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गुरुवार, 2 जनवरी 2014



  नेता हो या अभिनेता  मीडिया के सामने सब बोने है !


 "प्रभु, मुझे मार्ग दर्शन करे, मैं कितना भी प्रयास करता हूँ पर सफलता के स्वाद चखने से हमेशा वचिंत रह जाता हूँ। कोई ऐसा उपाय बताये जो मेरे प्रयास  को सार्थक बनाये ताकि मैं भी कामयाबी के मंजिल को अतिशीघ्र पाऊ।"
 "अति उत्तम, परन्तु पुत्र मैं माध्यम और दिशा बता सकता हूँ कि मंजिल किस दिशा में हैं परन्तु  चलना तो तुम्हे ही पड़ेगा " बड़ी विन्रमता से उन्होंने कहा।
"प्रभु , आप मार्गदशन तो कीजिये, चलने के लिए तैयार हूँ '' मैंने उतसुकता से आग्रह किया।
"वत्स, आज का  युग  दिव्य दर्शन से ज्यादा दूरदर्शन का हैं, इनदिनों दिवाइन ज्ञान के साथ -साथ  ऑनलाइन ज्ञान का भी आवश्यक्ता हैं , पुत्र, आज मेरे  जितने फोलअर हैं उनसे कंही ज्यादा  इन मीडियाओ का फोलअर हैं। अतः ऐसा कुछ कर जिसके चलते मीडिया के तेरे ऊपर नज़र पड़े बस देखो कुछ ही दिनों में ही सफलता आकर तेरे सामने नतमस्तक होंगे और कामयाबी तुम्हारे कदमो को चूमेंगे। "
"प्रभु, क्या सचमुच सम्भव हैं?'' मैंने हैरानी से पूछा।
"हँ वत्स, इस आधुनिकता में मीडिया ही हैं जिसके बल पर सबकुछ मुमकिन हैं। अपने आस पास  नज़र तो दौडाकर देखो, अज्ञानता की जो पट्टी बांधे हो अपने आँखों पर, उसको खोल। " "
"जैसे, प्रभु !" मैं फिर हैरानी से पूछा।
"देख, अन्ना का जनलोकपाल आंदोलन, वे कौन हैं जिसके बलबूते एक छोता  सा  आंदोलन इतना  बड़ा रूप अख्तियार कर लिया जो करोड़ो लोंगो को एक साथ लेकर आये,  इस आंदोलन से पहले अन्ना को एक प्रान्त से बाहर कोई जानता तक नहीं था पर इस आंदोलन के बाद आज अन्ना पुरे देश प्रतिनिधित्व् कर रहे हैं, उनकी एक आवाज़ पर लाखो का हुज़ूम एकत्रत हो जाते हैं। ये चमत्कार जो हुआ इसमें मीडिया का ही अहम् योगदान रहा  हैं। अरविन्द केजरीवाल जो दिल्ली के इनदिनों मुख्यमंत्री हैं उन्ही अन्ना के सिपह -सलाहकारो में से एक थे पर मीडिया की मेहरबानी का ही नतीजा हैं जो वे  दिल्ली के गद्दी पर काबिज़ हैं। रामदेव बाबा का योग का परचम चारो दिशा में लहराना हो या निर्मल बाबा अंधविस्वास -तर्क का बढ़वा देना हो सब मीडिया का ही देन हैं अन्यथा इनके लीला इतने भी अवरम्पार नहींजो चारो दिशाओं तक फैला होता।  मीडिया का जो रुसूख ही है जिसके सामने किसी का भी ज़ोर  नहीं चलता। लोग कोर्ट से ज्यादा मीडिया से डरते हैं, पता तो होगा हाल ही का घटना, आसाराम बाबा जो भी एक मीडिया के ही क्षत्र - छाया में इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था, पर दिनों मीडिया की सुर्ख़ियों में अपने को पाकर बहुत ही दुखी हैं जघन्य अपराध के वाबजूद  लोगो का मोह उनसे भंग नहीं हो पाया था  पर मीडिया ट्रॉयल के बाद जरुर बाबा का सिंहासन डोल गया और लाख कोशिश के उपरान्त भी मीडिया ट्रॉयल को रोकने नहीं पाये । यहांतक कि सुप्रेम कोर्ट का  भी दरवाजा खटखटाया था मगर सभी जगह  बाबा के इस मांग को खारिज़ ही किया गया। नेता हो या अभिनेता  मीडिया के सामने सब बोने है चाहे मीडिया कितनी भी उनके टिप्प्णी करे पर वे मीडिया को ठेश सपने में भी नहीं पहुंचा सकते हैं। क्यूंकि मीडिया ही हैं जो उनको इस मुकाम को हासिल करने में अहम् कीड़दार निभाए हैं। मीडिया का साथ हो तो आम से खास बनने में देर नहीं लगते पर मीडिया की  कुदृष्टि शनि की  कुदृष्टि से भी ज्यादा प्रकोप वाली होती हैं क्यूंकि शनि की  कुदृष्टि का प्रकोप  सात साल प्रभावित करती हैं, पर मीडिया की कुदृष्टि उम्र भर प्रभावित करती हैं।  इसलिए मीडिया के शरण में जा और मनवांक्षित फल पा। "

इतने कहते ही वे दिव्य पुरुष न जाने कहाँ गायब हो गए?, इधर -उधर उनको ढूंढते मेरे आँख खुल गए। फिर ज्ञात हुआ कि मैं सपना देख रहा था पर उनके हर एक शब्द मेरे कानो से सेकड़ो बार टकराते रहे फलस्वरूप मैं सोचने पर विवश हो गया कि वे महापुरुष जो सपना में कह गए सारे उनके कथन सत्य हैं अर्थात यूँ ही।

वेसे भी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ की संज्ञा दी गई हैं पर आज से शक्त पहले शायद मीडिया कभी भी न था। इन दिनों मीडिया अपने अनेको रूप के साथ उस बुलंदी के शिखर पर पहुंचा हुआ हैं जिससे ऊपर लोकतंत्र में कोई नहीं हैं। प्रिंट मीडिया, इलेकट्रोनिक मीडिया , सोशल मीडिया इनके मुख्य तीन रूप हैं इनमें इलेकट्रोनिक मीडिया सबसे अहम् हैं पर जिस कदर सोशल मीडिया फल फूल रहा हैं वे दिन ज्यादा दूर नहीं जब अपने अन्य रूप को पीछे छोड़ ये आगे निकल जाये।

 स्पर्धा के परिवेश में जंहा ताज़े और मसालेदार ख़बर पडोसने का होड़ लगे हैं उसमें गुणवत्ता का कोई मापदंड और मानदंड चिन्हित करना बहुत ही कठिन हैं।  भौतिकता के इस दौड़ में पत्रकारिता सिर्फ व्यवसाय बन चूका हैं वजह हर खबर की बोली लगती हैं उसमें दर्शक(जनता जनार्दन) के सरोकार को ध्यान में रखना कतई मुमकिन नहीं हैं। आज की  इस बज़ारीकरण में सबकुछ  बिकता हैं और बेचने का माध्यम ही मीडिया हैं ऐसे हालत में मीडिया के लिए भी सहज नहीं  हैं की खुदको बाज़ार से दूर रखे। यही कारन है कि TRP के खातिर अथवा विज्ञापन के खातिर उन्ही समाचार के इर्द -गिर्द घूमते हैं जिनकी कीमत कॉर्पोरेट हाउस ज्यादा से ज्यादा देने के लिए राजी हो। परन्तु यह भी सत्य नहीं है कि सभी के सभी एक ही पथ पर अग्रसर हैं अर्थात इन परिवेश में भी  ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ पत्रकार हैं  जो पत्रकारिता जीवित रखे हुए हैं, जो खड़ी और सच खबर को ही आगे करने के लिए  कटिवद्ध हैं जो खबर के साथ किसी भी हाल में छेड़ -छाड़ नहीं करते, ईमानदारी से खबर प्रस्तुत करने से कभी हिचकंते नहीं हैं। 

 चाहे आज़ादी की लड़ाई हो या जय प्रकाश का आंदोलन हमेशा से मीडिया ने अपना भूमिका बखूबी निर्वाह किया हैं, इसका  परिणाम हैं कि आपातकाल के दौरान भी सबसे पहले मीडिया और मीडिया से जुड़े हुए लोग पर पावंदी लगायी गयी थी, उसके बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगा दी। मीडिया किसी भी देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अहम् हैं जहाँ सरकार  को सोचने के लिए बाध्य करता हैं कि सरकार की हर फैसला में जनता का हित का ख्याल रखी जाय वंही जनता की बात को भी सरकार तक पहुचने में मीडिया का ही महत्वपूर्ण भूमिका होता हैं।
 
प्रिंट मीडिया और इलेकट्रोनिक मीडिया जिस पर सरकार और कॉर्पोरेट हाउस की दखलंदाजी को  किसी भी हाल में सिरे से खारिज़ नहीं किया जा सकता पर सोशल मीडिया जिस पर सरकार का नियंत्र नाममात्र भी नहीं हैं। वस्तुः इनदिनों लोगो की पहली पसंद सोशल मीडिया ही माना जा सकता क्यूंकि यह एक ऐसा मंच हैं जो बिना भेद भाव किये हर किसीको अपनी बात रखने की खुली  छूट ही नहीं ब्लिक उस बात को उनसे इत्तफ़ाक़ रखनेवाले के बीच पहुँचाने में भी मदद करता हैं। दरशल में सोशल मीडिया एक ऐसा जरिया हैं जिनका दायरा इतना अत्यधिक  हैं कि आसानी से तय नहीं किया जा सकता है, जो सभी बंधन तोड़कर और सभी विभिन्नता  को दरकिनार कर एक मंच पर लाकर खड़ा कर देता हैं। इसलिए तो युवा हो या प्रोढ़ या वुजुर्ग सबका पहला पसंद सोशल मीडिया ही हैं। इस पसंद को देखकर ही बड़े से बड़े सेलिब्रेटीज हो या राजनेता इनसे ज्यादा दिन दूर नहीं रह पाते । यही कारण हैं कि चुनाव का प्रचार हो या किसी मुहीम का प्रसार इनके लिए सोशल मीडिया का उपयोग करने को कोई भी भूलते नहीं।

 जैसे सिक्के का दो पहलु होते हैं, उसी तरह मीडिया के बढ़ते इस प्रभाव के भी अपने फायदे और गैर फायदे हैं जंहा एक तरफ लोकतंत्र में पारदर्शिता लाता हैं और अभिव्यक्ति की आज़ादी को सजीवन देता हैं पर  दूसरी तरफ मीडिया अपनी दायित्व को नज़रंदाज़ करके इस स्पर्धा की परिवेश में अपना पकड़ कायम रखने के लिए खबर के साथ समझोता करना शुरू कर देते हैं तो ऐसी परिस्थिति में इसका दुष्परिणाम इतना भयानक होगा जो समाज के जड़े को उखाड़ फेकेंगे चाहे जड़े कितने भी गहरे में क्यूँ न हो और लोकतंत्र के बुनियाद को हिला देंगे जो कभी भी स्वीकारा नहीं जा सकता। इस विषम परिस्थिति से बचने के लिए मीडिया हाउसेस को चाहिए को खुद ही एक लक्षमण रेखा खींचे और उसीके दायरें में रहकर काम करे।

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