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सोमवार, 13 जनवरी 2014


फिर वही पूस की रात.………………!

कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात 
ये  रात चाह कर भी नहीं गुजरती
पर वे रात चाह कर भी नहीं ठहरती 
बैरण हो गयी निंदिया जो मेरे अखियन को आती नहीं ,
ग़ैर हो गयी निंदिया जो उन अखियन को भाती नहीं 
इस तरफ हैं ग़रीब की रात जो नग्न हैं अँधेरे की आग़ोश में 
उस तरफ जश्न की रात जो रोशनी से नहाये न दिखे होश में
वे सावंतवादी रात से कम नहीं ये समाजवादी रात 
गरीबो को डसतीं रही हैं हमेशा ये पूस की रात
कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात

मैं भी आम आदमी हूँ पर मेरी परवाह नहीं 
इस जख्म में भी दर्द है पर अपनों का आह नहीं 
कहाँ गए वे कदरदान,अब किसी का दरस नहीं 
आवाम हूँ, ग़ुलाम नहीं, क्यूँ हम पर तरस नहीं
दिखे न आग जो मेरी ठंडक को जलाये 
कहाँ गए ओ शोले जो मेरे अरमानो को जलाये 
दो अखियन के अश्क़ इस सिहरन में कब तक प्यास बुझायेगी
सबनम तो अब आफत बनी हैं न जाने कबतक सितम ढाएगी 
 मेरी मायूशी पर जिसने अपने अरमानो का निकाले हैं बारात 
उनको  अब फुरसत कहाँ हैं जो जान सके मेरी जज़्बात
कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात


सत्ता के चकाचौंध में कब देखा उसने, ऐसी पूस की रात
आकर तो देखो मेरी उस ज़ंग को, कैसे मौत को देती मात 
फिदरत वही दिल में लिए बदल आये लिबाज़ 
 कोई तो अब रहम करो सुनकर मेरी फ़रियाद 
आखिर किसपर भरोषा करे इस बेमुरव्वत ज़हान में 
आ अब लौट चले अपने पुरखों के खेत खलियान में 

नहीं तो यूँही आती रहेगी ये क़यामत की रात 
क़हर बरपाती रहेगी हम गरीबो के साथ

कपकपाती फिर वही पूस की रात,
ठिठुरती फिर वही पूस की रात

 






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