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शुक्रवार, 20 जून 2014

पुनः मूषक भवः (केजरीवाल चरित्रमानस्  )


बेशक राजनीती के पृष्ठभूमि पर एक नए अध्याय का शुरुआत माना जा रहा था, सभी ने ये मान लिया था कि अब पारंपरिक राजनीती से हत कर आम आदमी के उम्मींद को पुरे करने के लिए ' मैं हूँ आम आदमी' का नारा लेकर हमारे बीच जो आये है वह प्रदूषित राजनितिक परिवेश को अन्तकरण  से शुद्धि करेंगे इसलिए लोगों ने उनके तमाम बातों पर यंकी करके अपने मत के जरिये अभय वरदान दिए ताकि किये गए वादों को पुरे करे।  हालाँकि  लोगों को तो यह पता था कि राजनीती दूषित हो गयी जिसे शुद्धिकरण की जरुरत है पर यह भूल गए कि राजनीती एक ऐसा परिवेश है जिसमें कोई भी जाकर लोगों के उम्मीद को पूरा करने के वजाय  खुदको  ज्यादा तहजीब देते है और अतीत में किये गए सब वादों को भूलकर अपने भविष्य को सवारने के लिए हर एक  हथकण्डे अपनाने लगते है जो लोगों के सोंच से परे होते है। जो अतीत में सुचिता और नैतिकता का पाठ पढ़ाते है जब राजनीती के मौहाल में पँहुचते है तो सबको बिसाड़ कर सत्ता के लार में फिसलकर संवेदना और विनर्मता को पीछे छोड़ देते है अन्तः उनके मस्तिक में सिर्फ एक ही चीज रह जाती है कि किसी तरह कैसे सत्ता उनके अधीन हो ? उदाहरणस्वरूप यदि किसी चूहा को शेर बना दिया जाय तो वह अपने अतीत को भुलाकर सिर्फ शिकार के बारे में सोचना शुरू कर देते है अचानक उनके सामने वह व्यक्ति भी आ जाय जो उन्हें चूहा से शेर बनाया था उन्हे भी नहीं छोड़ेंगा , जैसा कि निम्नलिखित कहानी में उल्लेख  किया गया है :-


एक जंगल में एक चूहा रहता था।  एक रोज उनका सामना एक बिल्ली से हुआ, जैसे ही बिल्ली उनके ऊपर प्रहार करने के लिए दौड़े फौरन चूहा वहाँ से भागे और भाग कर तपस्या में लीन मुन्नीवर के समीप पँहुच कर  उनसे विनती करने लगे। मुन्नीवर को उनके ऊपर तरस आ गया मुन्नी ने पूछा" क्या है तुम्हारे दुःख का कारण?"

चूहा ने रोते हुए कहा" मुन्नीवर, मै अपनी जान  बिल्ली से किसी तरह बचाकर आपके पास आया हूँ अर्थात आपसे विनती है कि हमें बिल्ली बना दे ताकि मैं बिल्ली के भय से मुक्त होकर जंगल में रह सँकु।

मुन्नीवर उनके विलाप से द्रवित होकर कहा " यथास्तुः।." 

चूहा मुन्निवर से वरदान प्राप्त करके जंगल को लोट आये और रहने लगे। कुछ समय के पश्चात उनका सामना शेर से हुआ पहले तो उनको  लगा कि वह डटकर उनका मुकावला कर सकते है पर शेर के हमला से लहूलुहान हो कर फिरसे मुन्निवर के आश्रम में जा पंहुचे।  मुन्निवर को अपनी आपबीती सुनाई और उनके चरणो में पड़ कर गिरगिराने लगा।  मुन्निवर का दिल उनके करुणामय विनती से सुनकर पसीज गया मुन्निवर ने उनको फिरसे यथास्तु के साथ उनको शेर बना दिए। 

कई बर्षो के उपरांत मुन्निवर उसी जंगल से गुजर रहे थे जँहा चूहा से बने शेर रहा करता था। अचानक मुन्नी के नज़र आगे खड़े शेर पर पड़े। मुन्निवर निर्भीक होकर चलते रहे क्यूंकि वह जानते थे कि वही चूहा है जिसे उन्होंने ही शेर बनाया था। परन्तु शेर ने दहाड़ कर मुन्निवर के ऊपर आक्रमण किया, झट से मुन्निवर पीछे हटे और कहा " तुम शायद भूल गए हो कि तुम्हे हमने ही शेर बनाया है। "

