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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014



 उद्घोषणा व घोषणा पत्र नहीं ब्लिक इच्छाशक्ति को जनता टटोल रही है.…





समस्त देश में चुनावी सरगर्मी खूब जोरों पर हैं हालाँकि आम चुनाव का श्री गणेश ७ तारिक के मतदान के पश्चात् शुरू हो गया।  इस असमंजस की  स्थिति में जंहाँ एक खेमे  बड़ी बेसर्बी से मतगणना के उस पल के इंतजार में है जब वोटिंग मशीन से नयी सरकार या भविष्य के राजनीती के मार्ग को परस्त करेगी जो भी हो जिनके लिए वह चुनाव अनुकूल है बाके वे उनके लिए एक-एक पल बरश के सामान लगता होगा पर उनके लिए क्या जो इस चुनाव के बाद अपने रुतबे  और रुसूख  दोनों से हाथ धोना तय है वह तो शायद उस पल को रोकने में असमर्थ होते भी रोकने की मंशा लेकर यही कहते होंगे काश ऐसे वक्त जरा ठहर के ही आ !

इंसान कभी -कभी अपने रुतबे और रुसूख के बल पर पुरे ब्रह्मण्ड को उलट फेर करने की पुरजोर कौशिश करते और अपने को कभी कभी -कभी अजय या अविनाशी मान लेते है इसलिए उस कुदरत को आरे हाथ लेने से भी हिचकते नहीं हालाँकि इतिहास ने कभी ऐसे प्राणी को भाव नहीं दी अर्थात प्रकृति हमें सदेव अहसास कराती रहती है कि सब कुछ परिवर्तन के प्रतीक है यानि इस ब्रहाण्ड में वक्त के साथ -साथ सब कुछ खुद ही परवर्तित होते रहते है जो निविरोध, क्रमबद्ध, निरंतर देखे जा सकते है फिर भी सत्ता के गलियारों में बैठे मुट्ठीभर लोग अपने स्वार्थ और खुदगर्जी में आसक्त होकर आम आदमी के उम्मीदों पर पानी फेरने से बाज नहीं आते है क्या वे भूल जाते है कि  इस तरह के बचकाना हरकत करने का अंजाम विपरीत ही होनेवाला है। जिस सरकार अपनी हार के उस मनहूस घडी को न चाह कर भी इंतज़ार करनी पर रही है और अभी से तैयारी शुरू कर दी कि उस विपरीत काल में  कैसे उस परिस्थिति से सामना कर पायेगी जिसके पूर्वानुमान से ही कलेजा दहल जाती है। बेशक इस तरह के प्रतिकूल घडी से बचा जाता यदि अपने काम को स्वार्थहीन होकर उन्हें अंजाम तक पहुँचाती जो भी हो अब सिर्फ प्रायश्चित और पश्चाताप के सिवाय कुछ भी नहीं बचा है और इस प्रायश्चित पश्चाताप  के दौरान फिरसे उनको मौका मिला है कि अपने को दीर्घ संकल्प के साथ मजबूत इरादा लेकर आगे के बारे सोचनी शुरू कर दे ताकि  देश उनकी पश्चाताप  के अविधि उनकी निस्वार्थता को परख पाए  और भविष्य में कुछ सकारत्मक उनके रुख के बदोलत लोगों का रुझान में बदलाव देखने को मिले।

पार्टी या संगठन जितने उतावले से उस आन्दमय पल को निहार रहे होते है कि कब सत्ता उनके हवाले हो?, क्या सत्ता के लालयित और बरसो से हतोउत्साहित को सत्ता मिलते ही कुछ इस कदर मदमस्त तो नहीं हो जाते है कि सत्ता के सिवाय कुछ और सुहाते ही नहीं  सब कुछ हरा भरा दिखने लगते है क्या अन्तः  लोगों के उम्मीद और जरुरत को भूल कर सत्ता के भोग भोगने में लीं हो जाते है ?

