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सोमवार, 1 दिसंबर 2014


 तीस हजार का थाली......................... ?

विस्मय करने वाली बात है जिस देश में आधी आबादी को पुरे दिन भागम भाग के वाबजूद भी रात में सुखी रोटी से निर्वाह करने पड़ते है उन्हीके देश में लोग एक वक्त के खाने के लिए तीस हजार बड़े फक्र से अदा कर रहे है। यहाँ सोचने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति के साथ खाने के लिए इतनी मोती रकम वसूली जाती है और वे व्यक्ति जो तीस हजार ख़र्च करके  सिर्फ खाने के लिए उनके सम्पर्क में पहुँचना चाहता है या जो व्यक्ति इस तरह का दावत दे रहे है बदले में धन समेत रहे उनके नियत और नीति क्या पुरे आवाम के प्रतिबद्ध होंगे या कुछ लोगो के इर्द- गिर्द ही सिमट कर रह जायेंगे, यह सवाल उठना भी लाज़मी है? 

एक बात औरहै जिसको जानने को लेकर सब कोई काफी अग्रसर होंगे, तीस हजार का थाली में आखिर किस तरह का पकवान से खातिरदारी कीये गए होंगे ? यदि आप जानने के लिए ललायित है तो चलिए हम को बता ही देतें है खाने के पकवान के नाम पर वही सब होंगे जो आप अपने घर के उत्सव में या किसी के दावत के व्यंजन के मेनू में देखते होंगे फर्क सिर्फ इतना होगा कि कुछ चिकनी- चुपड़ी बातों का तरका जरुर लगाया होगा जो कितनो को हज़म हुआ होगा और कितनो इसी कारण से बेहाज़मी का शिकार हुए होंगे। कुछ नामचीन मीडिया जो ऐसे महानुभाव के पीछे घूमने का आदत पाले हुए है उन्ही के कार्यकर्म के माध्यम से पता चला कि सभी व्यंजन शाकाहारी है जो आकाओं के पसंद को ध्यान में रख कर मेनू  तैयार किया गया ऐसे में जिनके दारोमदार पर शीघ्र चुनाव के लिए  एड़ी - चोंटी एक कर रखे थे उन्ही का पसंद को इस मेनू में रखना भूल कैसे  गए यह बात भी कइयों को हज़म नहीं हो रहे होंगे? 

ऐसे थाली का राज हम आपको बताते है दरअसल में थाली तो बस बहाना है इसके जरिये पूंजी इकट्ठा करना है, जो आगमी चुनाव में धन-बल के साथ उतरने के लिए सहायक होंगे। जो लोग इस तरह के दावत में शरीक होते है वे लोग का सपना ही कुछ और होता है वास्तव में उनके सपने में चार चाँद तब लग जाते है जब उनके पार्टी को सत्ता का कमान मिलता है। फिलहाल जो एक थाली के लिए तीस हजार का भुगतान कर रहे है सत्ता के प्राप्ति के पश्चात अनेको तीस हजार का वापसी हो जाता है जिसे रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट कहा जा सकते है। 

इस तरह का परम्परा अब धीरे -धीरे करके अन्य पार्टी भी अपनाने के फिराक में है क्यूंकि चुनाव के  लिए धन संचय करने का सरल और सूक्ष्म मार्ग है।  निर्वाचन आयोग का रवैया देखकर यही समझा जा सकता है कि निर्वाचन आयोग को इस बात का भनक नहीं है यद्दिप अब तो जगजाहिर है फिर चुनाव आयोग को क्यों नहीं है पता ?  फिर भी बिना विलम्ब के इसका संज्ञान धरे अन्यथा इसे भी पार्टी अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझने लगे अन्तोगत्वा  यह भी तो एक प्रकार गतिविधि है जिनके माध्यम से भ्रष्टाचार को ही बल मिलता है इस सत्य को हरगिज़ ठुकराया नहीं जा सकता है ? जरा सोचिये ............................... !!

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