सोमवार, 22 सितंबर 2014
गुरुवार, 18 सितंबर 2014
सोमवार, 8 सितंबर 2014
आने वाला विधानसभा चुनाव बिहार का टर्निंग पॉइंट……!!
हाय रे नितीश बाबू, चूहा खाने वाले शख्श के हवाले बिहार और बिहार की जनता को करके खूब मजाक किया है। बेशक, आप अपने को सोशल इंजीनियर कहते हो पर ये जो मांझी है, जरूर आपके नैया को बीच मझधार में डुबोयेगा उस त्रासदी से न लालू और न हीं मैडम आप को किनारा लगा पाएंगे जिस कदर विकाश और शुसाशन का मसीहा बनने के खातिर उत्तावलापन आप में कूट -कूट कर भरा था अन्तः आज वही महत्वांक्षा ने आप को नेस्तनाबूद कर दिया और जिनको वर्षो आप कट्टर विरोधी मानते थे और जिनके लिए सदेव अभद्र भाषा का प्रयोग करते रहे थे अचानक उनके गोद में जा कर बैठ गए हैं हालाँकि वे आज भी राजनितिक समझोता के तहत उनके अपनी गोद में बिठा रखा है अन्यथा मज़बूरी नहीं होता तो उनको दुत्कारने के आलावा कुछ नहीं देता। वास्तविक में ज्यादातर लोग नितीश बाबू के इस हैरतअंगेज कारनामे को देखकर सन्न है क्यूंकि बहुतो को ये समझ यह नहीं आ रहा है कि आखिर लालू और नितीश के बीच जो गठजोड़ है इसको नैतिक कैसे कहे?, जो कि न ही वैचारिक और न ही मौलिक तालमेल रखता है। अगर इन दोनों के बीच में कुछ समानता है तो वह सिर्फ अल्प संख्यक वोट को हासिल करने की होड़ अर्थात कांग्रेस , आरजेडी और जेदयू के बीच महा गठजोड़ मौका का तकाज़ा है जो अवसरवादी व मौकापरस्ती राजनितिक का जीता जागता उदहारण है जो पूरी सिद्दत से हमें यह सिखाता है कि राजनीती में सब कुछ जायज़ है जहाँतक विचार अथवा सिद्धांत सिर्फ दिखावे के लिए होता और जो मौका और अवसर के नीचे दब कर दम तोड़ देते है।
यदि कांग्रेस और आरजेडी से कुछ सीखा जाय तो केवल ये सीखना अहम होगा कि परदे के पीछे से अपने आशाएं और आकांक्षाएँ को कैसे पूरा किया जाता है?, इसीलिए ज्योंही आम चुनाव के पश्चात नितीश बाबू के सपने पर पूर्ण विराम लग गया, बिना बिलम्ब के परदे के पीछे से राजनीती करना शुरू कर दिए हालाँकि इनसे यह तो साफ़ जाहिर हो गया कि अब सीधे जनता से रूबरू होना उनके लिए सहज नहीं है क्यूंकि जनता इस कदर उनके महत्वाकांक्षी इच्छाए को जलाकर राख कर दिए, इसी लिए तो बौखलाकर जतिन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस और आरजेडी के द्वारा अतीत में किये गए राजनीति से ही प्रभावित होकर उनके नक़्शे - कदम पर आगे की राजनीती करने निश्चय किया इसी कारन से परदे के पीछे की राजनीती को अपनाया। आरजेडी ने यह कारनामा तब किये थे जब लालू को चारा घोटाला के आरोप में जेल जाना पड़ा था उस समय उन्होंने ही रावडी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर परदे के पीछे की राजनीती की नींव रखी और कांग्रेस ने पिछले दस साल से भारत के आवाम को इसी तरह का ही राजनीती से केंद्र के सत्ता पर काबिज़ थे मसलन मुख्या कोई और फैसला किसी और का अर्थात फ्रंट पर कुर्सी काबिज़ शख्श सिर्फ रबड़ मोहर का काम करते है, यद्दीप कांग्रेस और आरजेडी को इसके बदले बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी , नतीजन कांग्रेस आज सेंटर में लीडर ऑफ़ अप्पोज़ीशन के पद से भी मेहरूम है वही आरजेडी का कमोबेश यही हाल बिहार में रही है। अब देखना है कि शुसाशन बाबू का क्या हाल होता है ?
जनता को अभी तक समझ में नहीं आ रही है जो नितीश बाबू लालू को फूटी आँख सुहाते नहीं थे आज क्या चमत्कार हो गया जो एक -दूसरे का पूरक का काम कर रहे है। ये मोदी का तूफ़ान ही था जो दोनों एक साथ एक छत के नीचे लाकर खड़े कर गए या भविष्य में होने वाले परिवर्तन का आभाष मानिये जो इन दोनों को इस कदर भयवित कर गए कि सबको न चाह कर एकत्र होना पड़ रहा है। जहाँ तक मौका परस्ती के इस गठजोड़ की आयु निर्धारण करना बहुत ही कठिन है क्यूंकि लालू को लेकर सुविचार हैं यह है की वह अभी उपयुक्त समय को तलाश रहे है ताकि एक साथ कई दुश्मनो से सामना कर सके उसमें जेदयू अग्रिम पंक्ति में अंकित है जिसका आभाष सबको यथाशीघ्र होनेवाला है। फिलहाल इतने खुद ही दुर्बल है कि अपनी सामर्थय के बढ़ोतरी में लगे हुए है और खोये हुए साख को पाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे है।
नितीश बाबू ने जो अपने ड्राइविंग लाइसेंश पर जतिन राम माझी को फोटो चिपका दिए है यह शायद उनकी राजनीती जीवन के दूसरे सबसे बड़ी भूल साबित होने वाली है क्यूंकि कम से कम ऐसे योग्य आदमी के हवाले बिहार के लोगो को करते जो अपनी जिम्मेवारी को जवाबदेही के साथ निर्वाह करते न की अनाप -सनाप बयानंबाजी करकर बिहार के जनता और बिहार को शर्मसार करने में लिप्त पाये जाते। हद ही कर दिया जब अपने शुविचार से सबको अवगत कराया जो कि कालाबजारियों के प्रति समर्पित था हालाँकि यह सहानभूति का मखमूल जवाब वँहा के आवाम को ही देने होगे क्यूंकि प्रान्त के मुख्या का इस तरह का विचार लोगो को हतोतसाहित करने के आलावा और कुछ नहीं हो सकता जिसका परिणाम काफी भयानक सिद्द होनेवाला है जो व्यवस्था के प्रति आस्था को झकझोरने का काम करेगा।
बरहाल बिहार में जितना राजनितिक उठल पुथल इनदिनों देखने को मिल रहे है कदाचित अतीत में कभी नहीं देखा गया होगा क्यूंकि बिहार की राजनीती का शायद आने वाला विधानसभा चुनाव टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला हैं जो कई यथावत बरसों से आ रहे शियाशी परम्परा को अस्तित्व विहीन करने वाला है, जो न कि बिहार के भविष्य के राजनीती की बुनियाद को स्थापित करेगी ब्लीक कई ऐसे राजनीती घराने जो दशको से बिहार के राजनीती में अहम किरदार निभा रहे थे उनके राजनीती विरासत का आगे के स्वरूप चिन्हित करेगी और यह तय करेगी कि कल बिहार विकास के कसौटी के लिए आतुर है या फिर से वही जाति और महजब के बीच में उलझ कर विकास के पथ से बिमुख होगी। आखिकार कई अनसुलझे सवालों का जवाब देश के लोगो को बिहार के विधान सभा चुनाव के उपरांत मिलना शुनिश्चित है।
सोमवार, 11 अगस्त 2014
कानून नहीं व्यवस्था को दुरुस्त करो ................ !!!
