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सोमवार, 23 नवंबर 2015





 हम आखिर कब तक ?


जँहा पर राजनीती और सियाशी दाँव -पेंच में उलझे हुए अतीत और भविष्य है, जँहा राजनीती के सरंक्षण के बिना ना अपराध, ना व्यापार संभव वँहा पर राजनीती के कदरदानों ने सिर्फ और सिर्फ सांत्वना और झूठे वायदें के बुनियाद पर आज़ादी के बाद से यंहा के जनता का शोषण करते आ रहे हालाँकि इन्होने बेशक काम करने का तरीका व स्वरुप में बदलाब अनेको बार किये परन्तु इनके मकसद कल, आज और कल एक ही रहने वाला है।  चाहे जय प्रकाश नारायण को वह जन आंदोलन व  इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ आंदोलन, फिलहाल के अनेको आंदोलन।जय प्रकाश नारायण  के जनांदोलन के बाद भी भ्रष्टाचार देश को खोखला  क्या नहीं करते रहे?  इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के नारे बाद पुनः सत्ता पर तो काबिज़ हो गए पर देश से गरीबी हटा पाये नहीं बिलकुल नहीं क्यूंकि लक्ष्य यह नहीं था कि गरीबी हटाना वस्तुतः ऐसे नारे के सहारे सत्ता पाना ही उद्देश्य रहा है।

आज की परिदृश्य में जन लोकपाल जनांदोलन जिनके माध्यम से भ्रष्टाचार को हटाना था पर अवसर मिलते ही सत्ता हथिया लिए और मुलभुत एजेंडा को तिलांजलि देकर सत्ता का आन्दन ले रहे है।  इस तरह के सैकड़ो उदहारण है जिसके आधार पर यह शुनिश्चित किया जा सकता है कि इस लोक तंत्र में सत्ता तक पहुँचने के लिए नेताजी क्या- क्या नहीं करते जैसे ही सत्ता पर आसीन हो जाते कभी पीछे मुड़ कर देखने की जरुरत नहीं समझते इसी को तो लोकतंत्र कहते है जो जनता के द्वारा जनता के बीच में से जनप्रतिनिधियों को सत्ता का कमान सौपें जाते है और बदले में जनप्रतिनिधियों का उपेक्षा का शिकार हो कर प्रत्येक दिन उन्हें कोसते रहते है, इसी जद्दोजहद में पांच साल बीत जाते है अचानक वही जनप्रतिनिधियों आपके सामने प्रकट होते है एक नए एजेंडा  के साथ एक नए अवतार में फलस्वरूप जनता सब भूल कर फिर से उन्हें जीता देतें है।  इस प्रकार के लोक तंत्र से बढियां तो हमारे यंहा को राज तंत्र थे यद्दीप उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार सिर्फ राजा के पास थे लेकिन राजधर्म का पूणतः  निर्वाह करते हुए सदैव योग्य व्यक्ति के हाथ में देश कमान देंते रहे फिर भी कई बार चूक हुए परन्तु  आज से तो बेहतर ही कहा जा सकता है।

दरअसल में इसके लिए जनप्रतिनिधि ही केवल दोषी नहीं है ब्लिक हमलोग और हमारे व्यवस्था कम दोषी नहीं है। कुछ जनप्रतिनिधियों ने अपने हित के खातिर आरक्षण का  दीमक ला कर छोड़ दिए है जो दिन ब दिन  हमारे बुनियाद को कमजोर करने में लगे है जिसके आढ़ में सियाशी पुलाउ खूब पका रहे है और खा रहे परन्तु राष्ट के नींव को इस कदर खोखला कर रहे है कि भविष्य में एक बड़ी त्रासदी से रूबरू होना निश्चित है।  क्या ऐसे लीडर जो खुद ही कई भ्रष्टाचार के मामले में संलिप्त है क्या उनसे पारदर्शी और साफ सुथरी सरकार की उम्मीद की जा सकती है, कतई  नहीं।  जिस तरह अमेरिका की चुनाव प्रणाली है उसके मुताबिक हमारे यंहा भी चुनाव प्रणाली बनायीं जा सकती है फिर क्यों ना संविधान में संशोधन करके जनता के प्रति ज्यादा से ज्यादा जवाबदेह जनप्रतिनिधियों का चुनाव को तज्जुब दी जाती है प्रत्येक जनप्रतिनिधि के लिए एक मापदण्ड निर्धारित की जानी चाहिए ताकि कभी भी और कंही भी अपने व्यक्तिगत हित खातिर अपने पद का दुरुप्योग न कर पाये।