"सचमुच आपने ही हमें शेर बनाया है पर अब मैं शेर हूँ और भूखा हूँ इसलिए आज मैं आपका शिकार करूँगा" चूहा कहते हुए मुन्नीवर के ऊपर से फिर से प्रहार करने आगे बढे। 

मुन्नीवर ने कहा" पुनः मूषक भवः" और वँहा से चल दिए।  कुछ ही पलों में शेर फिर से चूहा बन गए।


केजरीवाल का राजनितिक चरित्र और चूहा के चरित्र  के बीच में काफी समानतायें है। राजनितिक परिविश में नैतिकता के मापने के लिए जो भी पैमाना (मापदंड) होते है अगर उसके आधार पर भी यदि केजरीवाल के राजनीती कार्य शैली को मापे तो शायद इतने खामियाँ से रूबरू होंगे जिसे सहज रूप से नज़रंदाज़ करना कतई आसान नहीं होगा। केजरीवाल ने वाकये राजनीती जमीं को तलाशने के लिए काफी जद्दोजहद किये और इसी जद्दोजहद के दौरान उन्होंने RTI कार्यकर्ता के रूप में खुदको साबित किया परन्तु उनके जीवन में राजनीति घुमाव का श्रीगणेश अगर हुआ तो जनलोकपाल आंदोलन के ही जरिये हुआ। हालाँकि केजरीवाल जब नौकरी पेशा छोड़कर समाज सेवा के पथ पर आगे बढे तो सिर्फ एक ही मंसूबा जहन  में लेकर कि आगे चलकर इसी के माध्यम से राजनीती पतल पर अपना भविष्य को चिन्हित करना है। 

जनलोकपाल आंदोलन में अन्ना के मुहीम के संग पहले खुद को शामिल करना, फिर अन्ना के सिपाह-सलाहकार के सूचि के पहले पंक्ति में अपनेको उपस्थित करना, अन्ना के अनशन के दौरान मीडिया हो अथवा सरकार के नुमायन्दे उनके साथ वार्तालाप करना और अपने एजेंडा को रखना और धीरे -धीरे करके जनलोकपाल आंदोलन को एक अहम धुर्व अन्ना के सामने खुदको दूसरा धुर्व के रूप में स्थापित करना, बहुत सी ऐसी बातें है जो केजरीवाल का पूर्वनियोजित और पूर्वनिर्धारित राजनितिक मनसूबे के तरफ ईशारा करते है। 

लोकतंत्र में यदि कोई मुन्निवर होता है तो वह जनता जो लोकतंत्र में किसी भी नेता का राजनितिक भविष्य को तय करती है और अपना मत जिन भी नेता या दल के पक्ष में प्रदान करती है तो नेताओ का सभी आकांक्षाएं साकार होते है और वास्तविक में वह राजनीती के शेर व शंशाह कहलाते है उसी भांति हिन्दू धर्म में ऋषि ( मुन्नी ) भगवान के समकक्ष सम्मान दिए जाते है और उनके तप-जप के प्रभाव के अनेकोअनेक उदाहरण बुर्जगो सुने होंगे अथवा इतिहास में पढ़े होंगे कि मुन्नीयो का अत्यंत योगदान का नतीजा है कि हमें ज्ञान और बिज्ञान विरासत में मिला है और उनके ही कृपा से आज भी हमारे समाज में कई परम्परा है जो हमें अपने मर्यादा में रहने का सींख देते है और अनुशाशन में रहने के लिए प्रेरित करते है।