तत्कालीन परिस्थिति में समाज में कोई भी त्रासदी होती है तो इसका जिम्मेवार लचर कानून को ठहराया जाता है जबकि व्यवस्था को कभी भी दुरुस्त करने को लेकर बहुत ज्यादा उत्साह न ही संसद के पतल पर और न ही इन्साफ के मंदिर में देखा जाता है। इनदिनों समाज में कई तो ऐसे है जिन्हे इन लचर कानून से जरा भी डर नहीं लगता जबकि कई ऐसे भी है जो इस लचर कानून के भेंट चढ़ जाते है।
देश में जब भी कोई बहुत बड़ी अनहोनी अपनी आखरी अंजाम तक नहीं पहुँच जाती है और इसका दुष्प्रभाव के कारन लोगों का आक्रोश सड़को पर और उनकी आवाज़ संसद के चार दीवारों से जब तक नहीं टकराती है तब तक सरकार और उनके सिपाह -सलाहकारों के कानों में जूं तक नहीं रेंगते है। लोगों का आक्रोश को पहले तो कुचलने का भ्रशक प्रयास करते दिखे जाते फिर भी लोगों का आक्रोश जब जनांदोलन का रूप अख्तियार करने लगता है ऐसे परिस्थिति में सरकार अपने सामने कोई अन्य विकल्प न पाकर आवाम के आगे पास्ट होकर या तो शख्त कानून बनाने का अस्वासन देते है या कानून को संशोधित करके सदन में पारित करवाने का। न जाने सरकार ने कितने बार कई कानून में संशोधन करके काफी शख्त बनाने का प्रयन्त की हो पर गुनहगारों के अंदर खौफ पैदा करने में असफलता ही हाथ लगे इसीका परिणाम है कि समाज में पनप रहे वृकृतियों को रोकने में ना कामयाब ही रहे ...!!!
कामयाबी तो कदाचित नहीं कहा जा सकता, जिस कदर हाल में महिलाओं के विरुद्ध अपराध में बृद्धि हुई है हालाँकि बलात्कार और यौनउत्पीरण जैसे घिनोने करतूत रोकने के लिए बहुत ही शख्त कानून बनाये गए पर नतीजा बलात्कार जैसे घटनाये में गिरावट होने के वजाय बढ़ोतरी ही देखे जा रहे है। शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिस दिन बलात्कार और महिला यौनउत्पीरण के घटनाएँ सुनने को न मिले, अर्थात इस तरह के वारदात यथावत जारी है फिर शख्त कानून बनाने से क्या फायदा?
भ्रष्टाचार रोधक कानून हो अथवा घरेलू हिंशा जैसे संवेदनशील मसला कानून इतना शख्त कि शायद ही दोषी बरी होने का रास्ता ढूँढ पाये लेकिन इस तरह के कानून जँहा दोषियों को अन्ततः निर्दोष साबित होने से नहीं रोक पाते वही बेकसूर लोगों को हवालात के हवा खिलाने से नहीं चूकतें। आज एक तरफ अधिकाधिक महिलाये घरेलु हिंशा और यौनउत्पीरण का शिकार हो रही है वही ऐसे भी लोग का तादाद कम नहीं है जो बिना किसी अपराध के अथवा साज़िश के तहत इस कानून के शिकार हो रहे।
दरअसल में इनदिनों देश को शख्त कानून का नहीं ब्लिक वव्यस्था में सुधार की जरुरत है जिसके पुलिस और न्यायपालिका को दुरुस्त किया जाना चाहिए। न्यायपालिका के नीचले पायदान पर भ्रष्टाचार इस कदर विद्द्मान है कि लोग उनसे दूर ही खुदको रहना मुनासिब समझते है। इन्साफ के आस में न जाने बरसो एड़ी घिसवा कर जब इंसाफ का उम्मीद धीरे -धीरे करके टूटने लगती है पीड़ित अब शायद इंसाफ का गुहार भुलाकर आँशुओँ के फुहार से इतने नरम हो जाते है कि सांत्वना के लिए तो बेशक इंसाफ को स्वीकारा जा सकता पर वास्तविक में इनके अहमियत कुछ खाश रह नहीं जाते ऐसे में सरकार और सर्वोच्य न्यायपालिका प्रतिबद्ध होकर एक किसी भी मामला के लिए एक सिमित अवधि तय करे जिसके दरमियान बिना किसी विलम्ब के पीड़ित को इन्साफ मिल सके।
चाहे कानून कितना भी शख्त क्यूँ न हो पर प्रशाशन के लचीले रवैया के कारण उन्हें सफलतापूर्वक लागु करना हरगिज़ मुमकिन नहीं है अर्थात प्रशाशनीय ढाँचा को सुधार के बिना किसी भी कानून को लागु करने के बारे में सोचना कटई उचित नहीं होगा। अगर कानून और व्यवस्था दोनों में एक साथ सुधार नहीं किया जाता तो कदापि सरकार के रुख को कभी भी सकारत्मक और अपेक्षाकृत नहीं समझा जा सकता बेशक एक से एक शख्त कानून पेश करते रहे। व्यवस्था और कानून एक दूसरे का पूरक है जो समाज में अनुशाशन बनाये रखते है। शख्त कानून होने के वाबजूद, व्यवस्था को अगर लकवा मार दिया हो तो कानून को दिशा और गति कौन देगा ?, अर्थात कानून कैसा भी हो पालन करवाने के लिए मजबूत व्यवस्था की दरकार है जो ईमानदारी और जवाबदेही के साथ अपने जिम्मेवारी का निर्वाह कर सके।
आजादी के बाद लोगों के जहन में व्यवस्था को लेकर कई बार उबाल आया और कुछ लोगों ने इनका भरपूर फायदा उठाया नतीजन इसके बदौलत सत्ता पर तो आसीन हो गए पर जब बारी आई इस व्यवस्था को दुरुस्त करने का तो ताल मटोल करके कानी काट गए आख़िरकार देश के आवाम अभी भी व्यवस्था को लेकर असंतुष्ट ही है। हालाँकि पिछले कुछ बरसों में जनता व्यवस्था को लेकर सजग है और सरकार को बीच -बीच में आगाह कर रही है की दुरुस्त करो वर्ना अंजाम अवांछित होगा इससे तो जरूर आभाष होता है कि व्यवस्था को लेकर सरकार अपनी उपेक्षाकृत इच्छाशक्ति को तिलांजलि देकर अतिशीघ्र कारगर कदम उठाएगी। क्यूंकि पुलिस रेफ़ोर्मेशन और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था जब तक नहीं होगा तब तक देश के आवाम असली लोकतान्त्रिक सुख से वंचित ही रहेंगे क्यूंकि पुलिस का व्यवहार और कार्यशैली दोनों में वदलाब की जरुरत है। सबसे अहम पुलिस को सत्ता के पुजारी के गिरफ्त से मुक्त करना और जवाबदेही के साथ ऊर्जा और स्फूर्ति की जरुरत है जबकि भ्रष्ट और कर्तव्यविमुख अधिकारीयों के लिए शख्त कानून भी अत्यंत आवश्यक है ताकि ऐसे अधिकारीयों के ऊपर नकेल कस सके।
