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सोमवार, 11 अगस्त 2014

कानून नहीं व्यवस्था को दुरुस्त करो ................ !!!

तत्कालीन परिस्थिति में समाज में कोई भी त्रासदी होती है तो इसका जिम्मेवार लचर कानून को ठहराया जाता है जबकि व्यवस्था को कभी भी दुरुस्त करने को लेकर बहुत ज्यादा उत्साह न ही संसद के पतल पर और न ही इन्साफ के मंदिर में देखा जाता है। इनदिनों समाज में कई तो ऐसे है जिन्हे इन लचर कानून से जरा भी डर नहीं लगता जबकि कई ऐसे भी है जो इस लचर कानून के भेंट चढ़ जाते है। 

देश में जब भी कोई बहुत बड़ी अनहोनी अपनी आखरी अंजाम तक नहीं पहुँच जाती है और इसका दुष्प्रभाव के कारन लोगों का आक्रोश सड़को पर और उनकी आवाज़ संसद के चार दीवारों से जब तक नहीं टकराती है तब तक सरकार और उनके सिपाह -सलाहकारों के कानों में जूं  तक नहीं रेंगते है। लोगों का आक्रोश को पहले तो कुचलने का भ्रशक प्रयास करते दिखे जाते फिर भी लोगों का आक्रोश जब जनांदोलन का रूप अख्तियार करने लगता है ऐसे परिस्थिति में सरकार अपने सामने कोई अन्य विकल्प न पाकर आवाम के आगे पास्ट होकर या तो शख्त कानून बनाने का अस्वासन देते है या  कानून को संशोधित करके सदन में पारित करवाने का। न जाने सरकार ने कितने बार कई कानून में संशोधन करके काफी शख्त बनाने का प्रयन्त की हो पर गुनहगारों के अंदर खौफ पैदा करने में असफलता ही हाथ लगे इसीका परिणाम है कि समाज में पनप रहे वृकृतियों को रोकने में ना कामयाब ही रहे ...!!!
कामयाबी तो कदाचित नहीं कहा जा सकता, जिस कदर हाल में महिलाओं के विरुद्ध अपराध में बृद्धि हुई है हालाँकि बलात्कार और यौनउत्पीरण जैसे घिनोने करतूत रोकने के लिए बहुत ही शख्त कानून बनाये गए पर नतीजा बलात्कार जैसे घटनाये  में गिरावट होने के वजाय बढ़ोतरी ही देखे जा रहे है। शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिस दिन बलात्कार और महिला यौनउत्पीरण के घटनाएँ सुनने को न मिले, अर्थात इस तरह के वारदात यथावत जारी है फिर शख्त कानून बनाने से क्या फायदा? 

भ्रष्टाचार रोधक कानून हो अथवा घरेलू हिंशा जैसे संवेदनशील मसला कानून इतना शख्त कि शायद ही दोषी बरी होने का रास्ता ढूँढ पाये लेकिन इस तरह के कानून जँहा दोषियों को अन्ततः निर्दोष साबित होने से नहीं रोक पाते वही बेकसूर लोगों को हवालात के हवा खिलाने से नहीं चूकतें। आज एक तरफ अधिकाधिक  महिलाये  घरेलु हिंशा और यौनउत्पीरण का शिकार हो रही है वही ऐसे भी लोग का तादाद कम नहीं है जो बिना किसी अपराध के अथवा साज़िश के तहत इस कानून के शिकार हो रहे। 

दरअसल में इनदिनों देश को शख्त कानून का नहीं ब्लिक वव्यस्था में सुधार की जरुरत है जिसके पुलिस और न्यायपालिका को दुरुस्त किया जाना चाहिए।  न्यायपालिका के नीचले पायदान पर भ्रष्टाचार इस कदर विद्द्मान है कि लोग उनसे दूर ही खुदको रहना मुनासिब समझते है। इन्साफ के आस में न जाने बरसो एड़ी घिसवा कर जब इंसाफ का उम्मीद धीरे -धीरे करके टूटने लगती है पीड़ित अब शायद इंसाफ का गुहार भुलाकर आँशुओँ के फुहार से इतने नरम हो जाते है कि सांत्वना के लिए तो बेशक इंसाफ को स्वीकारा जा सकता पर वास्तविक में इनके अहमियत कुछ खाश रह नहीं जाते ऐसे में सरकार और सर्वोच्य न्यायपालिका प्रतिबद्ध होकर एक किसी भी मामला के लिए एक सिमित अवधि तय करे जिसके दरमियान बिना किसी विलम्ब के पीड़ित को इन्साफ मिल सके। 

