Daily Calendar

बुधवार, 23 अप्रैल 2014



 PM खुद ही बन गए बेचारे …!


बेचारे मनमोहन सिंह जिनके मन में भी तरप होंगे, वेदना होंगे किन्तु किसे सुनाये और कौन सुने?, क्यूंकि मौका को भी खुद ही गँवा दिए फलस्वरूप PM खुद ही बेचारे बन गए। बेशक हाल में उनके खिलाफ जो भी घटनाएँ घटे है उनसे आहत होना स्वाभाविक है। हालाँकि जो भी घटनाएँ सामने आये इनसे एक ही बात का खुलाशा होता है कि गाँधी से प्रभावित हमारे प्रधानमंत्री गांधी जी के तीन बंदरों के अनुरूप खुदको प्रस्तुत कर दिए अर्थात बुरा मत कहो इसीलिए खामोश रहे, बुरा मत सुनो इसलिए अपने बोरोक्रैसी का अनसुना करते रहे , बुरा मत देखो इसीलिए अपने आँख बंद कर लिए ताकि घोटाला होते रहे पर प्रधानमंत्री अपने आँख और कान को बंद करके अपनी चुपी साधे रहे। फिर भी इनके ही इर्द -गिर्द के लोंगो ने जब इन पर आरोप लगाना आरम्भ कर दिए कि सब कुछ संज्ञान होते हुए भी खामोश रहे, जिससे इनके ख़ामोशी  पर सवाल उठाना लाज़मी है आखिर सबकुछ जानते हुए प्रधानमंत्री खामोश क्यों रहे? , यद्दिप बुद्धजीवियों का मानना है गांधी परिवार का कृतज्ञता  के कारण ये खामोश रहे जबकि एक के बाद एक घोटाला होते रहे और वह जनपथ के तरफ देखतें रहे कि शायद अब बक्श दे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ नतीजन पिछले दस साल में देश में किसीका विकास हुआ तो वह था भ्रष्टाचार और घोटाला जो अपने चरम सीमा पर थे।

 प्रधानमंत्री के खामोशियों के पीछे का क्या मनसा थी ?, क्यूंकि एक दशक तक खामोश रहना सबके बस की बात भी नहीं होती, ऐसा तो नहीं था कि प्रधानमंत्री खुदको जनपथ के प्रति सम्पर्पित कर दिए थे और उनके हर एक फैसले को स्वीकृति दे रहे थे।  प्रधानमंत्री के कुर्सी वास्ते इस तरह का समर्पण और लापरवाही दिखाकर प्रधानमंत्री के ही गरिमा को तार -तार करते रहे।  क्या पिछले दस साल में उनको कभी अपने व्यक्तित्व का ख्याल नहीं आया या व्यक्तित्व का ख्याल आने के वाबजूद प्रधानमंत्री ने  कुर्सी के खातिर उनकों अपने मस्तिक टिकने नहीं देतें थे और तुरंत ही अपने मस्तिक से बाहर निकल फेकते थे? आज देश के लोगों के जहन में भी बहुत -सारे ऐसे प्रश्नो ने हलचल मचाने पर आमादा है फिर भी लोगों को कभी तो उनके ख़ामोशी पर तरस आता है तो कभी उनके मौनव्रत पर झुंझलाहट आता है आखिर जब उनकों बलरहित  कर दिए गए थे ऐसे में क्या जरूत थी वे  कुर्सी से चिपके रहे?, जितना शहनशीलता  उन्होंने प्रधानमंत्री बने रहने के लिए दिखाए यदि थोड़ी भी संवेदना सौ से सबा सौ करोड़ जनता के लिए दिखाएँ होता हरगिज़ आज जिस कदर उनके विरुद्ध मौहाल है ऐसा कतई नहीं दीखता और दीखता भी तो लोग सिरे से खारिज कर देता।

जिस जनपथ के लिए उन्होंने  सबकुछ न्योछावर कर दिए पहले से ही त्याग की मूर्ति की ख्याति कोई और झटकर ले गए अन्तः उनके हिस्सा में सिर्फ और सिर्फ फजीहत ही आया।  ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी कोई उनके बचाव में भी आगे नहीं आया फिलहाल मीडिया और जनता दोनों उनके ख़ामोशी पर कोस रहे है हालाँकि फिलहाल देश के प्रधानमंत्री के कुर्सी पर वे ही आसीन है पर भविष्य में जब कुर्सी से बेदखल होंगे और सीधे -सीधे जनता से मुखातिर होंगे तब जनता के कई सवाल होंगे जिसका जवाब उनकों देना ही होगा जो उनके लिए सहज नहीं होगा ।


शायद इतिहास ही उनके मौनव्रत का आकलन स्पष्ट रूप कर पाये और ये भी हो सकता है कि थोड़ा बहुत टिप्पणी करके छोड़ दे पर देश के आवाम जल्दी से आपके ख़ामोशी को कदापि नहीं भूलेंगे क्यूंकि ख़ामोशी के कारण  देश का लाखो करोड़ का नुकशान हुआ है जिसका भरपाई करने में न जाने कई साल लग जायेगा फिर भी मुमकिन न हो।  वास्तव में प्रधानमंत्री के ख़ामोशी के पीछे जो भी  माज़रा हो लेकिन सरकार और सत्ताधारी पार्टियों का भी ही जवाबदेही बनता था की वे रोके पर किसी ने भी रोकने का प्रयास नहीं किया, जिसका परिणाम तो उनको भुगतना ही पड़ेगा क्यूंकि आरों की राजनीती करियर के बहुत ही दिन बाकी है ऐसे में कब तक छुपी साधे रहेंगे अथवा दिग्भर्मित करते रहेंगे?  एक दिन तो इन सभी घोटाले का कच्चा चिटठा लोगों के समक्ष होंगे ही इनका हिसाब सबको देना ही होगा जिसे चाह कर भी नक्कार नहीं सकते।  


आखिरकार गैर राजनीती व्यक्ति को यदि राजनीती के सबसे पसींदा कुर्सी आसानी परोस दें तो  इसके पीछे छुपे हुए केवल एक ही मनसूबे होते है कि गैर राजनीती व्यक्ति सिर्फ नाम के लिए उस कुर्सी का शोभा बढ़ाते और परदे के पीछे राजनीती के कदावर नेता जो गॉडफादर के भूमिका में रहते है वे अपने सभी मनसूबे को पूरा कर लेते है। लाछन तो कुर्सी में बैठे व्यक्ति को ही लगना जबकि उपलब्धियाँ लेने के होर में राजनितिक व्यक्ति सबसे आगे दिखेंगे फिर भी गैर राजनीति व्यक्ति अपने को खुश नसीब समझते है कुर्सी पर आसीन होकर क्यूंकि इस अहोदा उन्होंने बिना संघर्ष और त्याग के  मिल जाता है इसकी के बदौलत खुदको इतिहास के पन्नो में अपना नाम दर्ज़ करबा लेते है।  अन्तोगत्वा सबसे बड़ा सवाल है की ऐसे व्यक्ति को राजनीति के शीर्ष पद पर बैठना चाहिए जो इनसे तालुकात  रखते ही नहीं जबकि राजनीती के कदावर नेता व मुखिया आसानी से गैर राजनितिक व्यक्ति कुर्सी भेंट में देकर अपने सभी मंसूबा को साध जाते है, क्या वास्तविक में क्या जनता से विश्वासघात का मामला नहीं बनता है और क्या इसके लिए इन व्यक्ति के खिलाफ कानून में सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए ? जरा सोचिये ……!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें