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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013


 जरा सोचिये :-
हिंदुस्तान में कोई भी पार्टी धर्म निरपेक्षता का दावा नहीं कर सकती है। JDU, SP, BSP, NCP, TDP और कोई भी नहीं क्यूंकि धर्म निरपेक्षता का मतलब होता हैं सभी धर्मो के साथ बराबर का व्यवहार करना ना कि अपने हित को साधने के खातिर किसी एक धर्मं को प्राथिमिकता देना। हिंदुस्तान में अनेको धर्मं हैं जैसे कि हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, जैनी, बोधि और अन्य पर इस देश में सक्रिय राजनीती पार्टी सिर्फ एक ही धर्म के प्रति सहानभूति दिखाकर अपने को धर्म निरपेक्षता पार्टी के पंक्ति में ला कर खरा कर लेती हैं जो कतई उचित नहीं कहा जा सकता हैं। बड़ी तादाद में  राजनीती पार्टी हैं जिसमे सभी धर्म के प्रतिनिधि भी नहीं हैं फिर भी अपने को  धर्म निरपेक्षता पार्टी कहने में थोड़ी भी हिचकते नहीं हैं। इन पार्टी के नुमायदो ने धर्म निरपेक्षता का परिभाषा ही बदल दी। आज धर्म निरपेक्षता का मतलब हैं कि जोर सोर इसका इस्तेमाल करो और वोट बोटरों  अन्यथा अब इसका कोई मायने नहीं रह गया।  जो सरकार अल्प्शंख्यक के नाम पर रिजर्वेशन कि बात करते हैं क्या उनके पास उन अल्प्शंख्यक का ब्यौरा हैं जो सबसे नीचले कतार में हैं, कभी उनके हित में कुछ कहते हुए नहीं सुना गया क्यूंकि कि उनके जनशंख्या इतना नहीं हैं कि सरकार गिराने और बनाने का मादा रखता हो इसलिए उनके शूध लेने को किसी भी  राजनीती पार्टी के पास वक्त नहीं हैं।  देश में जिस तरह दो समुदायो के बीच में तकराव कि स्थिति बनी पड़ी है इसकेलिए राजनीती पार्टी कम जिम्मेवार नहीं हैं और अपनी वोट कि राजनीती के लिए समुदायो के बीच में तकराव का राजनीतिकरण करनी  और अपने पक्ष में इसका  इस्तेमाल करना बखूवी जानते हैं  इसलिए तो रोकने के बजाय  इसको हवा देते  पाये जायंगे पर इसकेलिए भोले भाले जनता भी उतना ही जिम्मेवार हैं जितनी  राजनीती पार्टी जिम्मेवारहैं क्यूंकि उनके बिछाये हुए जाल में अपने को फास लेते हैं। क्या हम, जनता इस तरह के पार्टी का वहिष्कार नहीं करना चाहिए,  जरा सोचिये , कि कब तक राजनीती पार्टी धर्म निरपेक्षता के नाम पर अपनी हित साधती रहेगी और कब तक उनके इन बातो में  हमलोग आते रहंगे, आखिर कब तक ?………………

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