चाहे कानून कितना भी शख्त क्यूँ न हो पर प्रशाशन के लचीले रवैया के कारण उन्हें सफलतापूर्वक लागु करना हरगिज़ मुमकिन नहीं है अर्थात प्रशाशनीय ढाँचा को सुधार के बिना किसी भी कानून को लागु करने के बारे में सोचना कटई उचित नहीं होगा। अगर कानून और व्यवस्था दोनों में एक साथ सुधार नहीं किया जाता तो कदापि सरकार के रुख को कभी भी सकारत्मक और अपेक्षाकृत नहीं समझा जा सकता बेशक एक से एक शख्त कानून पेश करते रहे। व्यवस्था और कानून एक दूसरे का पूरक है जो समाज में अनुशाशन बनाये रखते है। शख्त कानून होने के वाबजूद, व्यवस्था को अगर लकवा मार दिया हो तो कानून को दिशा और गति कौन देगा ?, अर्थात कानून कैसा भी हो पालन करवाने के लिए मजबूत व्यवस्था की दरकार है जो ईमानदारी और जवाबदेही के साथ अपने जिम्मेवारी का निर्वाह कर सके।

आजादी के बाद लोगों के जहन में व्यवस्था को लेकर कई बार उबाल आया और कुछ लोगों ने इनका भरपूर फायदा उठाया नतीजन इसके बदौलत सत्ता पर तो आसीन हो गए पर जब बारी आई इस व्यवस्था को दुरुस्त करने का तो ताल मटोल करके कानी काट गए आख़िरकार देश के आवाम अभी भी व्यवस्था को लेकर असंतुष्ट ही है। हालाँकि पिछले कुछ बरसों में जनता व्यवस्था को लेकर सजग है और सरकार को बीच -बीच में आगाह कर रही है की दुरुस्त करो वर्ना अंजाम अवांछित होगा इससे तो जरूर आभाष होता है कि व्यवस्था को लेकर सरकार अपनी उपेक्षाकृत इच्छाशक्ति को तिलांजलि देकर अतिशीघ्र कारगर कदम उठाएगी। क्यूंकि पुलिस रेफ़ोर्मेशन और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था जब तक नहीं होगा तब तक देश के आवाम असली लोकतान्त्रिक सुख से वंचित ही रहेंगे क्यूंकि पुलिस का व्यवहार और कार्यशैली दोनों में वदलाब की जरुरत है। सबसे अहम पुलिस को सत्ता के पुजारी के गिरफ्त से मुक्त करना और जवाबदेही के साथ ऊर्जा और स्फूर्ति की जरुरत है जबकि भ्रष्ट और कर्तव्यविमुख अधिकारीयों के लिए शख्त कानून भी अत्यंत आवश्यक है ताकि ऐसे अधिकारीयों के ऊपर नकेल कस सके।

न्यापालिका को चाहिए कि खुद ऐसे मामलों का संज्ञान ले जो समाज के संरचना को धवष्ट करने पर आमादा है।  देश में बहुत ऐसे कानून है जिसके अंदर अनगिनित खामियाँ है जिन्हे चिन्हित करके संशोधन करने का आवश्यकता है।  यदि कानून -व्यवस्था को दुरुस्त किये कोई सरकार हमें सुपर पावर बनाने का सपना दिखाते है तो मानों रात में सूरज दिखाने का बात कहना जो कभी भी सच से रूबरू नहीं होगी इसीलिए सरकार को सबसे पहले चाहिए कि व्यवस्था को दुरुस्त करे ………………!!!!