न्यापालिका को चाहिए कि खुद ऐसे मामलों का संज्ञान ले जो समाज के संरचना को धवष्ट करने पर आमादा है। देश में बहुत ऐसे कानून है जिसके अंदर अनगिनित खामियाँ है जिन्हे चिन्हित करके संशोधन करने का आवश्यकता है। यदि कानून -व्यवस्था को दुरुस्त किये कोई सरकार हमें सुपर पावर बनाने का सपना दिखाते है तो मानों रात में सूरज दिखाने का बात कहना जो कभी भी सच से रूबरू नहीं होगी इसीलिए सरकार को सबसे पहले चाहिए कि व्यवस्था को दुरुस्त करे ………………!!!!
आजादी के बाद लोगों के जहन में व्यवस्था को लेकर कई बार उबाल आया और कुछ लोगों ने इनका भरपूर फायदा उठाया नतीजन इसके बदौलत सत्ता पर तो आसीन हो गए पर जब बारी आई इस व्यवस्था को दुरुस्त करने का तो ताल मटोल करके कानी काट गए आख़िरकार देश के आवाम अभी भी व्यवस्था को लेकर असंतुष्ट ही है। हालाँकि पिछले कुछ बरसों में जनता व्यवस्था को लेकर सजग है और सरकार को बीच -बीच में आगाह कर रही है की दुरुस्त करो वर्ना अंजाम अवांछित होगा इससे तो जरूर आभाष होता है कि व्यवस्था को लेकर सरकार अपनी उपेक्षाकृत इच्छाशक्ति को तिलांजलि देकर अतिशीघ्र कारगर कदम उठाएगी। क्यूंकि पुलिस रेफ़ोर्मेशन और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था जब तक नहीं होगा तब तक देश के आवाम असली लोकतान्त्रिक सुख से वंचित ही रहेंगे क्यूंकि पुलिस का व्यवहार और कार्यशैली दोनों में वदलाब की जरुरत है। सबसे अहम पुलिस को सत्ता के पुजारी के गिरफ्त से मुक्त करना और जवाबदेही के साथ ऊर्जा और स्फूर्ति की जरुरत है जबकि भ्रष्ट और कर्तव्यविमुख अधिकारीयों के लिए शख्त कानून भी अत्यंत आवश्यक है ताकि ऐसे अधिकारीयों के ऊपर नकेल कस सके।
न्यापालिका को चाहिए कि खुद ऐसे मामलों का संज्ञान ले जो समाज के संरचना को धवष्ट करने पर आमादा है। देश में बहुत ऐसे कानून है जिसके अंदर अनगिनित खामियाँ है जिन्हे चिन्हित करके संशोधन करने का आवश्यकता है। यदि कानून -व्यवस्था को दुरुस्त किये कोई सरकार हमें सुपर पावर बनाने का सपना दिखाते है तो मानों रात में सूरज दिखाने का बात कहना जो कभी भी सच से रूबरू नहीं होगी इसीलिए सरकार को सबसे पहले चाहिए कि व्यवस्था को दुरुस्त करे ………………!!!!
रविवार, 13 जुलाई 2014
दिल्ली में बिजली गुल !!
इन दिनों दिल्ली जिस कदर बिजली की किल्लत से जूझ रही है शायद अतीत में दिल्ली के लोगों को इतने बुरे हलात से शायद ही रूबरू हुए होंगे। इसकेलिए केजरीवाल तो मुख्य दोषी है जबकि बची -खुची कसर देश के तत्कालीन सरकार पूरी कर दिए। दरअसल में दिल्ली का इनदिनों सुध लेनेवाला कोई नहीं है केजरीवाल का केजरी नाच का स्वाहा हो चूका है और उनके द्वारा किये गए करवाई का ही खीश कहिये जो इनदिनों बिजली कंपनी दिल्लीवासीयों पर निकाल रहे है। अतीत में एक घंटे की कटौती के जगह इनदिनों ६ से ८ घंटे बेझिझक कटौती कर रही है।वास्तविक में दिल्ली के उपराज्यपाल हो अथवा केंद्रीय बिजली मंत्री के पास इतनी फुरसत कँहा कि दिल्ली वालों का खबर लें, जब जनप्रतिनिधि ही जनता के प्रति उदासीनता दिखा रहे हो तो ऐसे में बिजली कंपनी के सर्वोचय पदो पर विराजमान महानुभाव व सरकारी दफ्तर का शोभा बढ़ा रहे बाबुओं उनको किस बात का फिक्र होगा। अन्तः जनता फिरसे खुदको कोस रही है इसका परिणाम कितना गंभीर होता है यह सचमुच कांग्रेस पार्टी भलीभांति जान चुकी है और इनदिनों सत्ता पर आसीन पार्टी को भी जान लेनी चाहिए अन्यथा जनता प्रायश्चित करने के लिए भी नहीं छोड़ती जैसा कि हालमें केजरीवाल का किया है।
बरहाल मोदी और उनकी सरकार कितना भी पीठ क्यूँ न थपथपा ले परन्तु हक़ीक़त लोगों के समझ से परे है। जबकि बिजली मंत्री बड़बोलेपण ही कहा जायेगा, जो देश के लोगों को बिजली की समस्या से निजात दिलाने की बात कहते अथवा अस्वासन देते फिरते है यद्दीप दिल्ली जैसी छोटी राज्य में बिजली की समस्या को दुरुस्त करने के लिए अभी तक सामने भी नहीं आये और न ही उनके तरफ से कोई कारगर कदम उठाये गए मसलन दिल्ली के अधिकाधिक लोग असंतुष्ट और आशाविहीन है और उनके संजीदा को लेकर असमंजस है। अन्तोगत्वा इसका परिणाम सकारात्मक हरगिज़ नहीं होगा और अच्छे दिन की बात करने के वजाय प्रतिबद्धता के साथ प्रत्यनशील होना चाहिए ताकि दिल्ली की बिजली की समस्या का हल निकाल कर दिल्लीवासियों को बिजली की किल्लत से राहत मिलें।
शनिवार, 12 जुलाई 2014
बावन, कुकुर, हाथी अपने ज़ात केर खाती!!
