्ली के उपराज्यपाल हो अथवा केंद्रीय बिजली मंत्री के पास इतनी फुरसत कँहा कि दिल्ली वालों का खबर लें, जब जनप्रतिनिधि ही जनता के प्रति उदासीनता दिखा रहे हो तो ऐसे में बिजली कंपनी के सर्वोचय पदो पर विराजमान महानुभाव व सरकारी दफ्तर का शोभा बढ़ा रहे बाबुओं उनको किस बात का फिक्र होगा। अन्तः जनता फिरसे खुदको कोस रही है इसका परिणाम कितना गंभीर होता है यह सचमुच कांग्रेस पार्टी भलीभांति जान चुकी है और इनदिनों सत्ता पर आसीन पार्टी को भी जान लेनी चाहिए अन्यथा जनता प्रायश्चित करने के लिए भी नहीं छोड़ती जैसा कि हालमें  केजरीवाल का किया है।

बरहाल मोदी और उनकी सरकार कितना भी पीठ क्यूँ न थपथपा ले परन्तु हक़ीक़त लोगों के समझ से परे है।  जबकि बिजली मंत्री बड़बोलेपण ही कहा जायेगा, जो देश के लोगों को बिजली की समस्या से निजात दिलाने की बात कहते अथवा अस्वासन देते फिरते है यद्दीप दिल्ली जैसी छोटी राज्य में बिजली की समस्या को  दुरुस्त करने के लिए अभी तक सामने भी नहीं आये और न ही उनके तरफ से कोई कारगर कदम उठाये गए मसलन दिल्ली के अधिकाधिक लोग असंतुष्ट और आशाविहीन है और उनके संजीदा को लेकर असमंजस है। अन्तोगत्वा इसका परिणाम सकारात्मक हरगिज़ नहीं होगा और अच्छे दिन की बात करने के वजाय प्रतिबद्धता के साथ प्रत्यनशील होना चाहिए ताकि दिल्ली की बिजली की समस्या का हल निकाल कर दिल्लीवासियों को बिजली की किल्लत से राहत मिलें।

शनिवार, 12 जुलाई 2014


 बावन, कुकुर, हाथी अपने ज़ात केर खाती!!

वाकये ई कहावत यथार्थ अछि, आई जे ब्राह्मण के हाल अछि ओकरा लेल ब्राह्मण स्वंय जिम्मेवार अछि।  कारन जे आइयो ब्राह्मण प्रबुद्धता और विलक्षणता  म  इस्वर के कृपा से जन्मजात अव्वल प्राप्त होयत अछि लेकिन सदैव कनि व तनिक लाभ के लेल ओकर दुरपयोग करैत म अगुआ नतीजा आई हास्य पर अछि।  देश में जतेक जाति आओर वर्ग छैक ओकर समुदाय में कोनो -कोनो संगठन धुरी क कार्य कय रहल अछि मुद्दा जखन ब्राह्मण समाज के बात करब त एहि प्रकार के कोनो संगठन चिन्हित कयल जा सकैत अछि पूरा ब्राह्मण समाज क बाँधी में सक्षम हुआ।  एकर सिर्फ एक ही कारन अछि जे ब्राह्मण अपन जाति के उठावय कम पर गिरयावे ज्यादा अग्रसर अछि।  आब समय आवि चुकल ह आओर सब गोटे एक जुट भ जाऊ अन्यथा विलुप्त हो में कोनो कसर नहीं रहत। पिछुलगुआ बनैत स बढियां अछि जे अपन आत्मसम्मानक लेल अपन जाति संग जुडी कियाकि जनसंख्याके आधार पर त  मुट्ठी भर छी , जेना आहिस्ता आहिस्ता सरकार म अथवा सरकार के सुधी स बेदखल भय रहल छी ओहिना  हर तरहेँ स बेदखल भ जायब आओर आई आरक्षण के माध्यम स त काइल  सरक्षण के माध्यम स आहाँकेर आत्मसम्मान और अस्तित्व क चुनौती दैत। अपन प्रतिकिर्या जरूर साक्षात कराएब।

कौनो समाजकेर  तरक्की म अत्यंत योगदान होयत अछि जे सब कियोक मिलेकेर अपन समाज म पिछड़ल लोग केर उत्थान में समाज के प्रबुद्ध वर्ग अहम योगदान दय क लेल सम्प्रीत होइ मुद्दा ब्राह्मण आओर ओहिमे मैथिल ब्राह्मण होइ त कानी काटे में माहिर अछि एही कारन स ब्राह्मण समाज दिन पर दिन पीछेड़ रहेईल अछि हालाँकि दोसर जाति के ऊपर ई परिवेश भिन्न अछि बहुतो जाति आरक्षण के माध्यम स सरकारी -नौकरी पेशा म खूब तेजी स पहुँच रहल अछि।   बनिया, गुजराती आओर पंजाबी समाज के उन्नतिक मूल मन्त्र किछु अछि त अछि ओहि समाज केर लोग में एकता आओर अखंडता ईयाह ओहि समाज क कुशलता केर सर्वोपरि मापदंड मानल जायत अछि। यदि मैथिल ब्राह्मण सब कियो मिलके अपन समाज केर अग्रिम समाज के श्रेणी म ल जायके इच्छुक छि तहन मिलजुल केर आगू आउ समाज केर प्रति प्रतिबद्धता दर्शाबैके चेस्ता करू।  जय मैथिलि ब्राह्मण समाज।



शुक्रवार, 20 जून 2014

पुनः मूषक भवः (केजरीवाल चरित्रमानस्  )


बेशक राजनीती के पृष्ठभूमि पर एक नए अध्याय का शुरुआत माना जा रहा था, सभी ने ये मान लिया था कि अब पारंपरिक राजनीती से हत कर आम आदमी के उम्मींद को पुरे करने के लिए ' मैं हूँ आम आदमी' का नारा लेकर हमारे बीच जो आये है वह प्रदूषित राजनितिक परिवेश को अन्तकरण  से शुद्धि करेंगे इसलिए लोगों ने उनके तमाम बातों पर यंकी करके अपने मत के जरिये अभय वरदान दिए ताकि किये गए वादों को पुरे करे।  हालाँकि  लोगों को तो यह पता था कि राजनीती दूषित हो गयी जिसे शुद्धिकरण की जरुरत है पर यह भूल गए कि राजनीती एक ऐसा परिवेश है जिसमें कोई भी जाकर लोगों के उम्मीद को पूरा करने के वजाय  खुदको  ज्यादा तहजीब देते है और अतीत में किये गए सब वादों को भूलकर अपने भविष्य को सवारने के लिए हर एक  हथकण्डे अपनाने लगते है जो लोगों के सोंच से परे होते है। जो अतीत में सुचिता और नैतिकता का पाठ पढ़ाते है जब राजनीती के मौहाल में पँहुचते है तो सबको बिसाड़ कर सत्ता के लार में फिसलकर संवेदना और विनर्मता को पीछे छोड़ देते है अन्तः उनके मस्तिक में सिर्फ एक ही चीज रह जाती है कि किसी तरह कैसे सत्ता उनके अधीन हो ? उदाहरणस्वरूप यदि किसी चूहा को शेर बना दिया जाय तो वह अपने अतीत को भुलाकर सिर्फ शिकार के बारे में सोचना शुरू कर देते है अचानक उनके सामने वह व्यक्ति भी आ जाय जो उन्हें चूहा से शेर बनाया था उन्हे भी नहीं छोड़ेंगा , जैसा कि निम्नलिखित कहानी में उल्लेख  किया गया है :-


एक जंगल में एक चूहा रहता था।  एक रोज उनका सामना एक बिल्ली से हुआ, जैसे ही बिल्ली उनके ऊपर प्रहार करने के लिए दौड़े फौरन चूहा वहाँ से भागे और भाग कर तपस्या में लीन मुन्नीवर के समीप पँहुच कर  उनसे विनती करने लगे। मुन्नीवर को उनके ऊपर तरस आ गया मुन्नी ने पूछा" क्या है तुम्हारे दुःख का कारण?"

