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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014


 ताबर -तोर हमला है जारी,मुख्य शस्त्र नेताजी  के असल में जुबान है !!

 


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सत्ता के कुरुक्षेत्र में सब हैं यंहा आमने सामने,
न गद्दा, न धनुष और न कोई बाण है !
कितने हुए मूर्क्षित, ताबर -तोर हमला है जारी,
 मुख्य शस्त्र नेताजी के असल में जुबान है !!
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रिस्ते नाते से बेखबर सत्ता के लार से लवालव,
जोर -जोर से सीना थोक रहे है !
वेदना का आभाष करे दिखाके घड़ियाली आंशु,
अटपटा सा लगे आखिर क्यूँ इतना भोक रहे!!
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कभी इधर से कभी उधर से
जुबानी बम का गोला फटते ही हो जाते उदंड !
न कोई मर्यादा ही दीखता,
इन बाक युद्ध में अब रहा न इनके कोई माप दंड !!
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एक से एक यहाँ पर महारथी,
सबके तरकश भरे पड़े है बदजुबान के तीर -कमान !
बस मौका मिले, फिर देखिये
 कैसे गाली-गलोज के संग हमलावर होते है इनके जुबान!!
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 कभी बनकर भीगी बिल्ली,
 तो कभी बन गए बब्बर शेर!
कभी म्याऊँ से सन्न कर दिए,
 तो कभी दहाड से कर गए ढ़ेर!!
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अपनी -अपनी आलाप रहे
औरों के दिलो में झांक रहे !
 चुनाव है इसलिए तो
 गली -नुक्कड़ के धूल फांक रहे !!
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चक्रव्यूह बना कर कई ने तो
खुदको जीत का दावेदार बताते है प्रबल !
यही एक अखड़ाह है जहाँ पर
सब अपने दुश्मन को कहते रहते है दुर्बल  !!
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कई डगर से, तो कई नगर से,
तो कइयो ने आसमान से आ तपके लेने हिस्सेदारी !
नेता बन गए अभिनेता,
अभिनेता बन गए नेता,फिर पीछे कैसे रह पाते व्यापारी !!
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फेसबुक और ट्विटर पर
मिनट -मिनट में पोस्ट करते है सब अपने विचार !
रात में दूरदर्शन पर लाइव मिलेंगे,
 दिन में फेनिफ़ेस्टो से भरे पड़े दिखंगे अख़बार!!
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बातों के दम पर और खुदको मनमोहक बन जाने हेतु
कितनो को करें देंगे बोटी -बोटी !
एक बार इनको ही जिता दो फिर देखो पाँच साल तक
यही आपसे छीनते रहेंगे रोटी !!
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नेताजी जी के जतन देखकर, अब न कोई दुबिधा है,
एक बार की  खेती का जो भी हो लागत!
सब कुछ  मन-मुताबिक रहा तो
 बिना मत्थापच्ची नेताजी को पांच साल तक मिलेंगे राहत !!
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लोकतंत्र में लोकशाही का अता-पता नहीं
घोषणा और उदघोषण की महामारी!
जनता तो सब देख रहे है उस पल को जोह रहे है
नेताजी अब तो बस करो, ये है मेरी बारी....!!

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