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शनिवार, 29 मार्च 2014


  लोकतंत्र में परिवार वाद व अनुकम्पा आखिर कब तक ?



लोकतंत्र के धुरी को खोखला करने पर आमादा,  आज के प्रायः  सभी सियाशी नेता और दल जो परिवार वाद व वंश वाद के बुनियाद पर राजनीती कर रहे है, खुदगर्जी  कहे या कुछ और वजह  पर अपने हित के चलते ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजतंत्र वाली रिवाज़ को कायम रखने में अभी तक कामयाब रहे है। वंशवाद व अनुकम्पा एक तरफ सुयोग्य उम्मीदवार को राजनीती में सक्रियता से वंचित करता है जबकि  दूसरी तरफ राजनीती में एक परिवार का वर्चस्व इस कदर बढ़ता है जो लोकतंत्र के धुरी यानि व्यवस्थाओं को अपने सुविधाओं के लिहाज़ से इस्तेमाल करते रहते है और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी राजतन्त्र वाले ही प्रथा को जीवित रखने का पुरजुर प्रयास करते है  ताकि अपने मनसूबे को साधने में कोई खास मस्कट करने की जरुरत न पड़े।

जिस तरह से दो दशक पहले सरकारी नौकरी में अनुकम्पा का प्रावधान था पर वर्त्तमान में शायद ही अनुकम्पा नामके के शब्द सरकारी नौकरी में देखने को मिलेंगे जबकि राजनीती में बरसो से आ रहे वंशवाद व अनुकम्पा का चलन इनदिनों काफी जोरो पर है पार्टी कोई भी हो पर इससे इसकी को भी परहेज़ नहीं है मसलन कुछ पार्टी परिवार के इर्द -गिर्द ही सिमट कर रह गयी हालाँकि कुछ पार्टी जो खुद को सिद्धांतवादी बताने से हिचकते नहीं पर अब वे भी अपनी सिद्धांत को तिलांजलि देकर आहिस्ता -आहिस्ता कर परिवार वाद व वंश वाद को अपनाने लगे है।

बिडम्बना तो तब होता है जब इस तरह के चलन के बारे में जब राजनीतिके कर्णधार से पूछे जाते है तो एक अजीब सा तर्क देते है " यदि डॉक्टर का बेटा डॉक्टर हो सकता है, वकील का बेटा अगर वकील हो सकता है तो फिर नेताजी के बेटा नेता क्यों नहीं हो सकता है?" तर्क तो जायज़ है पर तर्क देनेवाले ने ये नहीं कभी बताये कि डॉक्टर और वकील बनने के लिए मापदंड तय है जो  अध्यन से हासिल की जाती अर्थात डॉक्टर और वकील के बेटा होने का उन्होंने कोई अनुकम्पा नहीं दिया जाता है ब्लिक उनके अपनी योग्ता और काबलियत को प्रतियोगिता अथवा संघर्ष के माध्यम से साबित करना होता है तब जाकर वह अपने माता -पिता व पारंपारिक पेशा से जुड़ते है। जबकि राजनीती में अभी तक कोई मापदंड और न ही कोई मानदंड निर्धारण किया गया जिसके माध्यम से नेताजी के बेता या भतीजा की योग्ता परखे जाते है पर शायद ये कभी ही मुमकिन हो!

राहुल गांधी हो या नरेंद्र मोदी कभी भी परिवार वाद के खुले तौर पर पक्षधर नहीं दिखतें है इसलिए जंहाँ राहुल गांधी अपनी काबलियत सिद्ध करने में एड़ी- चोटी  एक कर रखे है फिर भी ये कभी नहीं साबित कर पाये हैं कि उनके पार्टी में जो उनका रसूख है सिर्फ इसके बदोलत कि वह गांधी परिवार के वंशज है अन्यथा वह किसी भी मायने में उस रसूख के लायक नहीं है  जिस पर वह फिलहाल काबिज़ है। यही कारण है कि राहुल गांधी कांग्रेस में जड़ जमा चुकी परिवार वाद को लेकर चुपी साढ़े हुए है जबकि चुनाव से पहले सुयोग्य  उम्मीदवार का वक़ालत किया करते आ रहे थे और जैसे ही चुनाव का शंखनाद हुआ परिवार वाद व  अनुकम्पा  के सभी पुराने रिकार्ड के पीछे छोड़ एक नई रिकार्ड बनाने के लिए अपने ही पार्टी के नेताओ को छूट दे दी। नरेंद्र मोदी की बात करेंगे तो वह भी परिवारवाद को लेकर  कांग्रेस को कोसते आ रहे है मसलन कांग्रेस के प्रधानमंत्री  के अप्रयतक्ष उम्मीदवार राहुल गांधी को शहजादे के नाम से ही सम्बोधन करते दिखतें  है जबकि आधी दर्जन से कही ज्यादा उम्मीदवार ऐसे चुनावी रणभूमि में उतारे गए हैं उनकी पार्टी के तरफ से जो वाकये में परिवारवाद को ही दर्शाते है हालाँकि मोदी यदि चाहते तो इस परिवार वाद व अनुकम्पा को रोक सकते थे पर इनके प्रति वह भी गम्भीर नहीं देखे गए  है इसीका नतीजा है उनके पार्टी के दिग्गज नेताओ अपने सगे सम्बन्धियों को टिकट दिल खोल कर बाँट रहे है जबकि योग्य और कर्मठ उम्मीदवार को सरेआम नजरअंदाज़ करते दिखे जा रहे है। वास्तव में  हैरत तो तब होती है जब केजरीवाल के आआपा जो अभी हाल में  ही राजनीती के पृष्ठ भूमि अपनी उपस्थति दर्ज करबा पायी हालाँकि फिलहाल अभी तक राजनीती जमीं ही तलाशने के काम को भी पूर्णरूप से अंजाम  नहीं दे पायी  फिर भी परिवार वाद और वंश वाद को  ही प्रोत्साहन देने से हिचकते नहीं ।