चूहा ने रोते हुए कहा" मुन्नीवर, मै अपनी जान  बिल्ली से किसी तरह बचाकर आपके पास आया हूँ अर्थात आपसे विनती है कि हमें बिल्ली बना दे ताकि मैं बिल्ली के भय से मुक्त होकर जंगल में रह सँकु।

मुन्नीवर उनके विलाप से द्रवित होकर कहा " यथास्तुः।." 

चूहा मुन्निवर से वरदान प्राप्त करके जंगल को लोट आये और रहने लगे। कुछ समय के पश्चात उनका सामना शेर से हुआ पहले तो उनको  लगा कि वह डटकर उनका मुकावला कर सकते है पर शेर के हमला से लहूलुहान हो कर फिरसे मुन्निवर के आश्रम में जा पंहुचे।  मुन्निवर को अपनी आपबीती सुनाई और उनके चरणो में पड़ कर गिरगिराने लगा।  मुन्निवर का दिल उनके करुणामय विनती से सुनकर पसीज गया मुन्निवर ने उनको फिरसे यथास्तु के साथ उनको शेर बना दिए। 

कई बर्षो के उपरांत मुन्निवर उसी जंगल से गुजर रहे थे जँहा चूहा से बने शेर रहा करता था। अचानक मुन्नी के नज़र आगे खड़े शेर पर पड़े। मुन्निवर निर्भीक होकर चलते रहे क्यूंकि वह जानते थे कि वही चूहा है जिसे उन्होंने ही शेर बनाया था। परन्तु शेर ने दहाड़ कर मुन्निवर के ऊपर आक्रमण किया, झट से मुन्निवर पीछे हटे और कहा " तुम शायद भूल गए हो कि तुम्हे हमने ही शेर बनाया है। "

"सचमुच आपने ही हमें शेर बनाया है पर अब मैं शेर हूँ और भूखा हूँ इसलिए आज मैं आपका शिकार करूँगा" चूहा कहते हुए मुन्नीवर के ऊपर से फिर से प्रहार करने आगे बढे। 

मुन्नीवर ने कहा" पुनः मूषक भवः" और वँहा से चल दिए।  कुछ ही पलों में शेर फिर से चूहा बन गए।


केजरीवाल का राजनितिक चरित्र और चूहा के चरित्र  के बीच में काफी समानतायें है। राजनितिक परिविश में नैतिकता के मापने के लिए जो भी पैमाना (मापदंड) होते है अगर उसके आधार पर भी यदि केजरीवाल के राजनीती कार्य शैली को मापे तो शायद इतने खामियाँ से रूबरू होंगे जिसे सहज रूप से नज़रंदाज़ करना कतई आसान नहीं होगा। केजरीवाल ने वाकये राजनीती जमीं को तलाशने के लिए काफी जद्दोजहद किये और इसी जद्दोजहद के दौरान उन्होंने RTI कार्यकर्ता के रूप में खुदको साबित किया परन्तु उनके जीवन में राजनीति घुमाव का श्रीगणेश अगर हुआ तो जनलोकपाल आंदोलन के ही जरिये हुआ। हालाँकि केजरीवाल जब नौकरी पेशा छोड़कर समाज सेवा के पथ पर आगे बढे तो सिर्फ एक ही मंसूबा जहन  में लेकर कि आगे चलकर इसी के माध्यम से राजनीती पतल पर अपना भविष्य को चिन्हित करना है। 

जनलोकपाल आंदोलन में अन्ना के मुहीम के संग पहले खुद को शामिल करना, फिर अन्ना के सिपाह-सलाहकार के सूचि के पहले पंक्ति में अपनेको उपस्थित करना, अन्ना के अनशन के दौरान मीडिया हो अथवा सरकार के नुमायन्दे उनके साथ वार्तालाप करना और अपने एजेंडा को रखना और धीरे -धीरे करके जनलोकपाल आंदोलन को एक अहम धुर्व अन्ना के सामने खुदको दूसरा धुर्व के रूप में स्थापित करना, बहुत सी ऐसी बातें है जो केजरीवाल का पूर्वनियोजित और पूर्वनिर्धारित राजनितिक मनसूबे के तरफ ईशारा करते है। 

लोकतंत्र में यदि कोई मुन्निवर होता है तो वह जनता जो लोकतंत्र में किसी भी नेता का राजनितिक भविष्य को तय करती है और अपना मत जिन भी नेता या दल के पक्ष में प्रदान करती है तो नेताओ का सभी आकांक्षाएं साकार होते है और वास्तविक में वह राजनीती के शेर व शंशाह कहलाते है उसी भांति हिन्दू धर्म में ऋषि ( मुन्नी ) भगवान के समकक्ष सम्मान दिए जाते है और उनके तप-जप के प्रभाव के अनेकोअनेक उदाहरण बुर्जगो सुने होंगे अथवा इतिहास में पढ़े होंगे कि मुन्नीयो का अत्यंत योगदान का नतीजा है कि हमें ज्ञान और बिज्ञान विरासत में मिला है और उनके ही कृपा से आज भी हमारे समाज में कई परम्परा है जो हमें अपने मर्यादा में रहने का सींख देते है और अनुशाशन में रहने के लिए प्रेरित करते है।

 दरअसल में केजरीवाल को भलीभांति ज्ञात था कि लोकतंत्र में अगर जनता का दिल जीत लेते है तो वाकये में सियाशी शेर बनने से कोई नहीं रोक सकता है, इसीलिए जनलोकपाल मुहीम को एक जनांदोलन का रंग दिए उसके उपरांत बढ़-चढ़ कर लोगों को जोड़ते गए इस आंदोलन से। इसीका परिणाम है कि कांग्रेस सरकार प्रारम्भ में इस आंदोलन को भाव देने के पक्ष में नहीं थी पर दिन -ब -दिन लोगों के तादाद में भारी बढ़ोतरी के वजह से सरकार सोचने के लिए बाध्य हो गयी कि अति शीघ्र आंदोलन को रोक नहीं गया तो पूरा व्यवस्था इस कदर चरमरा जायेगा जो बाद में नियंत्र से बाहर हो जायेगा। जिस केजरीवाल को सरकार कभी सुनने को तैयार नहीं थी अचानक उनको और उनके टीम के सदस्य को जनलोकपाल स्टैंडिंग कमिटी में शामिल कर लिया जो केजरीवाल के लिए जनता का पहला आशीर्वाद माना जा सकता था, जो इन्हे चूहा से कैट (बिल्ली) बना दिया पर सरकार में बैठे लोग खुदको निर्वाचित जनता के प्रतिनिधि समझते थे और केजरीवाल टीम को बार -बार अहसास दिलाते थे कि यदि नई कानून लाना अथवा लागु करना है तो इसके लिए पहले चुनाव लड़ कर और जीत कर आना होगा। इस लिए टिपण्णी करते नहीं थकते कि  केजरीवाल को यह हक़ जनता ने नहीं दिए है कि नए कानून स्वरुप तैयार करे। कांग्रेस सरकार में बैठे लोगों का बड़बोलापन था व अंहकार अपितु केजरीवाल ने जनता के समक्ष कांग्रेस सरकार इस कथन को बड़े जोर -सोर परोशा जिसे जनता सहजता से बर्दाश्त नहीं कर पाई। केजरीवाल ने बिना विलम्ब किये उसी मंच से एलान कर दिए कि अब वह राजनितिक पार्टी बनायेगे और चुनाव लड़ेंगे और उसके बाद जनलोकपाल कानून लाएंगे। 