वाकये ई कहावत यथार्थ अछि, आई जे ब्राह्मण के हाल अछि ओकरा लेल ब्राह्मण स्वंय जिम्मेवार अछि। कारन जे आइयो ब्राह्मण प्रबुद्धता और विलक्षणता म इस्वर के कृपा से जन्मजात अव्वल प्राप्त होयत अछि लेकिन सदैव कनि व तनिक लाभ के लेल ओकर दुरपयोग करैत म अगुआ नतीजा आई हास्य पर अछि। देश में जतेक जाति आओर वर्ग छैक ओकर समुदाय में कोनो -कोनो संगठन धुरी क कार्य कय रहल अछि मुद्दा जखन ब्राह्मण समाज के बात करब त एहि प्रकार के कोनो संगठन चिन्हित कयल जा सकैत अछि पूरा ब्राह्मण समाज क बाँधी में सक्षम हुआ। एकर सिर्फ एक ही कारन अछि जे ब्राह्मण अपन जाति के उठावय कम पर गिरयावे ज्यादा अग्रसर अछि। आब समय आवि चुकल ह आओर सब गोटे एक जुट भ जाऊ अन्यथा विलुप्त हो में कोनो कसर नहीं रहत। पिछुलगुआ बनैत स बढियां अछि जे अपन आत्मसम्मानक लेल अपन जाति संग जुडी कियाकि जनसंख्याके आधार पर त मुट्ठी भर छी , जेना आहिस्ता आहिस्ता सरकार म अथवा सरकार के सुधी स बेदखल भय रहल छी ओहिना हर तरहेँ स बेदखल भ जायब आओर आई आरक्षण के माध्यम स त काइल सरक्षण के माध्यम स आहाँकेर आत्मसम्मान और अस्तित्व क चुनौती दैत। अपन प्रतिकिर्या जरूर साक्षात कराएब।कौनो समाजकेर तरक्की म अत्यंत योगदान होयत अछि जे सब कियोक मिलेकेर अपन समाज म पिछड़ल लोग केर उत्थान में समाज के प्रबुद्ध वर्ग अहम योगदान दय क लेल सम्प्रीत होइ मुद्दा ब्राह्मण आओर ओहिमे मैथिल ब्राह्मण होइ त कानी काटे में माहिर अछि एही कारन स ब्राह्मण समाज दिन पर दिन पीछेड़ रहेईल अछि हालाँकि दोसर जाति के ऊपर ई परिवेश भिन्न अछि बहुतो जाति आरक्षण के माध्यम स सरकारी -नौकरी पेशा म खूब तेजी स पहुँच रहल अछि। बनिया, गुजराती आओर पंजाबी समाज के उन्नतिक मूल मन्त्र किछु अछि त अछि ओहि समाज केर लोग में एकता आओर अखंडता ईयाह ओहि समाज क कुशलता केर सर्वोपरि मापदंड मानल जायत अछि। यदि मैथिल ब्राह्मण सब कियो मिलके अपन समाज केर अग्रिम समाज के श्रेणी म ल जायके इच्छुक छि तहन मिलजुल केर आगू आउ समाज केर प्रति प्रतिबद्धता दर्शाबैके चेस्ता करू। जय मैथिलि ब्राह्मण समाज।
शुक्रवार, 20 जून 2014
पुनः मूषक भवः (केजरीवाल चरित्रमानस् )
बेशक राजनीती के पृष्ठभूमि पर एक नए अध्याय का शुरुआत माना जा रहा था, सभी ने ये मान लिया था कि अब पारंपरिक राजनीती से हत कर आम आदमी के उम्मींद को पुरे करने के लिए ' मैं हूँ आम आदमी' का नारा लेकर हमारे बीच जो आये है वह प्रदूषित राजनितिक परिवेश को अन्तकरण से शुद्धि करेंगे इसलिए लोगों ने उनके तमाम बातों पर यंकी करके अपने मत के जरिये अभय वरदान दिए ताकि किये गए वादों को पुरे करे। हालाँकि लोगों को तो यह पता था कि राजनीती दूषित हो गयी जिसे शुद्धिकरण की जरुरत है पर यह भूल गए कि राजनीती एक ऐसा परिवेश है जिसमें कोई भी जाकर लोगों के उम्मीद को पूरा करने के वजाय खुदको ज्यादा तहजीब देते है और अतीत में किये गए सब वादों को भूलकर अपने भविष्य को सवारने के लिए हर एक हथकण्डे अपनाने लगते है जो लोगों के सोंच से परे होते है। जो अतीत में सुचिता और नैतिकता का पाठ पढ़ाते है जब राजनीती के मौहाल में पँहुचते है तो सबको बिसाड़ कर सत्ता के लार में फिसलकर संवेदना और विनर्मता को पीछे छोड़ देते है अन्तः उनके मस्तिक में सिर्फ एक ही चीज रह जाती है कि किसी तरह कैसे सत्ता उनके अधीन हो ? उदाहरणस्वरूप यदि किसी चूहा को शेर बना दिया जाय तो वह अपने अतीत को भुलाकर सिर्फ शिकार के बारे में सोचना शुरू कर देते है अचानक उनके सामने वह व्यक्ति भी आ जाय जो उन्हें चूहा से शेर बनाया था उन्हे भी नहीं छोड़ेंगा , जैसा कि निम्नलिखित कहानी में उल्लेख किया गया है :-
एक जंगल में एक चूहा रहता था। एक रोज उनका सामना एक बिल्ली से हुआ, जैसे ही बिल्ली उनके ऊपर प्रहार करने के लिए दौड़े फौरन चूहा वहाँ से भागे और भाग कर तपस्या में लीन मुन्नीवर के समीप पँहुच कर उनसे विनती करने लगे। मुन्नीवर को उनके ऊपर तरस आ गया मुन्नी ने पूछा" क्या है तुम्हारे दुःख का कारण?"
चूहा ने रोते हुए कहा" मुन्नीवर, मै अपनी जान बिल्ली से किसी तरह बचाकर आपके पास आया हूँ अर्थात आपसे विनती है कि हमें बिल्ली बना दे ताकि मैं बिल्ली के भय से मुक्त होकर जंगल में रह सँकु।
मुन्नीवर उनके विलाप से द्रवित होकर कहा " यथास्तुः।."