देश आज भी आज़ादी के ६५ बर्ष बाद पूर्णतः आजाद नहीं हो पाये इसका मुख्य कारण है कि हमारे यंहा जन प्रतिनिधि को सिर्फ जनता को मुर्ख बना कर सत्ता हाशिल करने का स्पर्धा में लगे रहना,  काश इसीलिए चुटकी भर जनप्रतिनिधियों को छोड़ दें तो बाकियों में देश के प्रति समपर्ण कभी भी नहीं देखा गया नतीजा आज हमारे सामने है कि हमारे देश संप्रभुता स्वालम्बी होने वाबजूद वह उपलब्धि नहीं हाशिल कर पाई जो कई अन्य देश ने हाशिल कर पाये। चीन को ही देखिये आज कहाँ है यद्दीप इन दिनों बुरे दौर से गुजर रहे है फिर भी हमसे २० साल आगे है।  जिस देश केजनप्रतिनिधियों  में से ज्यादात्तरजनप्रतिनिधि भ्रष्टचार और अनिमियता के मामलों में दोषी ठहराए जा चुके है व इसके सन्दर्भ में उनके खिलाफ मामले की सुनवाई चल रही उन्ही के हाथो में हमारी तकदीर और तस्वीर है ऐसे लोगों से सकारात्मक प्रतिक्रिया उम्मीद करना हरगिज़ मुनासिब नहीं है।  जिन्होंने अपने हिट के लिए क्या-क्या नहीं किया , पहले तो अमीरी और गरीबी की दीवार खींच दिए फिर भी बात नहीं बनी तो जात -पात के आधार पर बाँटने लगे  परिणामस्वरूप हम तो बँट गए, कमजोर हो गए पर इनसे फायदा किसको मिला हमारे जनप्रतिनिधि को जो हमें कई भाग में बाँट कर खुदको इतना मजबूत कर लिए शायद उन्हें रोकना अब  संभव नहीं है।
वास्तविक में आज के परिस्थिति में जनता को जितना मिल जाता उसी में खुश रहने की कोशिश करती है जबकि जनता के हाथ में सिर्फ लोली पॉप थमाने का काम करते है जिनसे हक़ीक़त में कुछ होना ही नहीं है।  हाल में दिल्ली सरकार ने पानी और बिजली के बिल में रियायत दी बदले में ईंधन के मूल्य में विक्रेता कर तहत भारी बढ़ोत्तरी कर दिए नतीजा एक तरफ से थोड़ा बहुत मिला  दूसरे तरफ अत्यधिक ले लिया  गया मसलन किसी भी हाल में जनता का जेब ढीली करी जाएगी ।  इस तरह के परिदृश्य में जनता, जनप्रतिनिधि से कुछ अपेक्षा अथवा आंकक्षा रखना ही जायज़ कभी भी नहीं माना जा सकता। लोगो को भी चाहिए कि अपनी समझदारी दिखाए किसी भी प्रतिनिधि को चुनने से पहले जाँचे -परखे फिर उनके दावेदारी के ऊपर मुहर लगाये अन्यथा बिना समझदारी के कर्मनिष्ठ और तटस्थ प्रतिनिधि  का कल्पना करना कदाचित उचित नहीं है।

अँधा गाँव में कान्हा राजा अर्थात जब जनता खुद अँधा हो जायेंगे तो कान्हा जो थोड़ा बहुत देखते है वही आपके ऊपर राज्य करेंगे व आपके जनप्रतिनिधि कहलाएँगे इसीलिए आप अँधा होने के बजाय अपने आँख खोलिए और अपने बीच से ऐसे जनप्रतिनिधि को आगे कीजिये  जिनमे वाकये आपके प्रनिधित्व करने की काबलियत हो जबकि उनकी ईमानदारी का मापदंड सर्वोपरि हो। जिस कदर एक सरे आम पूरी टोकड़ी के आम को सराने का काम करता है उसी प्रकार एक बईमान जनप्रतिनिधि पुरे व्यवस्था को भ्रष्ट करने के लिए काफी है। जब तक प्रदूषित व्यक्ति को हम चुनकर भेजते रहेंगे तब तक स्वच्छ वातावरण व व्यवस्था का उम्मीद करना अशोभनीय  होगी।  सही मायने लोकतंत्र का दबदबा तब कायम होगें जब लोकशाही की बरियता दी जाएगी इसके लिए हम सभी को आगे आकर अपना अधिकार जताना होगा अन्यथा हम आँख मूंदकर बैठे रहेंगे और ये मुट्ठी  भर लोग हमारे अधिकार का मर्दन करके हमारी असमत के साथ खेलते रहेंगे।  जरा सोचिये मुट्ठी भर ही अंग्रेज थे जिन्होने हमें बर्षो तक गुलामी की बेरियों में जकड़े रखा और आज मुट्ठी भर हमारे बीच का ही लोग  है जो हमें विकाशशील से विकशित नहीं हो देना चाहते है इसके पीछे उनका मनसा सिर्फ एक है कि कही हम जागरूक न हो जाये जिससे उनके मनमानी रोक रुक जाएगी। जरा सोचिये फिर आत्मचिंतन कीजिये …………………… !!


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