जनलोकपाल आंदोलन बिना मुकाम के ही अधर में रह गए। अन्ना के टीम दो खेमे में बँट गए थे, एक जो राजनीती पार्टी बनाने के पक्ष में थे जबकि दूसरा खेमा जो इनके पक्ष में हरगिज नहीं थे। केजरीवाल ने दिल्ली विधान सभा चुनाव की तैयारियाँ आरम्भ कर दिया इसीलिए बीच -बीच में कई छोटे -मोटे जनांदोलन करते रहे और मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार को मान कर लोगो से जनसम्पर्क कायम करते रहे। दिल्ली एक तबके में केजरीवाल को लेकर सुगबुहात शुरू हो गयी। वैसे भी पुरे देश में कांग्रेस के विरुद्ध मौहाल बन चूका था ज्यादातर लोग कांग्रेस के तानाशाह रवैया और भ्रष्टाचार युक्त किर्याकलाप से त्रस्त थे। दिल्ली चुनाव का घोषणा के बाद केजरीवाल ने आआपा का प्रचार -प्रशार खूब जोर से किया और लोगों से आग्रह किया कि यदि बिजली-पानी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याऍ से निजात होना है तो आआपा को वोट दें।

चुनाव परिणाम के उपरांत यह साबित हो गया कि केजरीवाल राजनीतिक शेर (बिग कैट ) बन चुके थे। इस तरह अप्रयाशित जीत से जँहा कांग्रेस पार्टी अर्श से फर्श पर पँहुच चुकी थी वंही इनके विपरीत आआपा देश के राजनीति के पृष्ठ भूमि पर सफलता के नए ईमारत बना चुके थे। केजरीवाल के लोकप्रियता के बदौलत आआपा को मिली अचानक कामयाबी जँहा कांग्रेस को दिल्ली की राजनीती से बेदखल कर गयी थी वंही भाजपा के तीन राज्य में बड़ी जीत के वाबजूद दिल्ली में पूर्ण बहुमत के आभाव में हक्के -बक्के कर गए थे।

जो केजरीवाल कभी सौगंध खाकर लोगो को यंकी दिलाये थे कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री हरगिज़ नहीं बनेगे अब शायद उस सौगंध को भूल चुके थे। कांग्रेस भी इस करारी हार को पचा नहीं पा रही थी और उन्होंने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए आआपा को बिना शर्त के समर्थन देने का घोषणा कर दिए। आआपा जो लोगो को यह अहसास दिलाते नहीं थकते थे कि सत्ता के भूखे नहीं है अचानक सत्ता करीब देखकर उनके मुंह से भी लार टपकने लगे।  केजरीवाल ने सरकार बनाने के लिए तैयार हो गए और कांग्रेस के समर्थन के बल पर विधानसभा में विस्वास मत भी हाशिल कर लिए। वास्तविक में केजरीवाल को लेकर लोगों का दुविधा का  शुरुआत मुख्य मंत्री बनने के तुरंत बाद हो गये क्यूंकि एक खेमा ऐसा भी थे जो कदापि नहीं चाहते थे आआपा कांग्रेस से समर्थन के बुनियाद पर सरकार बनाये। अब केजरीवाल का सोंच और प्रकृति में बदलाव होना शुरू होने लगे थे इसीका नतीजा था कि उनके ही दल में से उनके खिलाफ बग़ावत का शुर सुने जा रहे थे और लाख कौशिश के वाबजूद केजरीवाल अपने असंतोष  विधायक  को शांत नहीं कर पाये इसीका परिणाम था कि उनके पार्टी में राजीनीति के सूझ-बुझ रखनेवाले विनोद कुमार बिन्नी बागी बन चुके थे।  केजरीवाल में ज्यादातर ऐसे विधायक थे जिनके पास अनुभव के नाम पर कुछ नहीं था नतीजन सरकार चलाने में जो अनेको प्रकार के अर्चन आते है उनका सामना करने में केजरीवाल हो व उनके टीम के अन्य नेता हो वे असफल रहे।  मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्हें धरने को ही अहमियत देते नज़रआये क्यूंकि उनको लगा कि अब भी वे धरने के माध्यम से लोगों का सहानभूति हाशिल कर पाएंगे लेकिन ये भूल चुके थे कि अब वह आम आदमी का टोपी नहीं पहनने वाले  आम आदमी नहीं रहे ब्लिक हालत बदल चूका है। हालाँकि वह कभी भी आम आदमी थे ही नहीं  फिर भी टोपी के जरिये मैं आम आदमी हूँ प्रचार - प्रशार कर रहे थे पर इसके लिए भी वे अब मान्य नहीं रहे क्यूंकि अब वह संवैधानिक पद पर थे जबकि  हमारे संविधान किसी भी प्रान्त के मुख्यमंत्री को इस तरह का धरने पर बैठने की अनुमति नहीं देते है। अन्तः देश का मीडिया हो अथवा प्रदेश के लोग इसके लिए केजरीवाल को ही कौसतें रहे और उनके सूझ-बुझ पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहे ।


मुख्यमंत्री तो बन गए थे पर राजनीतिक सूझ -बुझ के आभाव में बड़े- बड़े फैसला नहीं ले पा रहे थे जबकि उनका असल मुकाम तो आम चुनाव था जिसमें बड़ी जीत को जोह रहे थे इस लिए जनलोकपाल कानून को असंवैधानिक तरीके से दिल्ली के सदन में पास करने के फिराक में थे पर बुद्धजीवियों और उपराज्यपाल ने जब इसका विरोध किया तो मसककर रह गए वही सिर पर बजट सत्र था जिसमें बिजली और पानी के ऊपर दिए गए सब्सिडी के लिए फण्ड का एलोकेशन करना था। केजरीवाल अब यह जान चुके थे इस तरह के विषम परिस्थिति में सरकार चलाना सरल नहीं है इसलिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वास्तविक में उनके इस तरह से अन्यायस इस्तीफा से  लोगों में हताश का वातावरण बना दिया था जबकि आआपा अपनी मज़बूरी दिखाकर लोगों से शाबाशी बटोरने की निरथक प्रयास कर रही थी। लोगों को अब इनके ऊपर से प्रायः विस्वास उठता ही जा रहा था। 