चूहा मुन्निवर से वरदान प्राप्त करके जंगल को लोट आये और रहने लगे। कुछ समय के पश्चात उनका सामना शेर से हुआ पहले तो उनको लगा कि वह डटकर उनका मुकावला कर सकते है पर शेर के हमला से लहूलुहान हो कर फिरसे मुन्निवर के आश्रम में जा पंहुचे। मुन्निवर को अपनी आपबीती सुनाई और उनके चरणो में पड़ कर गिरगिराने लगा। मुन्निवर का दिल उनके करुणामय विनती से सुनकर पसीज गया मुन्निवर ने उनको फिरसे यथास्तु के साथ उनको शेर बना दिए।
कई बर्षो के उपरांत मुन्निवर उसी जंगल से गुजर रहे थे जँहा चूहा से बने शेर रहा करता था। अचानक मुन्नी के नज़र आगे खड़े शेर पर पड़े। मुन्निवर निर्भीक होकर चलते रहे क्यूंकि वह जानते थे कि वही चूहा है जिसे उन्होंने ही शेर बनाया था। परन्तु शेर ने दहाड़ कर मुन्निवर के ऊपर आक्रमण किया, झट से मुन्निवर पीछे हटे और कहा " तुम शायद भूल गए हो कि तुम्हे हमने ही शेर बनाया है। "
"सचमुच आपने ही हमें शेर बनाया है पर अब मैं शेर हूँ और भूखा हूँ इसलिए आज मैं आपका शिकार करूँगा" चूहा कहते हुए मुन्नीवर के ऊपर से फिर से प्रहार करने आगे बढे।
मुन्नीवर ने कहा" पुनः मूषक भवः" और वँहा से चल दिए। कुछ ही पलों में शेर फिर से चूहा बन गए।
केजरीवाल का राजनितिक चरित्र और चूहा के चरित्र के बीच में काफी समानतायें है। राजनितिक परिविश में नैतिकता के मापने के लिए जो भी पैमाना (मापदंड) होते है अगर उसके आधार पर भी यदि केजरीवाल के राजनीती कार्य शैली को मापे तो शायद इतने खामियाँ से रूबरू होंगे जिसे सहज रूप से नज़रंदाज़ करना कतई आसान नहीं होगा। केजरीवाल ने वाकये राजनीती जमीं को तलाशने के लिए काफी जद्दोजहद किये और इसी जद्दोजहद के दौरान उन्होंने RTI कार्यकर्ता के रूप में खुदको साबित किया परन्तु उनके जीवन में राजनीति घुमाव का श्रीगणेश अगर हुआ तो जनलोकपाल आंदोलन के ही जरिये हुआ। हालाँकि केजरीवाल जब नौकरी पेशा छोड़कर समाज सेवा के पथ पर आगे बढे तो सिर्फ एक ही मंसूबा जहन में लेकर कि आगे चलकर इसी के माध्यम से राजनीती पतल पर अपना भविष्य को चिन्हित करना है।
जनलोकपाल आंदोलन में अन्ना के मुहीम के संग पहले खुद को शामिल करना, फिर अन्ना के सिपाह-सलाहकार के सूचि के पहले पंक्ति में अपनेको उपस्थित करना, अन्ना के अनशन के दौरान मीडिया हो अथवा सरकार के नुमायन्दे उनके साथ वार्तालाप करना और अपने एजेंडा को रखना और धीरे -धीरे करके जनलोकपाल आंदोलन को एक अहम धुर्व अन्ना के सामने खुदको दूसरा धुर्व के रूप में स्थापित करना, बहुत सी ऐसी बातें है जो केजरीवाल का पूर्वनियोजित और पूर्वनिर्धारित राजनितिक मनसूबे के तरफ ईशारा करते है।
लोकतंत्र में यदि कोई मुन्निवर होता है तो वह जनता जो लोकतंत्र में किसी भी नेता का राजनितिक भविष्य को तय करती है और अपना मत जिन भी नेता या दल के पक्ष में प्रदान करती है तो नेताओ का सभी आकांक्षाएं साकार होते है और वास्तविक में वह राजनीती के शेर व शंशाह कहलाते है उसी भांति हिन्दू धर्म में ऋषि ( मुन्नी ) भगवान के समकक्ष सम्मान दिए जाते है और उनके तप-जप के प्रभाव के अनेकोअनेक उदाहरण बुर्जगो सुने होंगे अथवा इतिहास में पढ़े होंगे कि मुन्नीयो का अत्यंत योगदान का नतीजा है कि हमें ज्ञान और बिज्ञान विरासत में मिला है और उनके ही कृपा से आज भी हमारे समाज में कई परम्परा है जो हमें अपने मर्यादा में रहने का सींख देते है और अनुशाशन में रहने के लिए प्रेरित करते है।
दरअसल में केजरीवाल को भलीभांति ज्ञात था कि लोकतंत्र में अगर जनता का दिल जीत लेते है तो वाकये में सियाशी शेर बनने से कोई नहीं रोक सकता है, इसीलिए जनलोकपाल मुहीम को एक जनांदोलन का रंग दिए उसके उपरांत बढ़-चढ़ कर लोगों को जोड़ते गए इस आंदोलन से। इसीका परिणाम है कि कांग्रेस सरकार प्रारम्भ में इस आंदोलन को भाव देने के पक्ष में नहीं थी पर दिन -ब -दिन लोगों के तादाद में भारी बढ़ोतरी के वजह से सरकार सोचने के लिए बाध्य हो गयी कि अति शीघ्र आंदोलन को रोक नहीं गया तो पूरा व्यवस्था इस कदर चरमरा जायेगा जो बाद में नियंत्र से बाहर हो जायेगा। जिस केजरीवाल को सरकार कभी सुनने को तैयार नहीं थी अचानक उनको और उनके टीम के सदस्य को जनलोकपाल स्टैंडिंग कमिटी में शामिल कर लिया जो केजरीवाल के लिए जनता का पहला आशीर्वाद माना जा सकता था, जो इन्हे चूहा से कैट (बिल्ली) बना दिया पर सरकार में बैठे लोग खुदको निर्वाचित जनता के प्रतिनिधि समझते थे और केजरीवाल टीम को बार -बार अहसास दिलाते थे कि यदि नई कानून लाना अथवा लागु करना है तो इसके लिए पहले चुनाव लड़ कर और जीत कर आना होगा। इस लिए टिपण्णी करते नहीं थकते कि केजरीवाल को यह हक़ जनता ने नहीं दिए है कि नए कानून स्वरुप तैयार करे। कांग्रेस सरकार में बैठे लोगों का बड़बोलापन था व अंहकार अपितु केजरीवाल ने जनता के समक्ष कांग्रेस सरकार इस कथन को बड़े जोर -सोर परोशा जिसे जनता सहजता से बर्दाश्त नहीं कर पाई। केजरीवाल ने बिना विलम्ब किये उसी मंच से एलान कर दिए कि अब वह राजनितिक पार्टी बनायेगे और चुनाव लड़ेंगे और उसके बाद जनलोकपाल कानून लाएंगे।
