Daily Calendar

गुरुवार, 3 सितंबर 2015



 केजरीवाल और जनता परिवार…………………… 


केजरीवाल  वाकये में आज की राजनीति के सबसे मजे हुए खिलाडी खुदको साबित करने में लगे है, जनाब जिन्होंने कांग्रेस के नीतियों के खिलाफ शंखनाद करके राजनीती के पृष्ठभूमि पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई हो लेकिन वही महान व्यक्ति आज कांग्रेस और उनके सहयोगी के साथ भविष्य की राजनीति की ब्लू प्रिंट तैयार कर रहे हो, इस तरह महत्वाकांक्षी सोच रखनेवाले आदमी से कोई सकारात्मक अपेक्षा रखना शायद ही उपयुक्त हो क्यूंकि राजनीती में छूट और अछूत को परिभाषित करना  कभी भी सहज नहीं रहा फिर भी जिनके नीति और नियति पर प्रश्न चिन्ह लगाकर खुदको जन हितेषी बताकर अपनी राजनीती के सितारे को बुलंद करते रहे है बाद में उन्ही पार्टी के साथ अनैतिक सांठ -गाँठ करके आगे की राजनीती को दशा और दिशा देने के तत्पर हो   अब उन्हें किसी भी तरह के लोगो से परहेज़ नहीं है, ऐसे लोगो से आम आदमी का भला कतई संभव नहीं परन्तु ऐसे लोगो से  देश और प्रान्त के नुकशान शुनिश्चित है इनमें किसी तरह का संकोच नहीं होनी चाहिए।

केजरीवाल  आज के राजनीती के शायद पहला मुख्यमंत्री जो बिना स्टेपनी के एक कदम भी नहीं खिसकते है। उनके यह सावधानी से जरूर सीख मिलते है कि इक-इक  ग्यारह होते है इनसे अपनी सोच और कार्य करने की क्षमता पर  काफी बल पड़ता है इसीलिए तो शोले में जय और वीरू की जोड़ी और आजके राजनीती के परिदृश्य में सिशोदिया और केजरीवाल की जोड़ी काफी हिट है।  केजरीवाल ने अब नीतीश कुमार के साथ मिलकर लालू यादव के पद चिन्ह पर चलकर भविष्य की शियासी समीकरण को नज़र में रखते हुए जाति और प्रान्त आधारित राजनीती की अंकगणित को दुरुस्त करने में लगे  है  फलस्वरूप  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लालू और मुलायम से अब केजरीवाल को दिक्कत नहीं और वे दिन  दूर नहीं जब केजरीवाल भ्रष्टाचार के स्तम्भ के साथ मंच साझा करते दिखे।  वैसे भी राजनीती के स्तर का कोई मापदंड तो कुछ  चिन्हित होता नहीं फिर भी राजनीतज्ञ को कुछ तो अपने विवेक का लिहाज़ रखनी चाहिए ताकि आखरी पड़ाव में जब राजनितिक जीवन का आकलन करे तो खुद ही शर्मसार अपने किये हुए पर न होना पड़े।

दरअसल में केजरीवाल को भलीभाँति ज्ञात हो गया की मुलभुत मुद्दा अब रहा नहीं, किये गए वायदे को पूरा करना कतई संभव नहीं है यद्दीप  लालू और मुलायम की राजनीती को अपनाने से ही दीर्घकाल तक सत्ता का स्वाद चखा जा सकता है।  बिहार और उत्तर प्रदेश से आये हुए भरी तादाद में लोग को ध्यान में रखकर जनता परिवार का जो गठबंधन है उनके इर्द-गिर्द घूम रहे है क्यूंकि बिहार और उत्तर प्रदेश से आये हुए लोगो का समर्थन मिलता रहे तो शायद ही  कोई सत्ता से वंचित रख  सकता , वस्तुतः बिहार के ३१ प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के लगभग ४० प्रतिशत दिल्ली के मतदाता है जो किसी भी पार्टी को सत्ता पर काबिज़ करने के लिए काफी मन जा सकता है यदि इनको रीझां पाये तो केजरीवाल की राजनीती सितारे सदैव चमकते रहेंगे और इनको रिझाने में लालू , नितीश और मुलायम अहम रोल निभा सकते है।  इस समीकरण को ध्यान में रखकर केजरीवाल ने जनता परिवार के साथ  जाने में थोड़ी भी संकोच नहीं है।

वास्तविक में लालू, मुलायम और केजरीवाल की राजनीती में कुछ भी भिन्नता नहीं है क्यूंकि इन तीनो का राजनीती करियर का आगाज़ कांग्रेस को खात्मा के लिए होते है पर समय के साथ इन सबका नजरिया बदल जाते है और ये लोग कांग्रेस के साथ मिलकर कांग्रेस के मुलभुत विपक्षी को अपना दुश्मन मान कर एक खेमे में आकर खड़े हो जाते है हालाँकि इस तरह का अनैतिक गढ़बंधन समय के साथ- साथ  अपना स्वरुप बदलते रहते है क्यूंकि इस तरह के गठबंधन का भविष्य सुनिश्चित नहीं होती है क्यूंकी इस गठबंधन के प्रति लगाव तभी तक रहता है जबतक ये मददगार हो जैसे ही मौका निकल गया फौरन एक फिर अन्य गठबंधन का ताना -बाना बुनने लगते है।  फिलहाल  केजरीवाल और नितीश एंड कंपनी का वर्तमान में जो करीबी है भविष्य में देखना है की कबतक रह पाते है और किस हद तक रह पाते है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें