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शनिवार, 26 अप्रैल 2014



कौन है धर्मनिरपेक्ष यहॉँ ?


दिन-ब - दिन राजनीती के स्तर बद से बदतर होते जा रहे है इसीलिए तो ज्यादातर पार्टिया असल मुद्दा को भुलाकर सिर्फ धर्मनिरपेक्षता को ही अहमियत दे रहे है। जबकि सत्तारूढ़ पार्टियों के पास भी भुनाने के लिए उपलब्धियाँ के नाम पर कोई बहुत बड़ी सूचि नहीं है परिणामस्वरूप सारे सियाशी दल और उनके नेता सिर्फ धर्मनिरपेक्षता के बहती दरिया में गोटा लगाकर चुनावी भँवर से उबरना चाहते है। कई कदावर नेता जो देश के बड़ी सियाशी दल से तालुकात रखते है उन्होंने तो सभी तरह के मर्यादा लाँघ रहे है और इस तरह के ओछे बयांन दे रहे है ताकि एक तबके को खुश कर पाये जिसे शभ्य समाज हरगिज बर्दाश्त नहीं कर सकते चाहे वे किसी भी धर्म या जाति का क्यूँ ना हो। ऐसे में सियाशी गतिविधियाँ न सिर्फ सियाशी चाल तक सिमित रह गए है ब्लिक व्यकतिगत छीटाकशी व व्यक्तिगत प्रहार का रूप भी अख्तियार कर चूका है। यँहा प्रश्न यह उठता है कि मुसलमान को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते हुए जो पार्टी देश व प्रदेश के सत्ता पर काबिज़ हो जाते है अथवा काबिज़ होने के ख्वाहिश रखते है, उनके लिए मुसलमान सिर्फ वोट बैंक ही बनकर रह गया अथवा सत्ता पर काबिज़ होने के बाद इन पार्टियों ने कभी मुसलमानो के लिए संजीदा से काम भी किये है। यदि फिलहाल मुसलमान के जो हालत है उनको देखकर तो यही कहा जा सकता है " कुछ भी नहीं"। 

 देश में वही मुसलमान पिछड़े के श्रेणी में आते जिनके सोच धर्म से शुरू हो कर धर्म पर ही खत्म हो जाता है जबकि उनके ही समुदाय के लोग उनके धर्म के प्रतिबद्ध सोच को भलीभांति जानते हुए इनका पूर्णतः इस्तेमाल कर अपने स्वार्थ को सिद्धि में करने लग जाते है। आज देश में मुसलमान का जो हालत है इसके लिए अगर अत्यधिक कोई जिम्मेवार है तो वह है उनके ही धर्मगुरु जो फ़तवा का एलान करने में अग्रसर रहते और अपने फायदा के लिए धर्मनिरपेक्षता के आध को लेकर अपने ही हित को साधते रहते है जबकि राजनीती पार्टी इन धर्मगुरु को निजी लाभविन्त करके पुरे समुदाय का वोट एकत्रत कर लेते है। दरअसल देश में मुसलमान को छोड़ दें तो और भी बहुत से धर्म है पर राजनीती पार्टी सिर्फ मुसलमान का क्यों टारगेट करतें है अथवा मुसलमान का ही वोट पाने के लिए खुदको धर्मनिरपेक्ष पार्टी के श्रेणी में लाने के लिए प्रयासरत क्यों दिखते है और खुदको धर्मनिरपेक्षता के सुभचिन्तक बतलाने से थकते क्यों नहीं?, मसलन तकरीबन सभी राजनीती पार्टी को पता चल चूका है,  इनके समुचित १७-२० प्रतिशत वोट एक मुष्ट हो कर किसी एक पार्टी के समर्थन में  जाती है, जो सरकार बनाने के लिहाज़ से अत्यंत कारगर सिद्ध होता है। 

