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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016




 दिल्ली की सरकार और तुगलकी फरमान 


क्या सत्ता एक नशा है जिसे कोई भी पचा नहीं पाते नतीजन जैसे ही सत्ता पर काबिज होते है फिर क्या है मनमौजी की तरह हरकतें करने शुरू कर देंते है?, तानाशाहों की भांति अपनी इच्छा और महत्वाकांक्षा दूसरे पर थोपना आरम्भ कर देतें  है, हद तो तब हो जाते है जब मिशाल पेश करने के चाह में हर एक मर्यादा को लांघ देंते है।  प्रश्न अत्यन्त ही गंभीर है क्योंकि लोकतंत्र में इस प्रश्न का समाधान जब तक नहीं ढूंढा जाता तब तक लोकतंत्र को सुरक्षित नहीं माना जा सकता है कारन स्वरुप आप झूठे वायदे और जनता को दिग्भर्मित करके चुनाव जीतन के पश्चात जनता का हित का ख्याल से ऊपर अपनी महत्वाकांक्षा को रखना लोकतंत्र के लिए विनाशकारी सोंच है जिसे यथाशीघ्र त्यागना होगा अन्यथा वे दिन दूर नहीं जब जनता के बीच हताशा और आक्रोश का ऐसा उबाल देखनो को मिलेगा जो निश्चित रूप से अलगाववादी नीतिकारों के पक्षधर होंगे।

दरअसल में दिल्ली में दो सरकार रहती है और दोनों का एजेंडा बिलकुल आपस में मेल नहीं खाते है पर इसे अस्वाभिविक नहीं कह सकते है क्यूंकि दोनों सरकार अलग -अलग पार्टी के हाथों में  और दोनों के नीती और नज़रियाँ  भिन्न हो सकते है, हालाँकि प्रश्न यह है कि दोनों के नीती और नज़रियाँ भिन्न है किन्तु इनके नीती और नज़रियाँ जो भी, पर जनता के प्रति जवाबदेही होनी चाहिए उसे कैसे भुला सकते है?, सत्ताधारी पार्टी उसमें शामिल महापुरुषों ने भ्रष्टाचार से निजात दिलाने बात कह कर सत्ता पर तो काबिज हो गए हो परन्तु सत्ता हथियाने के उपरांत जनता का हित का ख्याल का ध्यान न करके सिर्फ अपनी तुगलकी फरमान जनता पर थोपना शुरू कर दिए, क्या लोकतंत्र में इसे स्वीकार किया जा सकता है? हरगिज नहीं क्यूंकि जनता ने आपको चुना है इसीलिए क्यूंकि आपने जनता को अस्वासन दिया था कि आप जनता को सर्वोपरि समझकर ही कोई फैसला लेंगे फिर अचानक जनता को नज़रंदाज़ करके आप कोई भी फैसला कैसे ले सकते है?  अगर फैसला आप लेते है तो आप जनता के साथ विश्वासघात कर रहे है।

इनदिनों दिल्ली सरकार ने दिल्ली जनता के ऊपर न जाने कितने ऐसे कानून और सोंच थोप रही है जिससे दिल्ली के जनता काफी विस्मय है। प्रदुषण रोकने के लिए जरुरी है कि आप कठोर कदम उठाये फिरभी जनता के परेशानियों से मुंह कैसे फेर सकते है, क्यूंकि प्रदुषण रोकने के लिए कई उपाय करना आवश्यक है पर सभी विकल्प को नजरंदाज करके एक ही विकल्प को अपनाते है जो दिल्ली के जनता के परेशानी का सबब बन पड़ा है इससे यही निष्कर्ष निकला जा सकता है कि जनता वेचारे है और न चाह कर आप के सभी फैसले को स्वीकार करते है क्यूंकि फैसला का बहिष्कार करना अलगाववादी विचारधारा माना जायेगा कि सभ्य जनता तनिक भी इसका समर्थन नहीं करती है। हालाँकि दिल्ली सरकार वाकये दिल्ली में प्रदुषण के प्रति गंभीर है तो सबसे पहले दिल्ली में ८५% प्रदुषण जिन स्त्रोत से होता है उसे रोकने की जरुरत थी जिससे जनता प्रत्यक्ष रूप से परेशानी से साक्षात नहीं होते तद्पश्चात यह नियम लागु किया जा सकता है पर ऐसा नहीं करके सिर्फ जनता के ऊपर अपने विचार को लांद देना यह सिर्फ यही दर्शाता है कि लोकतंत्र में लोकशाही सिर्फ दिखावा जबकि जनता तो बस सत्ता के हुक़ुमराणो के रहमो करम पर ही रहती है। माना कि प्रदुषण के कारन जो भी दुष्प्रभाव है उससे सबसे ज्यादा जनता ही प्रभावित हो रही है लेकिन जनता को स्वच्छ पानी और स्वच्छ हवा मुहैया करवाना सरकार की कर्तव्य है यदि सरकार जनता को ये भी सुविधाये नहीं दें पा रही है तो इसका तातपर्य यह कि सरकार अपने कर्तव्य से बिमुख हो रही है। बरहाल दिल्ली की सरकार प्रत्येक मोर्चे पर विफल ही रही यही कारन है कि भ्रष्टचार युक्त दिल्ली में दिल्ली के हवा हो या व्यवस्था सब प्रदूषित हो गए है अब देखना है कि दिल्ली सरकार कितने हद तक इसे स्वच्छ कर पाएंगे परिणामस्वरूप दिल्ली के अधिकाधिक लोग स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी के आभाव में अनेको प्रकार के बीमारी से ग्रस्त है अगर स्वच्छ हवा और पानी दिल्ली को लोगों मिले इससे अन्तः दिल्ली के लोगों का ही भला होगा  ......


 





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