आगमी आम चुनाव  के लिए प्रचार  में चोटी का जोड़ लगाने में केजरीवाल ने कोई कसर न छोड़ा,  इसके चलते कभी गुजरात की गालिया तो कभी मुंबई , तो कभी उत्तर प्रदेश के हाई प्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्र  अमेठी में नुक्कड़ सभाए करने लगे। मोदी एक रणनीति के तहत वाराणस से चुनाव लड़ाने का फैसला लिया गया। जैसे मानों केजरीवाल इसी फैसला का इंतज़ार में था क्यूंकि उनके जहन में कंहीनकंही ग़लतफ़हमी ने जड़ जमा चुकी थी कि शीला दिक्षित को जिस कदर दिल्ली के विधान सभा में मात दिए, उसी तरह से मोदी के ऊपर भी भारी पड़ेंगे। अब उन्होने अपना अहम मुद्दा भ्रष्टाचार को तिलांजलि देकर नये मुद्दा को लेकर वाराणस में  परिवार सहित डेरा डाल चुके थे। प्रचार और प्रशार से यदि चुनावी जंग को फ़तेह किया जाता तो केजरीवाल का विजय सुनिश्चित आलिंगन करता पर काश ऐसा हो नहीं  सका इसका तातपर्य था कि लोगों का दिलो दिमाग में यथावत अब वह स्थान केजरीवाल के लिए नहीं रहा था अब केजरीवाल के नाम का परत उनके जहन से उतर चूका था, लोगों उनके ऊपर विस्वास करने में जिझकने लगे थे, लोगों के उनके कावलियत और विस्वनीयता के ऊपर संदेह होने लगेथे, बार -बार अपने बयान से पलटने और मौका परस्ती के लिए लोग अब उनको कोसने लगे थे। अन्तः इस चुनाव में लोगों ने उनके ऊपर से अपना आशीर्वाद वापस ले लिए थे नतीजन केजरीवाल अर्श से फर्श पर पंहुच गया था तकरीबन वही हालत उनके पार्टी का भी हुआ। यदि पंजाब के चार सीट को छोड़ दें तो सभी सीटों पर करारी हार ही मिली थी, अधिकतर सीटों पर जमानत जब्त हो गयी आआपा के बड़े -बड़े सूरमाओं का हवा निकल चुकी थी।


 केजरीवाल जो खुद को प्रधानमंत्री के प्रमुख दावेदार समझ रहे थे अब उनके महत्वाकांक्षी इच्छाएँ का अंतिम संस्कार हो चूका था। जिन्हे  कुछ महीने पहले राजनीती के शेर जानने लगे थे अब वह ढेर हो चुके थे अर्थात पुनः मूषक भवः के भांति ही उनके भी बुलंदी गर्त में मिल चूका था। फिलहाल इनदिनों दिल्ली में फिरसे से खुद को स्थापित करने के लिए प्रयासरत है पर जनता के बीच उनके प्रति असंतोष साफ़ देखा जा सकता है, यही कारन है कि अब वह चुनाव शीघ्र कराने के पक्ष में नहीं है क्यूंकि दिल्ली प्रदेश के चुनाव में भी दिल्ली के लोगों का आक्रोश का ही सामना करना पड़ सकता है जो निराशाजनक परिणाम का ही रुझान देता है ऐसे में केजरीवाल टीम के ज्यादातर सदस्य चाहते है कि किसी तरह केजरीवाल दिल्ली में सरकार बनाये ताकि चुनाव से बचा जाय इसीलिए परदे के पीछे से कई शीर्ष नेता कांग्रेस के सम्पर्क में है जबकि अन्य विकल्प को भी तलाशने का काम जोरो पर है। आखिकार चुनाव के पश्चात ही दिल्ली प्रदेश में आआपा का करिश्मा अब भी बरकरार है या कुछ भी नहीं बचा है सभी तरह के अनसुलझे सवालों का जवाब खुद -ब - खुद  देश के सामने आ पाएंगे। फिलहाल केजरीवाल के द्वारा आनेवाले दिनों में कठोर परिश्रम करने की जरुरत है जबकि पार्टी के अन्तरकलह को सुलझाने से फुर्सत उन्हें मिले  तो फिर से लोगों के दिलों में अपना खोया हुआ जगह हाशिल करने का कशिश करेंगे जो न ही आसान है और न ही अतिशीघ्र मुमकिन है ……। 

शनिवार, 7 जून 2014


 

समाजवादी सरकार में समाज की ही अस्मत खतरे में!

उत्तर प्रदेश में महिलाये व आधी आवादी सुरक्षित नहीं है हालाँकि पुरे देश का कमोबेश यही हाल है पर हद तो तब हो जाता है जब प्रदेश के सबसे कदावर नेता को ये कहने से थोड़ा भी संकोच नहीं होता है " क्या बलात्कार का सजा  फांसी देना सही है?, अपने लड़के है लड़के से गलती हो जाता तो क्या उनको फांसी पर लटका दोंगे यदि केंद्र के सत्ता पर काबिज़ होंगे तो ऐसे कानून का संशोधन करेंगे।" जनाब आप तो प्रदेश के बुजुर्ग नेताओ में से एक है और आपका ही सपूत है जो प्रदेश के मुख्या है ऐसे में  इस तरह का बयान से प्रदेश के लोगो में हताश होना स्वाभिक है जबकि इस तरह के कथन सुनकर बहसी और दुराचारी लोगो के उत्साह में चार चाँद लगना लाज़मी है। फिर भी आप ने जो कह दिया सो कह दिया न आप को इसके लिए मलाल और न ही शर्म अन्यथा अभी तक आप सार्वजानिक रूप से  अपनी गलती का इजहार करके माफ़ी मागने का कृपा करते पर आपके शब्दावली में शायद माफीनामा का कोई शब्द नहीं। हालाँकि आपके निरथर्क बयान का ही असर है इसे माने अथवा न माने परन्तु उस बयान का परिणाम ही है जो एक तरफ प्रदेश के महिलाये को सूझ नहीं रहा है कि आखिर अपनी अस्मत को तार-तार होने से कैसे बचाये है? वहीँ दूसरी तरफ अस्मत लूटनेवाले को मानों खुली छूट मिल गया हो और इसीलिए तो रोजाना महिलाये अथवा किशोरी के अस्मत लुटे जाते है  पर आपके सपूत मानिये मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव के कानो में जू नहीं रेंगते है। समस्त विश्व आपके संवेदनहीनता पर अफसोश जता रहे है और अपने नागरिक को सावधान कर रहे है कि भारत जाने से बचे। बदायूँ  के घटना से कि प्रदेश के लोग आहत में है ब्लिक देश और देश से बाहर के लोग भी सन्न है कि आखिर ये क्या हो रहा है ? यह सिर्फ मानसिक विकृति का नतीजा है अथवा सरकार के आराजकता के कारण समाज में बढ़ रहे दबंगई का नतीजा है ? सचमुच में कारन जाने बिना ही इनका समाधान ढूढना अत्यंत आवश्यक है क्यूंकि इसका उनमूलन अगर जल्दी से नहीं किया जाता तो निश्चित ही इस तरह के वारदात हमारे समाज के संरचना को तहश -नहस कर देगा।  इसीलिए तो यूनाइट नेशन के अध्यक्ष को भी इसके लिए भर्त्सना करना पड़ा जबकि नेताजी के द्वारा दिए गए बयान पर कटाक्ष करने से नहीं चुके।  वाबजूद इस तरह के निंदा पुरे विश्व में हो रहे है पर प्रदेश के सरकार अपनी गिरबान में झाकने के बजाय मीडिया के ऊपर लाछन लगाने में व्यस्त है क्यूंकि सरकार को गलतफहमी हो चला है कि मीडिया चढ़- बढ़ा कर प्रदेश के घटना को दिखा रहे है जबकि अपनी प्रशाषण को दुरस्त का जहमत अभी तक नहीं उठाई।