लोंगों के जहन में यह संदेह हमेशा बना ही रहता है कारणस्वरूप ऐसे में तनिक भी कम होने का आसार भी  नहीं देखा जा सकता है। विडम्बना है अब तक इस तरह के सरकार से देश लालायित ही रहे जो देश और जनता के अपेक्षा और आंकक्षा के लिहाज़ से २४ कैरट शुद्धता पर खड़ी उतरी हो या सभी पैमाने पर सर्वोपरी रही हो।  देश ने अतीत से लेकर अबतक के सभी सरकार को देखा जो जनता के हित को दरकिनार कर अपने हित और राजनीती के हित में ही फैसला लिए नतीजन सरकार की नाकामयाबियां ही जनता को सिर्फ मायूशी और वेदना ही दिए। यद्दिप देश पिछले पैंसठ साल में कई घोषणा पत्र और जाने अनेको लोकलुभावन नारे सुने जो सीधे दिल से लेकर जुबान तक छाये रहे फिर भी मुद्दा तस से मस नहीं हुए अर्थात आज वही मुद्दा है जो बरसो से ज्यों का त्यों बना है।  इस तरह के अनुभव मिलने के बाद जनता के लिए कदाचित आसान नहीं कि आगे आनेवाली सरकार से बहुत कुछ अपेक्षा करे परन्तु जो बुनियादी दिक्कते है जिनसे अामना  -सामना होना पड़ते है, कमसे कम ऐसे रोजमर्रा के समस्याओं का समाधान तो चाहेंगे ही ।

देश तो वेसे भी कई प्रांतो में विभाजित है और प्रान्त कई जिलो में फिर भी सियाशी पार्टियाँ वोट को ध्रुवीकरण करने के मंशा से वर्ण से जात में और जात से उपजात में बाँटने के लिए अग्रसर दीखते है ऐसे में महज़ब को आरे आना ही है क्यूंकि महज़ब वोट के फार्मूला में इतना सटीक बैठते है कि सियाशी पार्टियों को बिना जद्दोजहद के छोटे- छोटे टुकड़े में बटें वोट को सिर्फ चंद समुदाय  के आधार पर एक बड़े तबके में तब्दील कर देते हैं।  धर्मनिरपेक्षता तो बस बहाना है पर राजनितिक दल का तो सिर्फ इनके पीछे यही धारणा बना के रखे है कि यदि यह धुर्वीकरण सफल हो गया तो मानों आधी मुस्किल आसान।  यहाँ एक विन्दु और भी है जिनको गौर की जानी चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का इन सियाशी दल परिभाषा भी अपने -अपने मनमुताबिक बना लिए है वाबजूद इसके कि धर्मनिरपेक्षता हमें यह सिखाते है कि सब धर्म को  सामान रूप से देख जाना चाहिए न कि किसी एक धर्मं और समुदाय को ही धर्मनिरपेक्षता का लाभ मिलें।  आनेवाली सरकार को यदि निस्ठा से पहल करती है तो इस तरह के प्रथा ध्वस्त करके सभी वर्ग, समुदाय, जिला और प्रान्त को ही सूत्र में फिरोने होंगे ताकि कल के भारत में कोई धर्मं निरपेक्षता की  हवा अपनी सियाशी गुब्बारें न भरे चाहे विकास की  शिखर पर हो तो भी सब एक साथ हो और किसी भी कठनाई को निरस्त करना हो ऐसी विकत परस्थिति में भी हम सब साथ दिखें।

भ्रष्ट्राचार, मंहगाई , बेरोजगारी और गरीबी देश के प्रमुख मुद्दे है जिसका हल लोक चाहते है जबकि सरकार यदि कर्मठ और अग्रसर हो तो इसके बिरुद्ध अपनी पूर्णतः ताक़त तो झोंक देती है, पर इसको अभी तक कारगार समाधान नहीं ढूंढ पायी है। परिणामस्वरूप ऐसी परिशानियों से कुछ समय के लिए निज़ात तो मिलती है पर दीर्घकाल के लिए नहीं ऐसे में दूरदृष्टि के मद्दे नज़र किसी भी तरह के के कदम उठाये जाय तो हो सकता कि तुरंत इसका परिणाम देखने को न मिले पर भविष्य में जरुर ही ये सार्थक कदम  माने जायेंगे अर्थात इसका इलाज़ एलोपैथिक विधि से न करके आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक तरीके से करे तो जरुर ही इन समस्याएं का उपचार करने में सफल हो पायेगी। कोई भी सियाशी पार्टी या सरकार आते है और थोड़ी बहुत प्रयास दिखा कर फिर खामोश हो जाती है और परेशानियों के सामने नतमस्तक होकर वहाँ से ध्यान कँही और केंद्रित कर लेती है अन्तः हार मानकर उन परेशानियाँ को पूर्वावस्था में ही छोड़ देती है।



