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गुरुवार, 1 मई 2014

कांग्रेस की आखरी बाजी

भाजपा को रोकने के लिए जिस कदर कांग्रेस दिल्ली में आआपा को समर्थन दी थी, बेशक ४९ दिनों के लिए ही सही केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने में कांग्रेस अहम रोल अदा की थी, आआपा के सभी कूटनीति कांग्रेस के आगे धाराशाही   हो गयी आखिरकार आआपा इस तरह से विवश हो गयी फलस्वरूप आआपा खुद ही हथियार डालकर अन्तः  इस्तीफा देना ही पड़ा आआपा के सरकार भी गयी और जनाधार भी गया। उसी तरह किसी भी हालत में कांग्रेस नहीं चाहेगी कि केंद्र में भाजपा की सरकार बने। फिलहाल जो भी स्थिति दिल्ली प्रदेश सरकार के लिए लोगों के सामने बनी हुई है अगर इस तरह का स्थिति केंद्र सरकार को लेकर देश के समक्ष हो तो इसमें  कोई भी हैरत नहीं होना चाहिए क्यूंकि इस तरह के स्थितियों से एक तरफ कांग्रेस को फायदा मिलता है जबकि उनके विपक्षी दलों में मायूसी ही दिखतें है। इसी के तहत कांग्रेस अपने प्लान के ऊपर जोर-सोर से काम करना शुरू कर दिए है।  भाजपा को रोकने के लिए इन्हे वामदलों को समर्थन देने और लेने से भी से भी परहेज़ नहीं है कांग्रेस ने तो मोदी के रोकने के लिए दो तरह के  प्लान की तैयारी कर रहे है। प्लान -A के तहत वामदलों को छोड़कर खुद ही सरकार के अगुआई करेंगे जिनमें सपा, बसपा , डीएमके, एनसीपी, टीएमसी, BJD और अनेको छोटी-छोटी और क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन बनाएंगे और इसको सेक्युलर गठबंधन का संज्ञा देकर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार करेंगे और सभी दलों के उनके सीट के आधार पर कैबिनेट मंत्रालय में जगह दिए जायेंगे यद्दिप इसके लिए कांग्रेस को चाहिए कम से कम १४० सीट।

 जबकि प्लान-B के अनुसार कांग्रेस थर्ड फ्रंट को बाहर से समर्थन दें सकती है। हालाँकि थर्ड फ्रंट का अहम भूमिका होगा सरकार के स्वरुप को तैयार करके सरकार को चलाये जबकि कांग्रेस किसी भी दशा में सरकार में शामिल नहीं होगी। सरकार कांग्रेस बनाये अथवा थर्ड फ्रंट दोनों ही स्थितियों में कांग्रेस के ऊपर सरकार का दारोमदार होंगे जिसके दरमियान कांग्रेस अपनी खोई साख को सृजन करने को पुरजोर कोशिश करेगी । गैर एनडीए सरकार बनाने के अथक प्रयास इसलिए भी कांग्रेस करेंगे क्यूंकि कांग्रेस को पता है यदि एनडीए के सरकार बनती ही दस साल के सभी घोटालों का लेखा -जोखा जनता के समक्ष होंगे जबकि इनके दस साल के दौरान मंत्री रहे अधिकतर नेता कारागार में होंगे जिनसे कांग्रेस पार्टी को अत्याधिक नुकशान उठाना पड़ेगा, जिसका भरपाई करने के लिए व पुनः स्थापित होने के लिए बरसों लग जायेगा,  इस कारण कांग्रेस पार्टी कभी भी नहीं चाहेगी कि भाजपा के अगुआई वाली सरकार केंद्र में आये। हक़ीक़त में दोनों प्लान की ब्लू प्रिंट सरलता से तो तैयार किये जा रहे है परन्तु आसान नहीं होगा जब इनके ऊपर काम करना होगा क्यूंकि पहले ही इस तरह के कवायद पर विराम लग जायेगा जैसे ही एनडीए गठबंधन को २७२ सीट के करीब या उसके ऊपर मिलते है अपितु थर्ड फ्रंट को एक सूत्र में बांधकर ज्यादा दिन रखना कदापि सहज नहीं है। वाबजूद सरकार थर्ड फ्रंट की ही बने पर कई छोटे -छोटे पार्टी होने कारण सामंजस्ता और संतोष के आभाव में बहुत ही जल्दी बिखरने का अंदेशा बनना स्वाभविक है फिर भी कांग्रेस अपनी आखरी बाजी तो खेलेंगे ही।

दरअसल में महाराष्ट्रा के मुख्य मंत्री के संकेत से साफ़ जाहिर होता है कि कांग्रेस के नेताओं ने दोनों प्लान के ऊपर काम करना तभी से शुरू कर दिए जब उनको ज्ञात हो गया था कि यूपीए गठबंधन के  चुनावी परिणाम काफी प्रतिकूल होने वाला है और यूपीए गठबंधन हरगिज़ सत्ता के आस-पास नहीं पहुँच पा रहे है , ऐसे में नए प्लान के बदौलत ही सत्ता हासिल की जा सकती है अथवा एनडीए गठबंधन को सत्ता से दूर रखे जा सकते है। फिलहाल सबकी नज़र १६ मई के परिणाम पर ही है, उसके उपरांत ही सत्ता के लिए जोड़-तोड़ की राजनीती का असल क्लाइमेक्स देश के सामने आएंगे।  वास्तविक में कांग्रेस इस तरह के राजनीती में माहिर है जिस कारण ही १९९६ में अटल बिहारी वजपेयी को १३ दिन के पश्चात इस्तीफा देना पड़ा था क्यूंकि सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाये थे । परिणाम स्वरुप कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर दो साल में भारत के दो प्रधानमंत्री दिए यद्दिप उनके यह चाल उनके ही उलटे पड़ गए नतीजन १९९८ में एनडीए गठबंधन सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरे अन्तः अटल बिहारी वाजपेयी के अगुआई में सरकार का गठन हुआ जिनके आयु १३ महीने रहे उसके पश्चात देश को फिर से मध्यावि चुनाव का सामना करना पड़ा हालाँकि इस बार एनडीए गठबंधन इतने सशक्त सरकार दिए जो कि  गैर कांग्रेसी सरकार केंद्र  में पहली बार बनी जो अपनी पांच साल का कार्यकाल पूरी कर पाई।

बरहाल कांग्रेस और बीजेपी दोनों जद्दोजहद में लगे है कि अपनी-अपनी सरकार बनाये पर इन्ही जद्दोजहद के बीच कांग्रेस के एक समूह उन सभी विकल्प के ऊपर आत्म मंथन करने में लगे है कि कांग्रेस यदि बीमार भी हो जाये कि किसी भी दृष्टि से सरकार का बोझ उठाने के काबिल न रहे फिर भी  थर्ड फ्रंट या कोई अन्य विकल्प को तलाश रहे है जिनके माध्यम  से सत्ता के बागडोर उनके ही हाथ में हो। जबकि भाजपा एनडीए गठबंधन को मजबूत करने में लगे हुए ताकि किसी भी हालत में सरकार बनाने का मौका हाथ से जाने न दिया जाय। अन्तः देश लोग भी बड़ी ही बेशर्बी से १६ मई का  इंतजार कर रहे है क्यूंकि चुनाव परिणाम आने के पश्चात ही इन पार्टियों का दशा और दिशा समझ आ पाएंगे  … ................।

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