वास्तविक में यदि मीडिया के नज़र नहीं पड़ी तो सरकार और प्रशाषन मामूली घटना बतलाकर यूँही नजरअंदाज कर देते है और यदि मीडिया के नज़र से नहीं बच सके तदुपरांत मीडिया इसके लिए जद्दोजहद करके पीड़िता  के लिए इंसाफ की सिफारिश करते है, वैसे में सरकार के तरफ से दो- पांच लाख का सहयता राशि का घोषणा करके चुप्पी साध लेती है।  यदि उत्तर प्रदेश के पुलिस के काम काज का लेख -जोखा करे तो शायद यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि देश के सभी प्रदेश के मुकावले फिसड्डी ही है क्यूंकि उनके काम काज में राजनीती दखलंदाज़ी इस कदर हावी है कि पुलिस कुछ जरुरत के फैसले भी अपने हुक्कुमरनो से पूछकर लेती है अपितु उनके सामत आनी सुनिश्चित है ऐसे में पुलिस के पास एक ही विकल्प है कि अपने आकाओं को सदेव खुश रखे। हालाँकि फिलहाल सरकार और उनके नेता मीडिया के ऊपर जोरदार हमला कर रहे है ताकि मीडिया प्रदेश में अपराधिक कारनामे को दिखाने से परहेज़ करे।

दरसअल  में जज और वकील का बलात्कार दिन दहाड़े किये जाते है जो आम आदमी को झकझोरने वाली ही खबर कही जा सकती है। यद्दीप कुछ लोग का मानना ये भी है कि इनदिनों उत्तर प्रदेश सिर्फ एक ही जाति के लिए उत्तम है जिसे सरकार के तरफ से कोई पावंदी नहीं है और वह अपनी दबंगई को निसंकोच बिना किसी भय का अपराधिक नए -नए कारनामे पेश कर रहे है जबकि प्रशाषन को भी हिदायत दी गयी है कि इनके दबंगई के खिलाफ कोई भी शिकायत मिलती है तो बिना पड़ताल किये खारिज कर दें ऐसे में पुलिस वाला तमाशबीन बनके सब कुछ देखने को बाध्य है।

फिलहाल केंद्र सरकार में गृह मंत्री उसी प्रदेश के व्यक्ति है और सरकार के सभी हरकतों से भलीभाँति वाक़िफ़ है। इसीलिए प्रदेश सरकार को चाहिए की कानून व्यवस्था को अतिशीघ्र दुरुस्त करे नहीं तो केंद्र सरकार उनके खिलाफ शख्ती  कर सकते है जो गृह मंत्री का पूर्णतः अधिकार क्षेत्र में आते है। वायदबे केंद्र सरकार चुप्पी   साध कर प्रदेश में हो रहे सभी प्रकार के जातियता और लचर कानून व्यवस्था के ऊपर नज़र गड़ाये हुए है और आनेवाले दिनों में कई प्रकार के कारगर कदम उठाये जा सकते है। जब तक देश के सभी नागरिक खुदको सुरक्षित नहीं महसूस करेंगे तबतक अच्छे दिन आने का परिकल्पना करना कदाचित उचित नहीं होगा।  अन्तः केंद्र सरकार बिना विलम्ब के प्रदेश सरकार के ऊपर अत्यधिक दबाब बनानी चाहिए ताकि प्रदेश के कानून व्यवस्था में सुधार हो और अपराधी के जहन में डर का गुंजाईश हो।

गुरुवार, 29 मई 2014





 चुनाव परिणाम का साइड इफ़ेक्ट जारी है …!!





मोदी ने ममता और जयललिता को संकेत दे दिया है कि सुधर जाओ वर्ना देश की राजनीती में शून्य से ज्यादा अहमियत नहीं मिलनेवाली है इसीलिए तो उनकी ख़ुशीका परवाह किये बिना बंगला देश के प्रधानमंत्री और श्रीलंका के राष्ट्रपति को सादर आमंत्रित किये और सम्भावना है कि वे खुद व उनके प्रतिनिधि सपथ समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज करेंगे। बेचारी ममता और जयललिता अपने -अपने प्रान्त में जीत का परचम तो लहराया पर दिल्ली के गलियों में फिर भी कोई उन्हें भाव देने को तैयार नहीं। हालाँकि ममता को यह भलीभांति ज्ञात है कि दिल्ली में उनकी लोकप्रियता के नाम पर ५०० लोग भी इकट्ठा नहीं सकते और ऐसा ही हुआ था जब उन्होंने आम चुनाव से पहले अपनी ताकत का प्रदर्शन करने की गुस्ताखी की थी। बरहाल दिल्ली में मोदीजी के ताजपोशी के तैयारी जोरो पर है।  ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------


कांग्रेस के बड़े -बड़े पहलवान आम चुनाव के दंगल में चित्त हो गए है। एक तरफ सोनिया गांधी को कुछ सूझ नहीं रहा हालाँकि राहुल गांधी अपनी काबलियत का दिलाशा देकर अपनी माँ को सान्तवना देने का पुरजोर कोशिश में लगे है तदोपरांत माँ को उनके क्षमता पर यकीन नहीं हो रहा है और अन्य विकल्प को लेकर आत्मचिन्तन कर रही है। इन्ही गहमा -गहमी के बीच कई बकरे तैयार किये जा रहे है जो राहुल गांधी के दीर्घायु और पुनः खोये हुए ताकत को सृजन के खातिर बलि दिए जाना है।  फिलहाल कांग्रेस कोर कमिटी ने आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हारका का घड़ा राहुल गांधी के बदले सबके सिरे फोरने पर हामी भर दिए है।  ऐसे में बड़े- बड़े बड़बोले को चुप करने के लिए रणनीति बनायीं जा रही है जबकि राहुल गांधी के नए सिपाह - सलाहकार के भर्ती के लिए यथाशीघ्र बिज्ञापन दिए जायेंगे क्यूंकि दिग्गी राजा  इन दिनों कंही और व्यस्त है जबकि बाकि चुनाव में जमानत जब्त करवा कर काफी हतोत्साहहित है इसीलिए ज्यादातर ने तो इंडोनेशिया और शेष स्विट्ज़रलैंड जाकर गहन सोच -विचार करने का मन बना लिए  है।  ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