दरअसल में सरकार ने इन परेशानियों के लिए ऊपर से फिक्रमंद तो दीखते है पर इनके तह में जाने की कभी भी कोशिश नहीं की, यदि परेशानियों के मूल कारण का पता लगाने को थोड़ी सी भी कोशिश की गयी होती तो अब तक इन समस्याएँ का हल खुदबखुद हो जाते। देश के जितने भी समस्याएं है इनके लक्षण चाहे जो भी हो  पर महामारी के रूप धारण करने के लिए यह लचर व्यवस्था ही जिम्मेवार है अर्थात जिस दिन लचर व्यवस्था को दुरुस्त कर दिया जायेगा फ़ौरन ही समस्याएं का खत्मा सुनिश्चित है।  बिना व्यवस्था दुरुस्त किये यदि कोई भी सरकार समस्याएँ को समाप्त करने की  दोहाई दे रही हो तो स्प्ष्ट जान लें कि सिर्फ दिग्भ्रमित करने की प्रयास किये जा रहे है। आखिकार सरकार किसी भी दल का हो पर जितने प्रतीक्षा उन पार्टी को सत्ता पर काबिज़ होने के लिए है उतने ही बेकरारी से चौनीतियाँ भी उनसे रुबरु होना चाहते है अब भविष्य ही तय कर पायेगी कि सरकार ने चौनीतियो को निरस्त कर दी या चौनीतियाँ सरकार के प्रयास और सोंच के सामने सामने नतमस्तक हुए।

चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान लम्बी -चौड़ी घोषणा पत्र तैयार किये जाते है, बड़ी -बड़ी बातें उद्घोषणा के जरिये लोगों तक पहुचायें जाते है पर चुनाव के बाद न घोषणा पत्र का कोई मायने रह जाते और न ही उद्घोषणा में  कही बातें को याद रख पाते है फलस्वरूप प्रत्येक पांच साल के पश्चात चाहे सत्ताधारी पार्टी हो या प्रतिपक्ष  हो उसी घोषण पत्र और उद्घोषणा के दम पर चुनाव जितना चाहते है अर्थात पिछले पाँच साल में सरकार की उपलब्धियोँ में घोषणा पत्र में किये गए वायदे भी सामिल नहीं रहे ऐसे प्रतिपक्ष का तो वाज़िब है कि पांच पहले का ही  घोषणा पत्र को फिर से पूरा करने का भरोषा दें। बेशक़ हम लगभग आज़ाद भारत में लोकतान्त्रिक सरकार पैंसठ साल से काम करती आयी हो पर मुद्दा आज भी वही जो आज से पैंसठ साल पहले हुआ करते थे। इससे सरकार की काज करने के क्षमता पर प्रश्न चिन्ह उठाना स्वाभाविक है फिर भी सरकार अभी तक कोई संतोष जनक जवाब नहीं दे पायी है। आखिर कब तक देश को घोषणा पत्र और उद्घोषणा से ही संतोष करने पड़ेंगे जबकि वास्तविकता से इनका कुछ भी लेना देना है ही नहीं। अन्तः चुनाव में शामिल सभी पार्टीयों से अनुरोध है कि कब तक घोषणा पत्र और उद्घोषणा से देश के आवाम को रिझाने की कोशिश करेंगे जो कि अब तक कभी भी पुरे नहीं किये गए, ऐसे में घोषणा पत्र और उद्घोषणा चुनाव जीतने के लिए तर्कसंगत नहीं लगते है इसलिए क्यूँ न इस तरह के प्रथा या तरकीब को छोड़ देना चाहिए?, अपतु ऐसे  उम्मीदवार को सामने करें जिनके व्यक्तित्व और इच्छाशक्ति के साक्षय के आधार पर चुनाव फ़तेह करने का प्रयंत करें जो कि देश और लोक दोनों के हित में है.………!!


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