दरअसल में केजरीवाल को भलीभांति ज्ञात था कि लोकतंत्र में अगर जनता का दिल जीत लेते है तो वाकये में सियाशी शेर बनने से कोई नहीं रोक सकता है, इसीलिए जनलोकपाल मुहीम को एक जनांदोलन का रंग दिए उसके उपरांत बढ़-चढ़ कर लोगों को जोड़ते गए इस आंदोलन से। इसीका परिणाम है कि कांग्रेस सरकार प्रारम्भ में इस आंदोलन को भाव देने के पक्ष में नहीं थी पर दिन -ब -दिन लोगों के तादाद में भारी बढ़ोतरी के वजह से सरकार सोचने के लिए बाध्य हो गयी कि अति शीघ्र आंदोलन को रोक नहीं गया तो पूरा व्यवस्था इस कदर चरमरा जायेगा जो बाद में नियंत्र से बाहर हो जायेगा। जिस केजरीवाल को सरकार कभी सुनने को तैयार नहीं थी अचानक उनको और उनके टीम के सदस्य को जनलोकपाल स्टैंडिंग कमिटी में शामिल कर लिया जो केजरीवाल के लिए जनता का पहला आशीर्वाद माना जा सकता था, जो इन्हे चूहा से कैट (बिल्ली) बना दिया पर सरकार में बैठे लोग खुदको निर्वाचित जनता के प्रतिनिधि समझते थे और केजरीवाल टीम को बार -बार अहसास दिलाते थे कि यदि नई कानून लाना अथवा लागु करना है तो इसके लिए पहले चुनाव लड़ कर और जीत कर आना होगा। इस लिए टिपण्णी करते नहीं थकते कि केजरीवाल को यह हक़ जनता ने नहीं दिए है कि नए कानून स्वरुप तैयार करे। कांग्रेस सरकार में बैठे लोगों का बड़बोलापन था व अंहकार अपितु केजरीवाल ने जनता के समक्ष कांग्रेस सरकार इस कथन को बड़े जोर -सोर परोशा जिसे जनता सहजता से बर्दाश्त नहीं कर पाई। केजरीवाल ने बिना विलम्ब किये उसी मंच से एलान कर दिए कि अब वह राजनितिक पार्टी बनायेगे और चुनाव लड़ेंगे और उसके बाद जनलोकपाल कानून लाएंगे।
जनलोकपाल आंदोलन बिना मुकाम के ही अधर में रह गए। अन्ना के टीम दो खेमे में बँट गए थे, एक जो राजनीती पार्टी बनाने के पक्ष में थे जबकि दूसरा खेमा जो इनके पक्ष में हरगिज नहीं थे। केजरीवाल ने दिल्ली विधान सभा चुनाव की तैयारियाँ आरम्भ कर दिया इसीलिए बीच -बीच में कई छोटे -मोटे जनांदोलन करते रहे और मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार को मान कर लोगो से जनसम्पर्क कायम करते रहे। दिल्ली एक तबके में केजरीवाल को लेकर सुगबुहात शुरू हो गयी। वैसे भी पुरे देश में कांग्रेस के विरुद्ध मौहाल बन चूका था ज्यादातर लोग कांग्रेस के तानाशाह रवैया और भ्रष्टाचार युक्त किर्याकलाप से त्रस्त थे। दिल्ली चुनाव का घोषणा के बाद केजरीवाल ने आआपा का प्रचार -प्रशार खूब जोर से किया और लोगों से आग्रह किया कि यदि बिजली-पानी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याऍ से निजात होना है तो आआपा को वोट दें।
चुनाव परिणाम के उपरांत यह साबित हो गया कि केजरीवाल राजनीतिक शेर (बिग कैट ) बन चुके थे। इस तरह अप्रयाशित जीत से जँहा कांग्रेस पार्टी अर्श से फर्श पर पँहुच चुकी थी वंही इनके विपरीत आआपा देश के राजनीति के पृष्ठ भूमि पर सफलता के नए ईमारत बना चुके थे। केजरीवाल के लोकप्रियता के बदौलत आआपा को मिली अचानक कामयाबी जँहा कांग्रेस को दिल्ली की राजनीती से बेदखल कर गयी थी वंही भाजपा के तीन राज्य में बड़ी जीत के वाबजूद दिल्ली में पूर्ण बहुमत के आभाव में हक्के -बक्के कर गए थे।
जो केजरीवाल कभी सौगंध खाकर लोगो को यंकी दिलाये थे कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री हरगिज़ नहीं बनेगे अब शायद उस सौगंध को भूल चुके थे। कांग्रेस भी इस करारी हार को पचा नहीं पा रही थी और उन्होंने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए आआपा को बिना शर्त के समर्थन देने का घोषणा कर दिए। आआपा जो लोगो को यह अहसास दिलाते नहीं थकते थे कि सत्ता के भूखे नहीं है अचानक सत्ता करीब देखकर उनके मुंह से भी लार टपकने लगे। केजरीवाल ने सरकार बनाने के लिए तैयार हो गए और कांग्रेस के समर्थन के बल पर विधानसभा में विस्वास मत भी हाशिल कर लिए। वास्तविक में केजरीवाल को लेकर लोगों का दुविधा का शुरुआत मुख्य मंत्री बनने के तुरंत बाद हो गये क्यूंकि एक खेमा ऐसा भी थे जो कदापि नहीं चाहते थे आआपा कांग्रेस से समर्थन के बुनियाद पर सरकार बनाये। अब केजरीवाल का सोंच और प्रकृति में बदलाव होना शुरू होने लगे थे इसीका नतीजा था कि उनके ही दल में से उनके खिलाफ बग़ावत का शुर सुने जा रहे थे और लाख कौशिश के वाबजूद केजरीवाल अपने असंतोष विधायक को शांत नहीं कर पाये इसीका परिणाम था कि उनके पार्टी में राजीनीति के सूझ-बुझ रखनेवाले विनोद कुमार बिन्नी बागी बन चुके थे। केजरीवाल में ज्यादातर ऐसे विधायक थे जिनके पास अनुभव के नाम पर कुछ नहीं था नतीजन सरकार चलाने में जो अनेको प्रकार के अर्चन आते है उनका सामना करने में केजरीवाल हो व उनके टीम के अन्य नेता हो वे असफल रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्हें धरने को ही अहमियत देते नज़रआये क्यूंकि उनको लगा कि अब भी वे धरने के माध्यम से लोगों का सहानभूति हाशिल कर पाएंगे लेकिन ये भूल चुके थे कि अब वह आम आदमी का टोपी नहीं पहनने वाले आम आदमी नहीं रहे ब्लिक हालत बदल चूका है। हालाँकि वह कभी भी आम आदमी थे ही नहीं फिर भी टोपी के जरिये मैं आम आदमी हूँ प्रचार - प्रशार कर रहे थे पर इसके लिए भी वे अब मान्य नहीं रहे क्यूंकि अब वह संवैधानिक पद पर थे जबकि हमारे संविधान किसी भी प्रान्त के मुख्यमंत्री को इस तरह का धरने पर बैठने की अनुमति नहीं देते है। अन्तः देश का मीडिया हो अथवा प्रदेश के लोग इसके लिए केजरीवाल को ही कौसतें रहे और उनके सूझ-बुझ पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहे ।