आम चुनाव के पश्चात यदि सबसे ज्यादा नुकसान किसी भी व्यक्ति को उठाना पड़ा है तो वह नितीश बाबू जो पिछले महीने तक प्रधानमंत्री बनने के हसींन सपने देखा करते थे पर जब आँखे खुली तो सच्चाई से रूबरू होना ही पड़ा नतीजन प्रधानमंत्री बनने का सपना सपना ही रह गया जबकि हकीकत में मुख्यमंत्री के भी कुर्सी खिसक गई। बेचारे नितीश बाबू कल तो उनके गाल फूल जाता था अगर कोई किसी और व्यक्ति के तारीफ उनके सामने करते पर आज जो अपने वे भी इन्हे ही कोसतें है पर क्या करे?, सब कुछ बदल चूका है हालात भी और बात भी। वक्त का मारा हुआ सुशाशन बाबू उनके ही दामन थामे जिनसे २० साल पहले नैतिकता और वैचारिक टकराव के चलते अलग होकर समता पार्टी का गठन किये थे। जॉर्ज फर्नाडीज के आत्मा भी नितीश के करतूत पर जरूर खिन्न होंगे क्यूंकि उस विपरीत परिस्थिति में अकेला वही थे जो नितीश बाबू के साथ थे पर जब उनको नहीं बक्शा तो औरो को उनसे उम्मींद करना ही मूर्खता होगा। हालाँकि मांझी के सहारे उन्होंने अपनी नैया पार लगाने को सोच रहे है मगर मांझी के लिए भी इतना आसान नहीं है क्यूंकि एक नाव में लालू और नितीश दो सौतन ही मानों सवार है जिनकी मज़बूरी है कि किसी भी हालत में इस किनारे से उस किनारे जाना है अन्यथा अभी तक कमाए हुए रुशुख का मटिया पालित होना सुनिश्चित है जिसे ये दोनों इतने आसानी हरगिज़ नहीं जाने दें सकते है। हालाँकि अपने रुशुख को बचाने के चलते दोनों एक ही नाव पर तो सवार हो गए है लेकिन अंदेशा का गुंजाईश है कि कही मझधार में ये दोनों फिर से उलझ गए तो नाव का डूबना तय मानों फिर मांझी तमाशबीन बनके देखतें रह जायेंगे और लाख प्रयन्त करने के वाबजूद भी बचा नहीं पाएंगे। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------


 अब एक नज़र उत्तर प्रदेश पर जँहा भी राजनीती के खूब उथल -पुथल है। आज़म खान ने तो वेचारे बेजुबान होकर चुप्पी साध लिए है अब तो कई दिनसे कुछ कहने के हिमाकत नहीं किये है, उधर अबु आजमी तो इन दिनों सहमे-सहमे हुए है जबसे मिडिया ने उनके पुराने दोस्तों में से के एक का जिक्र छेड़ा है जो एक इंडियन मुजाहिद्दीन के आंतकी है नाम है फैजान, जिसको इस साल फरवरी में दुबई में गिरफ्तार किया गया था और इनदिनों यहांके खुफिआ एजेंसी के हिरासत में है। मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को कुछ खरी -खोटी सुनाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बरक़रार रखा यद्दीप जितने भी जिला और ब्लॉक स्तर के पदाधिकारी थे उनको नहीं बक्श पाये हालाँकि ३६ ऐसे सर्वमान्य लोगोंको भी लालबत्ती उतारने के लिए फरमान जारी कर गए, अब देखना है कि उनके फरमान को ज्यादा तज़्ज़्वो उनके ही गणमान्य नेताओं देतें है अथवा अन्दरन्दाज करके खारिज करते है। ख़ुशी की बात यह रही कि आम चुनाव में बेशक सपा को पांच सीट ही मिल पाये हो पर मुलायम सिंह यादव के परिवारका का उत्तर प्रदेश के राजनीती में दबदबा अभी भी कायम है नतीजन पांच सीट ही सही पर परिवार के कोई भी सदस्य हार की मुंह नहीं खायी। 

दरअसल में हाल के आम चुनाव में ने तो अनेकोअनेक दिग्गज और दल ने अपनी साख और धाख गवां चुके है पर बसपा का तो जो हाल हुए है शायद मायावती कभी सपने में भी नहीं सोची होगी। सुफरा साफ़ हो गया यानि खाता ही नहीं खोल पाये जबकि चुनाव परिणाम के पूर्व कयास ये लगाये जा रहे थे की यदि किसी भी गठबंधन को न बहुमत मिलने के आसार में यदि थर्ड फ्रंट सरकार बनाने का दावा पेश करता है तो प्रधानमंत्री के रेस में बहन मायावती भी सुमार है पर इस तरह का परिणाम होगा ये किसी ने भी सोचा नहीं। मायावती इनदिनों अपनी खीश कांग्रेस पर निकाल रही है जो किसी भी दशा में तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है। वास्तविक में धर्म निरपेक्ष के आध में सियाशी मेवा सब खाने के लिए लार टपका रहे थे पर जनता ने उनके मनसूबे पर पानी फेर दिए तो एक दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप लगाने पर आमादा हो गए। 
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 आआपा के संयोजक माननीय केजरीवाल हाल के आम चुनाव में पराजित होकर इस कदर सर्मसार हो गए है कि लोगों से आँख मिलाने से बेहतर जेल में ही रहना पसंद कर रहे है अन्यथा उनको ये पता होना चाहिए कि देश में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है ऐसे में वे खुदको क्यों कानून से ऊपर समझ रहे है? इसके ऊपर बुद्धजीवियों का आत्मंमंथन जारी है और अतिशीघ्र केजरीवाल के मंसूबा जगजाहिर होंगे पर लोगों ने उनका सुनना बंद कर दिए इसीका नतीजा है जिन केजरीवाल के लिए ज्यादातर दिल्ली वासी सड़क पर उतर जाते थे आज उनके अपील को अनसुना कर रहे है। वाकये में केजरीवाल के अच्छे दिन गए लोगो को उनका मौकापरस्ती ही दीखता है इसीलिए लाख प्रयन्त के वाबजूद लोग उनके झांसे में नहीं आ रहे है। केजरीवाल वास्तविक में जनाधार और लोकप्रियता पर खुद ही ग्रहण लगा गए।  दिल्ली के लोगों ने उनको अपने आँखे और दिल में बैठने का जगह दिए पर लोगों को क्या पता था की दरअसल में केजरीवाल को सिर्फ जुबाँ पर बैठने की आदत है जो उन्हें दिल्ली में रहकर संभव होने वाले नहीं है इसीलिए तो अचानक दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर वाराणसी के तरफ कूच कर गए मोदी से दो-दो हाथ करने के लिए पर जितने उत्साह के साथ वाराणसी गए थे जब वापस आये थे उतने ही मायूस दिखे क्यूंकि जो भी था सब खो चुके थे हार-थक के उन्होंने गहन विचार करके दिल्ली में पुनः सरकार बनाने के लिए प्रयास में जुट गए पर कांग्रेस ने इस बार समर्थन देने से मना कर दी। आखिरकार कांग्रेस के सब कुछ पहले ही लूट गई और फिलहाल खोने के लिए कुछ भी नहीं है ऐसे में केजरीवाल को क्यों समर्थन दे?, जिनके बदौलत ही दिल्ली में अर्श से फर्श पर पंहुच गई। केजरीवाल को नितिन गडकरी के ऊपर अथवा अन्य नेता के ऊपर जो भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे इस तरह प्रतिकूल मौहाल में भारी पड़ रहा है क्यूंकि कसी भी आरोप को साबित करने के लिए सबूत की जरुरत होती जो केजरीवाल ने न्यायलाय के समक्ष नहीं रख सके, ऐसे में निजी बॉन्ड भरने के लिए न्याय उनको आदेश दिए पर वे इसके पक्ष में नहीं दिखें क्यूंकि उनको ये लगता है कि उन्होने आरोप लगाकर कोई गलती नहीं किये इसीलिए निजी बॉन्ड भरने का मतलब होता है कि उनका दोष साबित होना, यह केजरीवाल साहेब का मानना है। यदि केजरीवाल ने बिना सबुत के किसी के ऊपर आरोप लगाये है तो वास्तव में वे दोषी फिर भी अगर नहीं मान रहे है तो इसका एक ही मतलब होता है कि फिरसे लोगो का ध्यान अपने ऊपर आकर्षित करने के लिए निर्थक का ड्रामा कर रहे है जो लोगो को हज़म नहीं हो पा रहा है। यद्दीप हाल में मनीष तिवारी माफ़ी मांग चुके है क्यूंकि उन्होंने भी बिना सबुत के उन्ही व्यक्ति के ऊपर इसी तरह के आरोप लगाये थे जैसा कि  केजरीवाल साहेब लगा चुके है फिलहाल मनीष तिवारी के माफ़ी के बाद वह मामला उसी वक्त खत्म कर दिए गए। ऐसे में केजरीवाल क्यों नहीं संयम काम ले रहे और बिना तिल के तार बनाये हुए मामला ख़त्म करना चाहते है? 
सचमुच में केजरीवाल को भरम हो चूका है कि इस तरह के कारनामे को अंजाम देने से मिडिया का मुफ्त का पब्लिसिटी मिलेंगी जो दिल्ली के आगामी के विधानसभा के चुनाव में कारगर साबित होगा। बरहाल दिल्ली के आम आदमी बड़ी ही दिलचस्पी केजरीवाल के नौटंकी का लुप्त उठा रहे और बड़े ही उत्सुक से उनके आगे के खेल का इंतज़ार कर रहे है।