 दरअसल में केजरीवाल को भलीभांति ज्ञात था कि लोकतंत्र में अगर जनता का दिल जीत लेते है तो वाकये में सियाशी शेर बनने से कोई नहीं रोक सकता है, इसीलिए जनलोकपाल मुहीम को एक जनांदोलन का रंग दिए उसके उपरांत बढ़-चढ़ कर लोगों को जोड़ते गए इस आंदोलन से। इसीका परिणाम है कि कांग्रेस सरकार प्रारम्भ में इस आंदोलन को भाव देने के पक्ष में नहीं थी पर दिन -ब -दिन लोगों के तादाद में भारी बढ़ोतरी के वजह से सरकार सोचने के लिए बाध्य हो गयी कि अति शीघ्र आंदोलन को रोक नहीं गया तो पूरा व्यवस्था इस कदर चरमरा जायेगा जो बाद में नियंत्र से बाहर हो जायेगा। जिस केजरीवाल को सरकार कभी सुनने को तैयार नहीं थी अचानक उनको और उनके टीम के सदस्य को जनलोकपाल स्टैंडिंग कमिटी में शामिल कर लिया जो केजरीवाल के लिए जनता का पहला आशीर्वाद माना जा सकता था, जो इन्हे चूहा से कैट (बिल्ली) बना दिया पर सरकार में बैठे लोग खुदको निर्वाचित जनता के प्रतिनिधि समझते थे और केजरीवाल टीम को बार -बार अहसास दिलाते थे कि यदि नई कानून लाना अथवा लागु करना है तो इसके लिए पहले चुनाव लड़ कर और जीत कर आना होगा। इस लिए टिपण्णी करते नहीं थकते कि  केजरीवाल को यह हक़ जनता ने नहीं दिए है कि नए कानून स्वरुप तैयार करे। कांग्रेस सरकार में बैठे लोगों का बड़बोलापन था व अंहकार अपितु केजरीवाल ने जनता के समक्ष कांग्रेस सरकार इस कथन को बड़े जोर -सोर परोशा जिसे जनता सहजता से बर्दाश्त नहीं कर पाई। केजरीवाल ने बिना विलम्ब किये उसी मंच से एलान कर दिए कि अब वह राजनितिक पार्टी बनायेगे और चुनाव लड़ेंगे और उसके बाद जनलोकपाल कानून लाएंगे। 

जनलोकपाल आंदोलन बिना मुकाम के ही अधर में रह गए। अन्ना के टीम दो खेमे में बँट गए थे, एक जो राजनीती पार्टी बनाने के पक्ष में थे जबकि दूसरा खेमा जो इनके पक्ष में हरगिज नहीं थे। केजरीवाल ने दिल्ली विधान सभा चुनाव की तैयारियाँ आरम्भ कर दिया इसीलिए बीच -बीच में कई छोटे -मोटे जनांदोलन करते रहे और मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार को मान कर लोगो से जनसम्पर्क कायम करते रहे। दिल्ली एक तबके में केजरीवाल को लेकर सुगबुहात शुरू हो गयी। वैसे भी पुरे देश में कांग्रेस के विरुद्ध मौहाल बन चूका था ज्यादातर लोग कांग्रेस के तानाशाह रवैया और भ्रष्टाचार युक्त किर्याकलाप से त्रस्त थे। दिल्ली चुनाव का घोषणा के बाद केजरीवाल ने आआपा का प्रचार -प्रशार खूब जोर से किया और लोगों से आग्रह किया कि यदि बिजली-पानी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याऍ से निजात होना है तो आआपा को वोट दें।

चुनाव परिणाम के उपरांत यह साबित हो गया कि केजरीवाल राजनीतिक शेर (बिग कैट ) बन चुके थे। इस तरह अप्रयाशित जीत से जँहा कांग्रेस पार्टी अर्श से फर्श पर पँहुच चुकी थी वंही इनके विपरीत आआपा देश के राजनीति के पृष्ठ भूमि पर सफलता के नए ईमारत बना चुके थे। केजरीवाल के लोकप्रियता के बदौलत आआपा को मिली अचानक कामयाबी जँहा कांग्रेस को दिल्ली की राजनीती से बेदखल कर गयी थी वंही भाजपा के तीन राज्य में बड़ी जीत के वाबजूद दिल्ली में पूर्ण बहुमत के आभाव में हक्के -बक्के कर गए थे।