मुख्यमंत्री तो बन गए थे पर राजनीतिक सूझ -बुझ के आभाव में बड़े- बड़े फैसला नहीं ले पा रहे थे जबकि उनका असल मुकाम तो आम चुनाव था जिसमें बड़ी जीत को जोह रहे थे इस लिए जनलोकपाल कानून को असंवैधानिक तरीके से दिल्ली के सदन में पास करने के फिराक में थे पर बुद्धजीवियों और उपराज्यपाल ने जब इसका विरोध किया तो मसककर रह गए वही सिर पर बजट सत्र था जिसमें बिजली और पानी के ऊपर दिए गए सब्सिडी के लिए फण्ड का एलोकेशन करना था। केजरीवाल अब यह जान चुके थे इस तरह के विषम परिस्थिति में सरकार चलाना सरल नहीं है इसलिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वास्तविक में उनके इस तरह से अन्यायस इस्तीफा से लोगों में हताश का वातावरण बना दिया था जबकि आआपा अपनी मज़बूरी दिखाकर लोगों से शाबाशी बटोरने की निरथक प्रयास कर रही थी। लोगों को अब इनके ऊपर से प्रायः विस्वास उठता ही जा रहा था।
आगमी आम चुनाव के लिए प्रचार में चोटी का जोड़ लगाने में केजरीवाल ने कोई कसर न छोड़ा, इसके चलते कभी गुजरात की गालिया तो कभी मुंबई , तो कभी उत्तर प्रदेश के हाई प्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में नुक्कड़ सभाए करने लगे। मोदी एक रणनीति के तहत वाराणस से चुनाव लड़ाने का फैसला लिया गया। जैसे मानों केजरीवाल इसी फैसला का इंतज़ार में था क्यूंकि उनके जहन में कंहीनकंही ग़लतफ़हमी ने जड़ जमा चुकी थी कि शीला दिक्षित को जिस कदर दिल्ली के विधान सभा में मात दिए, उसी तरह से मोदी के ऊपर भी भारी पड़ेंगे। अब उन्होने अपना अहम मुद्दा भ्रष्टाचार को तिलांजलि देकर नये मुद्दा को लेकर वाराणस में परिवार सहित डेरा डाल चुके थे। प्रचार और प्रशार से यदि चुनावी जंग को फ़तेह किया जाता तो केजरीवाल का विजय सुनिश्चित आलिंगन करता पर काश ऐसा हो नहीं सका इसका तातपर्य था कि लोगों का दिलो दिमाग में यथावत अब वह स्थान केजरीवाल के लिए नहीं रहा था अब केजरीवाल के नाम का परत उनके जहन से उतर चूका था, लोगों उनके ऊपर विस्वास करने में जिझकने लगे थे, लोगों के उनके कावलियत और विस्वनीयता के ऊपर संदेह होने लगेथे, बार -बार अपने बयान से पलटने और मौका परस्ती के लिए लोग अब उनको कोसने लगे थे। अन्तः इस चुनाव में लोगों ने उनके ऊपर से अपना आशीर्वाद वापस ले लिए थे नतीजन केजरीवाल अर्श से फर्श पर पंहुच गया था तकरीबन वही हालत उनके पार्टी का भी हुआ। यदि पंजाब के चार सीट को छोड़ दें तो सभी सीटों पर करारी हार ही मिली थी, अधिकतर सीटों पर जमानत जब्त हो गयी आआपा के बड़े -बड़े सूरमाओं का हवा निकल चुकी थी।
चुनाव परिणाम के उपरांत यह साबित हो गया कि केजरीवाल राजनीतिक शेर (बिग कैट ) बन चुके थे। इस तरह अप्रयाशित जीत से जँहा कांग्रेस पार्टी अर्श से फर्श पर पँहुच चुकी थी वंही इनके विपरीत आआपा देश के राजनीति के पृष्ठ भूमि पर सफलता के नए ईमारत बना चुके थे। केजरीवाल के लोकप्रियता के बदौलत आआपा को मिली अचानक कामयाबी जँहा कांग्रेस को दिल्ली की राजनीती से बेदखल कर गयी थी वंही भाजपा के तीन राज्य में बड़ी जीत के वाबजूद दिल्ली में पूर्ण बहुमत के आभाव में हक्के -बक्के कर गए थे।
जो केजरीवाल कभी सौगंध खाकर लोगो को यंकी दिलाये थे कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री हरगिज़ नहीं बनेगे अब शायद उस सौगंध को भूल चुके थे। कांग्रेस भी इस करारी हार को पचा नहीं पा रही थी और उन्होंने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए आआपा को बिना शर्त के समर्थन देने का घोषणा कर दिए। आआपा जो लोगो को यह अहसास दिलाते नहीं थकते थे कि सत्ता के भूखे नहीं है अचानक सत्ता करीब देखकर उनके मुंह से भी लार टपकने लगे। केजरीवाल ने सरकार बनाने के लिए तैयार हो गए और कांग्रेस के समर्थन के बल पर विधानसभा में विस्वास मत भी हाशिल कर लिए। वास्तविक में केजरीवाल को लेकर लोगों का दुविधा का शुरुआत मुख्य मंत्री बनने के तुरंत बाद हो गये क्यूंकि एक खेमा ऐसा भी थे जो कदापि नहीं चाहते थे आआपा कांग्रेस से समर्थन के बुनियाद पर सरकार बनाये। अब केजरीवाल का सोंच और प्रकृति में बदलाव होना शुरू होने लगे थे इसीका नतीजा था कि उनके ही दल में से उनके खिलाफ बग़ावत का शुर सुने जा रहे थे और लाख कौशिश के वाबजूद केजरीवाल अपने असंतोष विधायक को शांत नहीं कर पाये इसीका परिणाम था कि उनके पार्टी में राजीनीति के सूझ-बुझ रखनेवाले विनोद कुमार बिन्नी बागी बन चुके थे। केजरीवाल में ज्यादातर ऐसे विधायक थे जिनके पास अनुभव के नाम पर कुछ नहीं था नतीजन सरकार चलाने में जो अनेको प्रकार के अर्चन