 अच्छे दिन वाकये में आनेवाले है !!


इस बार के चुनाव जँहा धर्मनिरपेक्ष के वकालत करनेवाले का हवा निकाल दिए वही जातिवाद के जरिये राजनीती के शीर्ष पर मौजूद आकाओ को भी लोगों ने बक्शा नहीं नतीजन बसपा, जदयू , सपा , राजद, सबको दहाई के भी अंक नसीब नहीं हुए जबकि बसपा अपनी खाता भी नहीं खुल पाये। कांग्रेस का तो लोगों ने ऐसा हाल किया कि कांग्रेस की कुर्सी भी गयी और विपक्ष में बैठने की औकाद भी गवांयी। असल में इसीको लोकतंत्र कहते है जँहा लोकशाही और तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं दीखता, वाकये में इस चुनाव के परिणाम ने बड़े -बड़े सुरमा को धूल फाँकने पर विवश कर गया। कई ने तो अपना जमानत जब्त करावा लिए तो कई ने सिर्फ अपनी साख गँवा कर बिल में घुस गए। बड़े -बड़े बड़बोले की बोलती बंद हो गए  अब तो पता ही नहीं चलता है कि यही वे है जो बड़े -बड़े डिंग हाकतें थे।

मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा था की मोदी लहर नहीं सुनामी चल रही है जिनसे आज़ाद भारत के लोकतंत्र के कई नए अध्याय लिखे जायेंगे फिर भी यह अंशका मेरे जहन में भी जरूर था कि यदि अल्पसंख्यक वोट नहीं मिला तो ऐतिहासिक जीत को पाना संभव होगा पर अन्तः मुमकिन हुआ क्यूंकि मेरा अंदाज़ा था की लोग इस बार जात -पात से ऊपर उठकर देश के विकास के लिए मतदान करेंगे और वैसा ही हुआ। मोदी के सुनामी में बड़े-बड़े राजनीती के चट्टान कहे जानेवाले के अरमान ढह गए। नितीश, माया, शरद पवार, मुलायम, लालू, करूणानिधि जैसे दिग्गजों का मटिया पलित हो गए या यूँ कहिये कि कांग्रेस के गोद में बैठे सभी को कांग्रेस के समेत मोदी के सुनामी ने बहाकर ले गई। जो केजरीवाल, शीला दीक्षित के विरुद्ध चुनाव जीतने से इस कदर गड -गड थे कि मोदी के सख्सयित को समझते हुए भी नज़र अंदाज़ करने की हिमाकत की नतीजन न खुद का साख बचा पाये और न ही पार्टी के साख बचा पाये मसलन दिल्ली में खाता भी नहीं खोल पाये विडम्बना तो तब हो गया कि इनके ज्यादातर शीर्ष नेता के  जमानत जब्त हो गयी।

शायद मोदी के लिए अब संसद में कुछ ज्यादा जद्दोजहद करने के लिए कुछ रह नहीं गया क्यूंकि सिर्फ और सिर्फ वह अपना पूरा ध्यान विकास पर ही केंद्रित रखेंगे। हालाँकि इनके लिए उन्हें ईमानदार और कर्मठ सदस्य के जरुरत पड़ेंगे जिन्हे वे खुद ही तलाश कर तराश सकते है। नई सरकार के विरासत में जो भी मिलनेवाला है मोदी को इनसे निपटने के लिए काफी मसकत करना होगा क्यूंकि मंहगाई के त्रासदी के बीच इस तरह कई फैसले लिए जाना बाकि है जो किसी हद तक मंहगाई को बढ़ायी गई न कि मंहगाई को काम करेगी। अन्तः लोग मंहगाई से पहले ही त्रस्त होकर मोदी के तरफ निहार रहे है की मंहगाई से निजात दिलाएंगे वैसे में मोदी को कई कठोर फैसले इस तरह के लेने होंगे जो कंही न कंही लोगो को आहात करेंगे इसलिए अब मोदी अपने सूझ-बुझ का किस तरह से इस्तेमाल कर लोगों के ऊपर मंहगाई का मार दिए बिना इन सभी समस्याएँ को दरकिनार कर अच्छे दिन आने का दस्तक सुनाएंगे, इस पर भी सबके पैनी नज़र है।

दरअसल में कांग्रेस सरकार ने जाते -जाते कुछ इस कदर के फैसले कर गए जो जनता के हिट में कतई नहीं है। कांग्रेस ने गैस का कीमत बढाने पर राजी थी बस चुनाव के चलते इसे रोके थे इसी कारण रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सरकार को लीगल नोटिस भी भेजा था परन्तु चुनाव के दौरान सरकार में बैठे आला अफसर हो या मंत्री इनको शायद आभास था फिरसे उनको मौका नहीं मिलने वाला है इसीलिए तो खामोश होकर आनेवाली सरकार के मत्थे मङने का काम कर गए।  दूसरी तरफ रेलवे ने भी यात्री किराये में भारी बढतोरी के सिफारिश अपने मंत्रालय को भेज रखे बस नई सरकार के गठन होते ही फैसला लिए जाना है। मोदी के लिए रेलवे मंत्रालय सबसे बड़ी चुनौती होनेवाली है क्यूंकि UPA-२ के कार्यकाल में ५-६ बार इनके मंत्री बदले गए थे, किराये में बेंतहा बढ़ोतरी के उपरांत भी सुरक्षा और सुविधा के नाम पर यात्री ठगा ही महसूस करते रहे जबकि इन्ही के मंत्रीको पद्दोन्नति के बदलें रिस्वत लेने का आरोप भी लगे है।  ऐसे में रेलवे मंत्रीके लिए योग्यता के साथ - साथ ईमानदारी भी जरुरी है ताकि इस तरह के आरोप से बचा जाय।

