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सोमवार, 9 नवंबर 2015


 शाह के नीती, चाणक्य के जमीन पर गौण हुआ ?



बिहार चुनाव में जिस कदर सवर्ण ने नितीश कुमार के समर्थन में वोट दिया है इससे यह तो स्पष्ट होता है कि अब जनता जाति से ऊपर उठकर विकास परस्त सरकार को चुनती है। हालाँकि  बिहार के अधिंकाश लोग के मन में  डर था कि लालू के साथ नितीश है जिस कारन से विकासशील सरकार देना नितीश के लिए आसान नहीं होगा फिर भी नीतीश के दस साल के काम -काज को आंकलन करके उसी के आधार पर अपने मन के डर  को किनारे कर नीतीश के ऊपर  विश्वास बरकरार रखा।  हालाँकि नीतीश को अब बिहार के लोगों के आंकाक्षा पूरा करना इतना सहज भी नहीं होनेवाला है क्यूंकि लालू इनके इस नेक काम में अब तक सहयोगी का  भूमिका निभाते है यह कहा नहीं जा सकता है। वास्तव में लालू को विकास प्रेमियों के साथ नहीं भाता ऐसे में दोनों के बीच वैचारिक अशंतुलन होना स्वाभाविक है जिस कारण सरकार की भविष्य अधर में ही रहेगी कारणस्वरूप यह कोई वैचारिक गठबंधन की सरकार नहीं बनने वाली है ब्लिक यह एक मजबूरी का गठबंधन है जो कभी भी और कंही भी टूट सकता है बहरहाल इस गठबंधन के भविष्य को लेकर सदैव संशय का   वातावरण बनी रहेगी।

अगर इस चुनाव में सबसे बड़ी हार किसी को  हुआ तो वह मोदी , अमित शाह और मोदी सरकार में बैठे नीतिकारों का ही हुआ है क्यूंकि नीतीश हारता, लालू  हारता तो देश के जनता के लिए शायद ही अपेक्षा से परे होते पर इस हार से मोदी सरकार की पूरी जड़ हिलनेवाले है क्यूंकि मोदी और अमित शाह के जोड़ी ने कई हिट फिल्म देने के बाद इस तरह के लगातार दूसरी फ्लॉप्स फिल्म दिया है कि इनके शाख और काबलियत के ऊपर प्रश्न चिन्ह लगना तय है। भाजपा के अध्यक्ष  के तौर पर अमित शाह का परफॉरमेंस में वो बात नहीं रही  जिसके लिए वे जाने जाते रहे है  दरअसल में इनके नजर में कार्यकर्त्ता का कोई पूछ नहीं है यह सिर्फ एक बैशाखी है जिसका इस्तमाल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया करते है और फिर बिसार देंते है नतीजा जो जोश भाजपा के कार्यकर्ता को लोकसभा के चुनाव के दौरान देखने को मिलता था अब ऐसा तनिक भी नहीं मिलता है।  एक तरफ अमित शाह को बुद्धजीवियों व पार्टी के बरिष्ठ  नेताओं ने चाणक्य  की संज्ञा दिए जा रहे है , दूसरी तरफ अमित शाह जमीन से जुड़े कार्यकर्ता  से कट रहे है नतीजा दिल्ली के चुनाव और फिर बिहार के चुनाव में करारी हार मिलना।  यद्दिप मोदी सरकार चाहते तो फिर भी इस खाई को भरी जा सकती थी परन्तु केंद्र सरकार के मंत्री ने मंहगाई को लेकर जिस कदर आँख मुंड लिए थे इस कारन भी जनता में आक्रोश है  इसका और भी प्रतिक्रिया देखनो को मिल रहे है और आगे भी देखने को मिल सकते है  ।


देश के जनता सरकार से हताश है और सरकार यदि यथाशीघ्र कई उपयुक्त और सकारात्मक कदम नहीं उठाती  है तो आगमी पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के चुनाव में अनुकूल परिणाम मिलने का भी आसार नहीं है  क्यूंकि जनता के जहन में अब धीरे -धीरे यह बात घर बना रही है कि सभी दल का एक ही लक्ष्य है सत्ता हथियाना और एक बार सत्ता मिल जाता है फिर सबका व्यवहार एक जैसा ही हो जाता है मसलन कांग्रेस , भाजपा और आप, सबके काम करने की तोर -तरीके एक जैसे ही है। अब मोदी सरकार को जनता के जहन से इस बात को घर बनाने से पहले निकालने होंगे अन्यथा भविष्य में एक  भी चुनाव जीतना मुमकिन नहीं होने वाला है इसके लिए चुनाव के दौरान जो अच्छे दिन का जो नारा लगाये गए थे उसे बिनाविलम्ब अम्ल में लिए जाना चाहिए क्यूंकि समय बहुत ही कम है और काम बहुत ज्यादा किया जाना है।

सरकार को असहिष्णुता के प्रति गंभीर होने की जरुरत है यदि यह अफवाह है तो इसे उजागर किया जाना चाहिए यदि इसके पीछे कोई साज़िश है तो इसका भी पता लगाना चाहिए कारणस्वरूप सरकार के विरोधी ने इस तरह का परिवेश भी बनाने में कामयाब रहे है जिसका फायदा उन्हें बिहार के चुनाव में मिला, नतीजन हर गली नुक्कड़ में असहिष्णुता को लेकर बहश छिड़ी हुई है जबकि वास्तविक में लोगों के लिए शायद ही गंभीर मसला है सिर्फ मिडिया और उन्ही के इर्द -गिर्द नाचने वालों के सोंच के उपज है जिसे परिपक्ता से रोकना अत्यंत  आवश्यक है। अन्तोगत्वा बिहार का चुनाव मोदी सरकार के लिए सबक साबित होनेवाला जो इन्हे आगे की राजनीती को दिशा- दशा  देनें में अहम साबित होनीवाली है यद्दिप इस सबक को सकारात्मक दृष्टि में लेकर भविष्य की रोडमैप  सुनिश्चित करे।

















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