आते है उनका सामना करने में केजरीवाल हो व उनके टीम के अन्य नेता हो वे असफल रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्हें धरने को ही अहमियत देते नज़रआये क्यूंकि उनको लगा कि अब भी वे धरने के माध्यम से लोगों का सहानभूति हाशिल कर पाएंगे लेकिन ये भूल चुके थे कि अब वह आम आदमी का टोपी नहीं पहनने वाले आम आदमी नहीं रहे ब्लिक हालत बदल चूका है। हालाँकि वह कभी भी आम आदमी थे ही नहीं फिर भी टोपी के जरिये मैं आम आदमी हूँ प्रचार - प्रशार कर रहे थे पर इसके लिए भी वे अब मान्य नहीं रहे क्यूंकि अब वह संवैधानिक पद पर थे जबकि हमारे संविधान किसी भी प्रान्त के मुख्यमंत्री को इस तरह का धरने पर बैठने की अनुमति नहीं देते है। अन्तः देश का मीडिया हो अथवा प्रदेश के लोग इसके लिए केजरीवाल को ही कौसतें रहे और उनके सूझ-बुझ पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहे ।
मुख्यमंत्री तो बन गए थे पर राजनीतिक सूझ -बुझ के आभाव में बड़े- बड़े फैसला नहीं ले पा रहे थे जबकि उनका असल मुकाम तो आम चुनाव था जिसमें बड़ी जीत को जोह रहे थे इस लिए जनलोकपाल कानून को असंवैधानिक तरीके से दिल्ली के सदन में पास करने के फिराक में थे पर बुद्धजीवियों और उपराज्यपाल ने जब इसका विरोध किया तो मसककर रह गए वही सिर पर बजट सत्र था जिसमें बिजली और पानी के ऊपर दिए गए सब्सिडी के लिए फण्ड का एलोकेशन करना था। केजरीवाल अब यह जान चुके थे इस तरह के विषम परिस्थिति में सरकार चलाना सरल नहीं है इसलिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वास्तविक में उनके इस तरह से अन्यायस इस्तीफा से लोगों में हताश का वातावरण बना दिया था जबकि आआपा अपनी मज़बूरी दिखाकर लोगों से शाबाशी बटोरने की निरथक प्रयास कर रही थी। लोगों को अब इनके ऊपर से प्रायः विस्वास उठता ही जा रहा था।
आगमी आम चुनाव के लिए प्रचार में चोटी का जोड़ लगाने में केजरीवाल ने कोई कसर न छोड़ा, इसके चलते कभी गुजरात की गालिया तो कभी मुंबई , तो कभी उत्तर प्रदेश के हाई प्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में नुक्कड़ सभाए करने लगे। मोदी एक रणनीति के तहत वाराणस से चुनाव लड़ाने का फैसला लिया गया। जैसे मानों केजरीवाल इसी फैसला का इंतज़ार में था क्यूंकि उनके जहन में कंहीनकंही ग़लतफ़हमी ने जड़ जमा चुकी थी कि शीला दिक्षित को जिस कदर दिल्ली के विधान सभा में मात दिए, उसी तरह से मोदी के ऊपर भी भारी पड़ेंगे। अब उन्होने अपना अहम मुद्दा भ्रष्टाचार को तिलांजलि देकर नये मुद्दा को लेकर वाराणस में परिवार सहित डेरा डाल चुके थे। प्रचार और प्रशार से यदि चुनावी जंग को फ़तेह किया जाता तो केजरीवाल का विजय सुनिश्चित आलिंगन करता पर काश ऐसा हो नहीं सका इसका तातपर्य था कि लोगों का दिलो दिमाग में यथावत अब वह स्थान केजरीवाल के लिए नहीं रहा था अब केजरीवाल के नाम का परत उनके जहन से उतर चूका था, लोगों उनके ऊपर विस्वास करने में जिझकने लगे थे, लोगों के उनके कावलियत और विस्वनीयता के ऊपर संदेह होने लगेथे, बार -बार अपने बयान से पलटने और मौका परस्ती के लिए लोग अब उनको कोसने लगे थे। अन्तः इस चुनाव में लोगों ने उनके ऊपर से अपना आशीर्वाद वापस ले लिए थे नतीजन केजरीवाल अर्श से फर्श पर पंहुच गया था तकरीबन वही हालत उनके पार्टी का भी हुआ। यदि पंजाब के चार सीट को छोड़ दें तो सभी सीटों पर करारी हार ही मिली थी, अधिकतर सीटों पर जमानत जब्त हो गयी आआपा के बड़े -बड़े सूरमाओं का हवा निकल चुकी थी।
केजरीवाल जो खुद को प्रधानमंत्री के प्रमुख दावेदार समझ रहे थे अब उनके महत्वाकांक्षी इच्छाएँ का अंतिम संस्कार हो चूका था। जिन्हे कुछ महीने पहले राजनीती के शेर जानने लगे थे अब वह ढेर हो चुके थे अर्थात पुनः मूषक भवः के भांति ही उनके भी बुलंदी गर्त में मिल चूका था। फिलहाल इनदिनों दिल्ली में फिरसे से खुद को स्थापित करने के लिए प्रयासरत है पर जनता के बीच उनके प्रति असंतोष साफ़ देखा जा सकता है, यही कारन है कि अब वह चुनाव शीघ्र कराने के पक्ष में नहीं है क्यूंकि दिल्ली प्रदेश के चुनाव में भी दिल्ली के लोगों का आक्रोश का ही सामना करना पड़ सकता है जो निराशाजनक परिणाम का ही रुझान देता है ऐसे में केजरीवाल टीम के ज्यादातर सदस्य चाहते है कि किसी तरह केजरीवाल दिल्ली में सरकार बनाये ताकि चुनाव से बचा जाय इसीलिए परदे के पीछे से कई शीर्ष नेता कांग्रेस के सम्पर्क में है जबकि अन्य विकल्प को भी तलाशने का काम जोरो पर है। आखिकार चुनाव के पश्चात ही दिल्ली प्रदेश में आआपा का करिश्मा अब भी बरकरार है या कुछ भी नहीं बचा है सभी तरह के अनसुलझे सवालों का जवाब खुद -ब - खुद देश के सामने आ पाएंगे। फिलहाल केजरीवाल के द्वारा आनेवाले दिनों में कठोर परिश्रम करने की जरुरत है जबकि पार्टी के अन्तरकलह को सुलझाने से फुर्सत उन्हें मिले तो फिर से लोगों के दिलों में अपना खोया हुआ जगह हाशिल करने का कशिश करेंगे जो न ही आसान है और न ही अतिशीघ्र मुमकिन है ……।
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