बरहाल देश के जनता को कांग्रेस के कहर की परेशान अभी तली नहीं है जबतक नई सरकार के द्वारा राहत के अनेको-अनेक कदमें यथाशीघ्र नहीं उठाई जाती है।  एक तरफ असुरक्षा जो लोगों के दिलो-दिमाग में पैठ बना लिया है उसके लिए कई कारगर कदम उठाने है और इसकेलिए सबसे पहले देश से बंगलादेशी को बेइज्जत निकालना होगा क्यूंकि बंगलादेशी ने देश के तमाम शहरों में तकरीबन पचास फ़ीसदी क्राइम को अंजाम देते है अगर इनको इन शहरों से भगाया जाता है तो शहर में पचास फ़ीसदी क्राइम में निश्चित कमी दर्ज़ होगी। अभी तक कांग्रेस हो, आआपा हो अथवा अन्य पार्टी वोट के लिए इनके हिमायत किया करते थे और इनको अपना सरक्षण देते रहे थे पर लोगों के लिए अच्छा होगा कि इन बांग्लादेशी को बिना बिलम्ब इस देश से बाहर का रास्ता दिखाया जाय ताकि इनको दिए जानेवाले सहूलियत देश के जनता को मिलें और देश जनता को इनके द्वारा रोजमर्रा के आतंक से राहात मिलें।
सुरक्षा के संदर्भ में सबसे पहले पुलिस सुधार कानून को लागु किया जाना अतयंत आवश्यक है, जिसका खाका पहले सी तैयार है क्यूंकि पुलिस को जब तक जवाबदेही और उनके काम काज को लेखा -जोखा के लिए निगरानी कमिटी नहीं बनाई जाती है तब तक लोगों के जहन से  असुरक्षा का भावना निकालना कदापि संभव नहीं है।

आखिकार जनता ने अपनी वोट को जिम्मेवारी और जवाबदेही के साथ प्रदान की है इसीलिए सरकार का अब दायित्व बनता है कि सरकार जनता के सपने को साकार करे और किये गए सभी वदाओं को पुरे करने के लिए अभी से कटिबद्ध हो जाये ताकि जनता को दिलाशा मिले की सचमुच में अच्छे दिन आने वाले है।

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सोमवार, 19 मई 2014


क्या अल्पसंख्यक समुदाय फिरसे मौका गवां दिए ?



 इन दिनों प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो अथवा सोशल मीडिया सब जगह यह आत्ममंथन करने में लगे है कि यदि मोदी लहर चल रह था, वाकये में इंदिरा गांधी के देहांत के उपरांत राजीव गांधी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवारी के सन्दर्भ में लहर देखा गया था उनसे भी बढ़कर था तो वह वोटो में तब्दील क्यों नहि हुआ ? वास्तविक में मीडिया के द्वारा एक्सिट पोल से लहर व सुनामी क आभाष  नहि किया जा सकता है पर ये भी संकेत दे रहे है कि एनडीए गंठबंधन को सरकार बनाने की मेजोरिटी मिल रही है जो आज के परिवेश में काफी है क्यूंकि पिछले दो दशक में किसी भी पार्टी को इतने सीट नहि मिलें जितने इस बार भाजपा को मिलता दिख रहा है।

दरअसल में मोदी लहर आजाद भारत में अभी तक के सबसे बड़ा सत्ता परिवर्त्तन का लहर है जिसमें सिर्फ बहुसंख्यक वोट एक मुस्त होकर किसी एक दल को मिला यदि अल्प् -संख्यक लोग भी भाजपा को समर्थन देते तो एक्सिट पोल तथापि एक्चुअल परिणाम १९८४ से चुनाव परिणाम के भाँति अव्वल ही होते है। इस चुनाव परिणाम से भाजपा और आरएसएस के पूर्णतः ज्ञात हो जाना चाहिए कि देश के अल्पसंख्यक क़िसी भी हाल में उनको वोट नहि दे सकते, यदि एक तरफ़ त्रासदी और तानाशाह देने वाली पार्टी हो जबकि दुसरे तरफ़ भाजपा हो तो ऐसे आफद के घड़ि में अल्पसंख्यक भाजपा को चित्त करने के लिये आफद और त्रासदी से प्रेरित पार्टी को ही वोट करेँगे।  फिर भी बिहार, उत्तर प्रदेश और पस्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक से उम्मींद सिर्फ दिल को तस्सल्ली देने के लिये ही  किया जा सकता है।

हालाँकि गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के अल्पसंख्यक में भाजपा के प्रति सकारात्मक रवैया देख जा सकता है जिस कारण उन प्रांतो में भाजपा क्लीन स्वीप कर सकती है। देश में अल्पसंख्यक क वोट लगभग  २० -२२ प्रतिशत है जो यदि एक पार्टी के पक्ष में दिया जाता है तो उन पार्टी को हराना कतई  आसान नहि है। चाहे क्षेत्रीय पार्टी हो अथवा राष्टीय पार्टी हो  अल्प-संख्यक  का वोट अगर उनके पाले में जाता है उन्हे जीत पक्की मानी जाती है। इसीलिए देश के जितनें भी क्षैत्रिय पार्टी वह खुदको धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़ा पुजारी के रुप में सैदेव अल्प संख्यक सामने पेश करते रहते है जबकि राष्ट्रीय शियाशी दल अनेकौ प्रकार के ताना -बाना बुनते रहते है ताकि अल्प संख्यक वोट किसी भी हाल में न खिसके। जबकि देश के अल्प संख्यक अपने एक मुस्त वोट सिर्फ़ भाजपा को हरानेवाली पार्टी को पड़ोसते आरहे है इसिलिये तो सिर्फ़ बार जाति और क्षैत्रिय स्वार्थ को छोड़कर पुरे देश एक सरकार का सपना देखेँ जो उन्हे विकास और समृद्धी की ओर ले जाए ऐसे में अल्प संख्यक समुदाय से भी सकारात्मक योगदान का आपेक्षा करना वाजिव था।

आज के परिदृश्य में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक मौजूदा सरकारके खिलाफ जो आक्रोश था उसीका  नतीजा है कि अल्पसंख्यक समुदाय के नकारात्मक झुकाव के वाबजूद भाजपा अपने पिछलें सभी रिकॉर्ड को ध्वस्त करके इस चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन करने जा रही है।  एक तरफ परिवर्तन के महायज्ञ में सबने बड़े उत्साह के साथ अपनी-अपनी आहुति देने क काम किये है फिर भी कोइ समुदाय चुक गये तो वह हो अल्प-संखयक समुदाय का बड़े तबक़े जो देश के इस बदलाव के बीच अपने व्यक्तिगत खीश को तज्जुब दी इन्हीके चलते देश के समृद्ध और संप्रभुता सरकार की  बात करने वाले लोगो को अनदेखी करके अपने बहुमूल्य वोट को उनको दें दिये जिनके कार्यशैली से तकरीबन समस्त देश हतोत्साहित थे।  यद्दिप इस चुनाव में अल्पसंख्यक के लिये एक बेहतरीन मौका था जिनको न कि खुद हि गंवा दिये ब्लीक एक बार फिर ये साबित कर गये कि उनके लिये देश से पहले उनका निजी हित ही सर्वोपरि है जिसे किसी भी हाल में छोड़ा नहि जा सकता है।

बरहाल १६ मई को पुरे आवाम को बड़े वेसर्बी से इन्तज़ार है जिस रोज रुझान वास्तविकता से रूबरू होंगे।  वस्तुतः  चुनाव परिणाम आने के बाद ही सरकार के शक्ति का  आँकलन करना मुमकिन होगा क्युँकी जितनें छोटी गठबंधन क स्वरुप होंगे उतने ही अपेक्षित और दीर्घायु सरकार का  कल्पना की जा सकती है और भावी सरकार के लिये भी सम्भव होगे कि जनता के उम्मीद पर बखूबी उतरने का प्रयास करेंगे।