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रविवार, 9 मार्च 2014


क्या केजरीवाल देश को दिग्भ्रमित तो नहीं कर रहे है ?

केजरीवाल के आआपा हो या कांग्रेस पार्टी दोनों एक दूसरे के ही पूरक है शायद केजरीवाल अपना प्रतिद्वंदी मोदी के मानते है न कि राहुल गांधी इसीलिए तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस का समर्थन लेने से परहेज़ नहीं है जबकि सर-ए -आम कांग्रेस को भ्रष्टाचारी समझते है और इसका  ढिढोरा पीटते दीखते है।  जबकि इतिहास गवाह है कि नई पार्टी का मुख्य मकसद होती है कि सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ मुहीम का शंखनाद करना न कि एक ऐसी पार्टी के खिलाफ जो कि पिछले एक दशक से प्रतिपक्ष के भूमिका में रहे हो जबकि पार्टी जिस सरकार के खिलाफ किये गए आंदोलन के गर्व में पल कर सरकार के विकल्प के रूप में अवतरित हुई हो और कुछ ही दिन में लोगों के दुआ के बदोलत छोटा सा पौधा एक वृक्ष हो पाया ताकि दमनकारी सरकार के तपस से निज़ात दिलाकर छाया दे, लोगों के  दुआ का ही असर था कि दिल्ली में तख्ता पलट हो पाया पर वर्त्तमान का परिदृश्य देखकर यही कहा जा सकता है कि तख्त पलटने के वाबजूद भी दिल्ली के लोगों के बुनियादी समस्याएं तस से मस नहीं हुई। यदि इसके लिए अगर किसी को जिम्मेदार ठहराया जाय तो अरविन्द केजरीवाल साहब ही है जिन्हों दिल्ली की सरकार भी बना लिए और सरकार गिरा भी दिए और छोड़ गए दिल्ली वाले को अराजक हालात में यद्दिप सरकार गिरते ही उनके द्वारा किये गए सभी फैसलों को ख़ारिज कर दिए गए। हालाँकि केजरीवाल साहेब अब दिल्ली को फ़तेह कर पुरे हिंदुस्तान को फ़तेह करने के लिए निकल पड़े है ताकि दिल्ली जैसी अराजक हालत पुरे देश में बनाने सके इसलिए तो अब उन्होंने कांग्रेस के वजाय भाजपा और उनके प्रधानमंत्री के उम्मीदवार मोदी के ऊपर ही निसाना साधते दिखे जाते हैं।

 कांग्रेस तो अपनी  वाजीगरी के लिए प्रचलित बहुत पहले से है इसीलिए तो अधिसूचना जारी कर जाट के लिए आरक्षण की मंजूरी  दे गई पर भ्रष्टाचार के बिल पर कानी काट गई जबकि जाते -जाते सातवी पे कमीशन को गठित कर गई ताकि केंद्रीय क्रमचारी का वोट उनको मिल सके।  दरशल में कांग्रेस का रवैया भ्रष्टाचार और महंगाई के प्रति कभी भी संतोष जनक न रही नतीजन सरकार ने जिस मुद्दा के आधार पर चुनाव जीत कर दुवारा सत्ता पर काबिज़ हुई कि १00 दिन के अंदर मंहगाई से देश के जनता को राहत देगी पर पूरी कार्यकाल में कुछ भी ऐसा नहीं किया जिससे मंहगाई में गिरावट दर्ज़ हो।  हालाँकि जाने से पहले जरुर आगाह कर गई कि दुवारा आने पर फिर से मंहगाई बढ़ेगी। आखिकार,  इतनी जल्दबाज़ी सातवी पे  कमिशन के गठन के लिए नहीं दिखाते। यही सरकारी क्रमचारी है जो एक तरफ रिश्वत का बाज़ार सजाये हुए और दूसरी  तरफ इनके भत्ते में दिनबदिन बेइंतहा बढ़ोतरी होती रही परिणाम स्वरुप मंहगाई असमान छुं रही है और अबतो सातवे असमान पर पहुचनी तय मानी जानी चाहिए जब सातवीं पे  कमिशन लागु हो जाती है।

हाल में आआपा के कार्यकर्ताके द्वारा जिस तरह से भाजपा के ऑफिस पर धावा बोल दिया गया इससे यही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आआपा आरजकता फ़ैलाने पर अमादा है जो कानून व्यवस्था की मर्यादा का तो हनन करता ही हैं साथ ही किसी भयानक आपदा का भी न्योता दे रहे है। दरशल में पहले तो आआपा का मुद्दा हुआ करता था भ्रष्टाचार, पर अब सिर्फ एक ही मुद्दा रह गया है कि मोदी को रोको जबकि धीरे -धीरे करके पार्टी अपनी अहम् सभी मुद्दे को भूलते जा रहे है। यही कारण है कि चुनावी फायदे के लिए ही सुचिता और भ्रष्टाचार की  दोहाई देते है जबकि सरकार में जब थे तो भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई भी कारगर कदम नहीं उठाये सिवाय पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ मुस्किल से एक FIR दर्ज करवा पाये जिससे कुछ खाश हाने की  उम्मीद नहीं की जा सकती। नतीजन  शीला दीक्षित को केरल की उपराज्यपाल बना दी गयी। क्या कांग्रेस के इस कदम के लिए  आआपा धरना या आंदोलन करेंगे अभी तक का रुझान से यही लगता हैं कि अब इनके लिए उनके पास वक्त ही नहीं है क्युकीं चुनाव का विगुल बज चूका है और अब इस तरह का ही हरकत करेंगे जिससे सीधे चुनाव में फायदा होता दिखेगा।

केजरीवाल ने शायद ये जान चूका है कि कांग्रेस के ऊपर नज़र गड़ाएं रखने से उन्हे कुछ ज्यादा हासिल होने का आसार नहीं है इसलिए अब वह सिर्फ मोदी को ही टारगेट कर रहे ताकि मोदी के वोट बैंक में सेंध लगा सके।
वास्तव में केजरीवाल के निसाने के लिए हमेशा ऐसा आदमी को ही चुनते है जिसके इर्द -घूमने या ऊपर कीचड़ फेकने के बदले लोगों का सुहानभूति मिले यही वजह है कि इनदिनों मोदी के संदर्भ में जो पुरे देश में उबाल है केजरीवाल उनके ऊपर छींटा -कशी कर देश को दिग्भ्रमित कर सके ताकि आम चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके।

कभी तो केजरीवाल खुदको विकल्प प्रधानमंत्री का मानते है और खुद पर यकीं है तो इस कदर का आरजक मोहाल फ़ैलाने का क्या मतलब है ?, दमन और दबंग के राजनीती से निज़ात दिलाने आये थे पर खुद ही दमनकारी गतिबिधियों में लिप्त हो गए, क्या यही मुख्य कारण तो नहीं कि राजनीती से शभ्य और सज्जन लोग परहेज़ करते है?, ऐसा तो नहीं कि आजके राजनीती में सिर्फ यही सब जायज़ है जिसके बिना राजीनीति के धरातल पर स्थापित नहीं हो सकते है और यह आभाष केजरीवाल को हो चला है इसीलिए इस तरह के हरकतें के लिए जोर-सोर से अग्रसर है।  अन्तः जनाब, हम जनता है सब जानते है और आपसे सभी राजनीतिज्ञो से अनुरोध है कि सालीनता और संवेदना का परिचय दे तो हम, आप और हमारे देश के हित में होंगे।

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