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गुरुवार, 13 नवंबर 2014


 अच्छे दिन ऐसे ही आएंगे ( भाग -१ ) ?

 
मोदी के द्वारा सभी प्रकार के उठाये गए कदम अत्यंत ही सहरानीय है परन्तु इसका परिणाम आना अभी शेष है।  लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या इस तरह का बातें करने से समस्या का समाधान हो जायेंगे क्यूंकि उनके ही इर्द -गिर्द ही ऐसे लोगो की कमी नहीं है जो बेशक प्रत्यक्ष रूप से तो विरोध करने से तो बच रहे है परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उनके सपने को साकार होने में बाधक का भूमिका निभा रहे है, इस तरह के परिस्थिति में मोदी का वह सपना जो भारत और भारत के लोगो के लिए देखें है व देख रहे है वह हरगिज़ पुरे नहीं होंगे क्यूंकि प्रबल इच्छाशक्ति के वाबजूद तत्परता अनिवार्य है अन्यथा आपके इच्छा शक्ति अद्भुत काम करने से वंचित रह जाते है और अंत में  उसका परिणाम असंतोष जनक ही रहता है ?

हालाँकि मोदी अपने आस -पास के परिदृश्य से भलीभांति वाकिफ़ है इसीलिए तो उन्होंने कुछ ऐसे शख्श  का चयन करके अपने मिशन से जोड़ रहे  है जिनका व्यक्तित्व फिलहाल परेणास्रोत एंव बेदाग रहे है। यदि मुझ जैसे लोग से पूछे कि हमारे प्रधानमंत्री को क्या करना चाहिए तो जवाब एक ही होगा कि आपको कुछ करने की जरुरत नहीं ब्लिक आप अपने अनुरूप कुछ ऐसे लोगो को सामने लाये  अथवा बनाये जो वाक़ये देश के प्रगति और समृद्धि के लिए प्रतिबद्ध हो क्यूंकि रचनात्मक सोच को हकीकत का जामा पहनना न ही सुगम और न ही असंभव है परन्तु इसके लिए हठ और समर्पण दोनों का अत्यधिक जरुरत होता है फिर भी इतना आसान नहीं होगा यदि आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में बहुतों  का सहयोग न मिलें।

प्रधानमंत्री जन धन योजना हो अथवा स्वच्छ भारत अभियान बहुत ही सार्थक और स्वार्थ विहीन प्रयास है लेकिन इसको पूरा करने के लिए एक बहुत बड़ा जनसमूह को एक साथ आना होगा जो अपने कर्तव्य को पूरी सिद्दत से निर्वाह करें अन्यथा इनका प्रचार प्रसार बेशक़ जितना करलें पर जमीनी हकीकत इससे परे होंगे।

दरअसल  में जिस देश का प्रधानमंत्री सीधे लोंगो के साथ जोड़ कर अपने विचार का आदान प्रदान करने में रूचि ले रहा हो उसी देश के बाबुओं जनता से मुखातिर होने में गलानी समझते है ऐसे में आज तक बापू और नहेरु का सपना तो अधूरे हुए पड़े है फिर मोदी का सपने कैसे पुरे होंगे? जिस देश में भ्रष्टाचार लोगो दिनचर्या बन चूका है,  जिसे नक्कार नहीं सकते ऐसे में उनसे किसी भी जवाब देहि और ईमानदारी का अपेक्षा करना सरासर बेईमानी मानी जाएगी।  हमारे देश के प्रधानमंत्री चाहे जितना जोर लगा ले पर लालफीताशाही तस से मस नहीं हो रहे है क्यूंकि उन्ही के ऑफिस में बैठे ऐसे भी बाबुओं है जो इस मुहीम में उनका संग कदापि नहीं देंगे इसीलिए इन्वेस्ट मौहाल को लेक, भारत को सौ तक सूचिआंक में जगह नहीं दिए गए, वावजूद हमारे प्रधान मंत्री अपने  कोशिश में कँही भी कोताही नहीं दिखाए। फिलहाल विश्व के समक्ष आज भी जिस तरह से हमें देखे जा रहे है उसके लिए सरकार, प्रशाशन और न्यायपालिका  तीनो ही बराबर के जिम्मेवार है। न्यायलय को क्या कहना, उसमें भी निचली अदालत में सिर्फ लोगो को तारिक ही मिलते है। उदहारणस्वरुप   ललित नारायण मिश्र का हत्या आज से चालीस पूर्व हुए थे उस मुकदमा का फैसला अब आया है वह भी निचले न्यायलय में जबकि अभी अनेको विकल्प मोहजूद है जँहा पुनः गुहार करने का गुंजाईश है।  ऐसे में कैसे सुनिश्चित होगा  कि असली दोषी को सजा मिलेगा ?, शायद कोई भी नहीं क्यूंकि व्यक्ति के औसतन आयु  ७५-८० साल होता है ऐसे में अगर कोई भी अपराधी गुनाह १५- २० साल के दौरान करते है जबकि चालीस में निचली अदालत से आरोप सिद्ध होता है उसके पश्चात ऊँच न्यायलय है तत्पश्चात सर्वोच्य न्यायलय इन दोनों न्यायालय से फैसला आने में तकरीबन १० साल तो चाहिए। इसी अवधि में आरोपी स्वर्ग सिधार जाते है  और मुकदमा बर्खाश्त हो जाता है  जबकि ललित नारायण मिश्र का  मामला काफी ही हाइ प्रोफाइल था …  ऐसे में आम आदमी को तो इनसे भी ज्यादा समय लगेगा क्यूंकि न्यायलय में मामला श्रेणी चिन्हित करके ही सुनवाई की जाती है या फैसला सुनाये जाते है। अन्तोगत्वा न्यायलय के प्रति आस्था और श्रद्धा रखना बहुत ही कठिन कार्य है।
वास्तव में सबसे पहले न्यायलय को सुधारने की जरुरत है हालाँकि न्यायलय सुधारक विधयेक लाया जा चूका है फिर भी कई प्रकार के अभी भी खामियाँ  जिनके ऊपर पुनः विचार करने की जरुरत है ताकि आमलोगों को  बिना विलम्ब के संतोषजनक न्याय मिल सके।

यह आलेख अभी जारी है अपने दूसरे भाग में …………………………………… .।

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