यदि क्षेत्रीय पार्टीयों की बात करे तो सभी पार्टिया परिवारवाद से ग्रस्त हैं बिहार के लालू और पासवान हो या उत्तर प्रदेश के मुलायम, पूरब के ममता बेनर्जी हो या दक्षिण के करुणानिधि अर्थात परिवारवाद की बीमारी देश के चारों दिशाओं में फ़ैल चुकी है। इन पार्टी के आकाओं ने राजनीती को अपने परिवार के इर्द -गिर्द इस कदर समेत रखा है आनेवाले दिनों में यदि आम चुनाव के जितने सीट हासिल करेंगे उसमें आधे से ज्यादा सीटों पर उनके परिवार का कब्ज़ा होंगे बाकि आधे में पुरे प्रदेश के प्रतिनिधि। परिवार वाद  योग्य उम्मीदवारी के ऊपर ग्रहण लगाते ही है जिसके कारण पार्टी के भीतर अंतर कलह पनपना लाज़मी है अन्तः पार्टी में कर्मठ और निस्तावान कार्यकर्ता का भी आभाव हो जाते है क्यूंकि पार्टी में तो एक ही परिवार का सिक्का चलता है जबकि अन्य कार्यकर्ता उपेक्षा का शिकार हो कर या अपने भविष्य को अधर में देखकर पार्टी के प्रति सकारात्मक  विचार को ज्यादा दिन तक रखने में असमर्थ हो जाते है जो आखिरकार पार्टी से मोह भंग करके कोई अन्य विकल्प को ही चुनते है।

परिवार वाद के बुनियाद पर कभी भी भर्ष्टाचार मुक्त भारत का कल्पना नहीं किया जा सकता है क्यूंकि परिवार वाद ही तो है जो भर्ष्टाचार को सरक्षण का काम करते है अर्थात व्यवस्थाओं में यदि एक ही परिवार का दबदबा रहता है तो राजनीती के आकाओं के साथ नौकरशाह भी निश्चिन्त रहते है कि कोई भी उनको बालबांका नहीं कर सकते है ऐसे में राजनीती के आकाओं और नौकरशाह के बीच के साठ -गांठ निर्भीक हो कर बरसो तक चलते रहते हैं  जिस कारण से रिश्वत के रकम को बड़ी ईमानदारी से इन दोनों वर्ग के लोग आदान- प्रदान करते रहते है। 

दरशल में परिवार वाद बीमारी का रूप तो धारण कर ही लिया है और आहिस्ता- आहिस्ता कर महामारी का स्वरूप में तब्दील होती जा रही है, फिलहाल तो लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रही है और आनेवाले दिनों में यह लोकतंत्र को ही निगल जायेंगे यदि समय रहते हुए इसको रोका नहीं जाता। हालाँकि आम लोगों का रवैया इसको लेकर नकारात्मक है फिर भी उसके तादाद भी कम नहीं है जो इसके पक्ष में न हो अन्यथा ऐसे नेताओ को कभी भी समर्थन नहीं मिलते जो परिवारवाद के दम पर राजनीती के बुलंदी पर पहुंचना चाहते है।


बरहाल आज के राजनीती के परिवेश में कोई भी नेता हो या सियाशी दल परिवारवाद व अनुकम्पा से परहेज़ नहीं रखते है।  यद्दिप जनता अब इसके किसी भी स्वरुप को स्वीकाने के लिए वाकये में तैयार नहीं तो हरगिज़ ऐसे उम्मीदवार को मतदान नहीं करेंगे जो सिर्फ परिवार वाद के जरिये अपनी राजनीती जमीं तलास रहे है अथवा जनता सिर्फ दिखावे के लिए इसका विरोध करते है, अंतोगतवा यर्थाथ हमारे सामने आने महज  कुछ ही दिनों में आनेवाले है जो आगामी आम चुनाव के बाद पूर्णतः स्प्ष्ट हो जाएगा। 

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