हालाँकि आज़ादी के पैंसठ साल बीत जाने के वाबजूद भी देश के मुसलमान एकजुट होकर अभी तक वोट इसलिए करते आये है कि उनका सरकार के ऊपर पकड़ बने रहे ताकि अन्य के मुकाबले में सरकार उनके सुरक्षा के लिए अत्यधिक संवेदनशील रहे। जबकि सत्तारूढ़ पार्टी हो या कोई अन्य पार्टी उनके प्रति घड़ियाली आँशु बहाने में ही सब एक दूसरे को पछाड़ने में लगे रहते है पर हक़ीक़त में कुछ और ही होता है इसी वजह से समय पर समय अपने फायदे के लिए समुदायिक रंजिश भी कराने से परहेज़ नहीं करते है ताकि इन समुदाय के बीच में भय का वातावरण बनी रहे अन्तः इन्ही भय के कारण चाह कर भी उनके पार्टी को नज़रअंदाज न कर सके, यही कारण है कि मुस्लिम वर्ग के अधिकाधिक लोग समाज के सभी तबके में रहते हुए भी दूसरे तबके से दुरी बनाये रखने को ही पसंद करते है ताकि उनके धार्मिक सोच को ठेश न पहुंचे। यद्दिप अब आहिस्ता -आहिस्ता ही सही पर पढ़े -लिखे लोग इस तरह के सोच को खारिज कर समाज के सभी तबके के साथ घुलमिल रहे है और खुदको समाज के अनुरूप ढाल रहे है।  ऐसे में राजनीती पार्टी को भी चाहिए कि धरम और जाति को छोड़कर दूरगामी योजना के साथ चुनावी दंगल को फ़तेह करे। 


धर्मनिरपेक्ष समाज का कल्पना तभी मुमकिन है, जब समाज के सभी धरम को समान दृष्टिकोण से देखा जाय और मंसूबा पाक-साफ़ हो अपितु किसी एक विशेष धर्म के लोगों को इसलिए अहमियत देना कि उनसे अपनी राजनीती हित को पूरा कर सके, यह सोंच धर्मनिरपेक्षता को कभी जीवित रखने के अनुकूल नहीं माना जा सकता। जबकि यही नेता अपने धरम को खुलेआम धारण करने से भी हिचकते है अथवा इसलिए धारण नहीं करते दिखतें है कि उनसे उनको सियाशी फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। जबकि किसी और धर्म के प्रतीक को सारे-ए -आम धारण के लिए अग्रसर रहते है ताकि इनसे उन्हें सियाशी फायदा मिलें। ऐसे में एक सभी तबके के लोगों को ही आत्मचिंतन करने पडेंगे कि जो लोग बिना फायदा के अपने धर्म को नहीं पालन करते है फिर बिना मतलब के दूसरें के धर्म के प्रतीक को धारण बिना किसी हिचक के क्यों कर रहे है व इतना सम्मान क्यों दे रहे है?

इन दिनों मुस्लिम वर्ग के लोगों में सुधार की काफी गुंजाईश है जिसे बिना किसी स्वार्थ और निष्पक्षता के साथ किया जाना आवश्यक है। लगभग में मुस्लिम वर्ग के आधी आवादी शिक्षा से वंचित है और आधी से ज्यादा आवादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने पर बाध्य है इसलिए ज्यादातर बच्चे उपयुक्त मार्गदर्शन के आभाव में भटक जाते है या भटके हुए है, जिन्हे बिना विलम्ब के समाज के मुख्यधारा के साथ जोड़ा जाना चाहिए और उनको बुनियादी सुविधाएँ व सहूलियत मुहैया करवाये जाय, जिनसे ज्यादा से ज्यादा वे लोग भी उच्च शिक्षा हासिल कर, एक बेहतर कल का नीव रख सके।

आखिकार सियाशी दल धर्मनिरपेक्षता के आढ़ मेंअपनी सियाशी आकांक्षाएँ पुरे करते आये है उसे यधासिघ्रा बंद  करे, अपने सियाशी हित के खातिर विभिन्न धर्मों के बीच उन्माद पैदा करने के वजाय समाज के सभी वर्ग और जाति को एक सूत्र में बांधने का काम करे तो देश और आवाम दोनों के लिए बेहतर होंगे। विकसित भारत का सपना देखना कदापि संभव नहीं है जबतक सभी वर्ग, जाति, धर्म के लोगों के विकास में भागीदारी नहीं दिया जाता है। अन्तोगत्वा सियाशी दल  अभी तक धर्मनिरपेक्षता रामवाण चुनावी नुसखा के रूप में अभी तक उपयोग करते आये, शायद भविष्य में इतना कारगर साबित न हो क्यूंकि कि सभी तबके लोग इन तरह के चुनावी नुसखा से वाक़िफ़ हो गए और आनेवाले वक़्त में इसका कोई खास महत्व नहीं रह जायेगा। 

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