जो केजरीवाल कभी सौगंध खाकर लोगो को यंकी दिलाये थे कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री हरगिज़ नहीं बनेगे अब शायद उस सौगंध को भूल चुके थे। कांग्रेस भी इस करारी हार को पचा नहीं पा रही थी और उन्होंने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए आआपा को बिना शर्त के समर्थन देने का घोषणा कर दिए। आआपा जो लोगो को यह अहसास दिलाते नहीं थकते थे कि सत्ता के भूखे नहीं है अचानक सत्ता करीब देखकर उनके मुंह से भी लार टपकने लगे।  केजरीवाल ने सरकार बनाने के लिए तैयार हो गए और कांग्रेस के समर्थन के बल पर विधानसभा में विस्वास मत भी हाशिल कर लिए। वास्तविक में केजरीवाल को लेकर लोगों का दुविधा का  शुरुआत मुख्य मंत्री बनने के तुरंत बाद हो गये क्यूंकि एक खेमा ऐसा भी थे जो कदापि नहीं चाहते थे आआपा कांग्रेस से समर्थन के बुनियाद पर सरकार बनाये। अब केजरीवाल का सोंच और प्रकृति में बदलाव होना शुरू होने लगे थे इसीका नतीजा था कि उनके ही दल में से उनके खिलाफ बग़ावत का शुर सुने जा रहे थे और लाख कौशिश के वाबजूद केजरीवाल अपने असंतोष  विधायक  को शांत नहीं कर पाये इसीका परिणाम था कि उनके पार्टी में राजीनीति के सूझ-बुझ रखनेवाले विनोद कुमार बिन्नी बागी बन चुके थे।  केजरीवाल में ज्यादातर ऐसे विधायक थे जिनके पास अनुभव के नाम पर कुछ नहीं था नतीजन सरकार चलाने में जो अनेको प्रकार के अर्चन आते है उनका सामना करने में केजरीवाल हो व उनके टीम के अन्य नेता हो वे असफल रहे।  मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्हें धरने को ही अहमियत देते नज़रआये क्यूंकि उनको लगा कि अब भी वे धरने के माध्यम से लोगों का सहानभूति हाशिल कर पाएंगे लेकिन ये भूल चुके थे कि अब वह आम आदमी का टोपी नहीं पहनने वाले  आम आदमी नहीं रहे ब्लिक हालत बदल चूका है। हालाँकि वह कभी भी आम आदमी थे ही नहीं  फिर भी टोपी के जरिये मैं आम आदमी हूँ प्रचार - प्रशार कर रहे थे पर इसके लिए भी वे अब मान्य नहीं रहे क्यूंकि अब वह संवैधानिक पद पर थे जबकि  हमारे संविधान किसी भी प्रान्त के मुख्यमंत्री को इस तरह का धरने पर बैठने की अनुमति नहीं देते है। अन्तः देश का मीडिया हो अथवा प्रदेश के लोग इसके लिए केजरीवाल को ही कौसतें रहे और उनके सूझ-बुझ पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहे ।


मुख्यमंत्री तो बन गए थे पर राजनीतिक सूझ -बुझ के आभाव में बड़े- बड़े फैसला नहीं ले पा रहे थे जबकि उनका असल मुकाम तो आम चुनाव था जिसमें बड़ी जीत को जोह रहे थे इस लिए जनलोकपाल कानून को असंवैधानिक तरीके से दिल्ली के सदन में पास करने के फिराक में थे पर बुद्धजीवियों और उपराज्यपाल ने जब इसका विरोध किया तो मसककर रह गए वही सिर पर बजट सत्र था जिसमें बिजली और पानी के ऊपर दिए गए सब्सिडी के लिए फण्ड का एलोकेशन करना था। केजरीवाल अब यह जान चुके थे इस तरह के विषम परिस्थिति में सरकार चलाना सरल नहीं है इसलिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वास्तविक में उनके इस तरह से अन्यायस इस्तीफा से  लोगों में हताश का वातावरण बना दिया था जबकि आआपा अपनी मज़बूरी दिखाकर लोगों से शाबाशी बटोरने की निरथक प्रयास कर रही थी। लोगों को अब इनके ऊपर से प्रायः विस्वास उठता ही जा रहा था। 

आगमी आम चुनाव  के लिए प्रचार  में चोटी का जोड़ लगाने में केजरीवाल ने कोई कसर न छोड़ा,  इसके चलते कभी गुजरात की गालिया तो कभी मुंबई , तो कभी उत्तर प्रदेश के हाई प्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्र  अमेठी में नुक्कड़ सभाए करने लगे। मोदी एक रणनीति के तहत वाराणस से चुनाव लड़ाने का फैसला लिया गया। जैसे मानों केजरीवाल इसी फैसला का इंतज़ार में था क्यूंकि उनके जहन में कंहीनकंही ग़लतफ़हमी ने जड़ जमा चुकी थी कि शीला दिक्षित को जिस कदर दिल्ली के विधान सभा में मात दिए, उसी तरह से मोदी के ऊपर भी भारी पड़ेंगे। अब उन्होने अपना अहम मुद्दा भ्रष्टाचार को तिलांजलि देकर नये मुद्दा को लेकर वाराणस में  परिवार सहित डेरा डाल चुके थे। प्रचार और प्रशार से यदि चुनावी जंग को फ़तेह किया जाता तो केजरीवाल का विजय सुनिश्चित आलिंगन करता पर काश ऐसा हो नहीं  सका इसका तातपर्य था कि लोगों का दिलो दिमाग में यथावत अब वह स्थान केजरीवाल के लिए नहीं रहा था अब केजरीवाल के नाम का परत उनके जहन से उतर चूका था, लोगों उनके ऊपर विस्वास करने में जिझकने लगे थे, लोगों के उनके कावलियत और विस्वनीयता के ऊपर संदेह होने लगेथे, बार -बार अपने बयान से पलटने और मौका परस्ती के लिए लोग अब उनको कोसने लगे थे। अन्तः इस चुनाव में लोगों ने उनके ऊपर से अपना आशीर्वाद वापस ले लिए थे नतीजन केजरीवाल अर्श से फर्श पर पंहुच गया था तकरीबन वही हालत उनके पार्टी का भी हुआ। यदि पंजाब के चार सीट को छोड़ दें तो सभी सीटों पर करारी हार ही मिली थी, अधिकतर सीटों पर जमानत जब्त हो गयी आआपा के बड़े -बड़े सूरमाओं का हवा निकल चुकी थी।


 केजरीवाल जो खुद को प्रधानमंत्री के प्रमुख दावेदार समझ रहे थे अब उनके महत्वाकांक्षी इच्छाएँ का अंतिम संस्कार हो चूका था। जिन्हे  कुछ महीने पहले राजनीती के शेर जानने लगे थे अब वह ढेर हो चुके थे अर्थात पुनः मूषक भवः के भांति ही उनके भी बुलंदी गर्त में मिल चूका था। फिलहाल इनदिनों दिल्ली में फिरसे से खुद को स्थापित करने के लिए प्रयासरत है पर जनता के बीच उनके प्रति असंतोष साफ़ देखा जा सकता है, यही कारन है कि अब वह चुनाव शीघ्र कराने के पक्ष में नहीं है क्यूंकि दिल्ली प्रदेश के चुनाव में भी दिल्ली के लोगों का आक्रोश का ही सामना करना पड़ सकता है जो निराशाजनक परिणाम का ही रुझान देता है ऐसे में केजरीवाल टीम के ज्यादातर सदस्य चाहते है कि किसी तरह केजरीवाल दिल्ली में सरकार बनाये ताकि चुनाव से बचा जाय इसीलिए परदे के पीछे से कई शीर्ष नेता कांग्रेस के सम्पर्क में है जबकि अन्य विकल्प को भी तलाशने का काम जोरो पर है। आखिकार चुनाव के पश्चात ही दिल्ली प्रदेश में आआपा का करिश्मा अब भी बरकरार है या कुछ भी नहीं बचा है सभी तरह के अनसुलझे सवालों का जवाब खुद -ब - खुद  देश के सामने आ पाएंगे। फिलहाल केजरीवाल के द्वारा आनेवाले दिनों में कठोर परिश्रम करने की जरुरत है जबकि पार्टी के अन्तरकलह को सुलझाने से फुर्सत उन्हें मिले  तो फिर से लोगों के दिलों में अपना खोया हुआ जगह हाशिल करने का कशिश करेंगे जो न ही आसान है और न ही अतिशीघ्र मुमकिन है ……। 

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