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रविवार, 19 जनवरी 2014


आआपा सिर्फ अवसरवादी परंपरा का एक स्वरुप



क्या धीरे -धीरे आआपा अपने आपा खो रहे हैं? अब केजरीवाल को सच्चाई का देवता कहना मुनासिब नहीं होगा और उनके चाहनेवाले यथाशीघ्र इस सत्य से वाक़िफ हो जाना चाहिए कि केजरीवाल किसी क्रांति और परिवर्तन का प्रतिक नहीं ब्लिक अवसरवादी परंम्परा का एक वह स्वरुप हैं जिन्होंने अपनी हित के खातिर अपने कुछ साथियो को मझधार में छोड़कर सत्ता को लालायित होकर अपने अनुकूल पुराने साथियों को एकत्रत करके एक दल बना लिया और अपने स्वार्थ को पूर्ति करने के हेतु अनेको लोकलुभावन वायदे करके सत्ता पर काबिज़ हो गए उसी तानाशाह लोगों और रवैया के साथ जिससे दिल्ली के जनता दिल और दिमाग से नक्कार चुके थे। एक शस्त्र, जो ब्रह्माशस्त्र का रूप अख्तियार करता पर आआपा के कदरदानों के हित के भेटं चढ़ कर सिर्फ झुनझुना बनकर रह गया।  दरशल में इसके लिए जिन्होंने त्याग और सम्पर्ण किया उनको हर्ष का अहसास तो होगा कि न कुछ के बदले कुछ तो मिला जबकि देनेवालों ने भी इसके लिए मना नहीं कर सके। अन्तः ये झुनझुना कितना कारगर हैं?, क्या  ये भ्रष्टाचारियों को जगाने का काम करेगा? क्या इनके ध्वनि में इतना ताक़त होगा कि भ्रष्टाचारियों को हमेशा सजग करता रहेगा, जिससे भ्रष्ट मुक्त समाज का निर्माण हो पाएंगे ? इस तरह के कई दिल को झंझोरने वाले प्रश्न जनता के मस्तिक में ज्वारभाटा की भातिं उतार -चढाव कर रहे हैं जिसका उत्तर शायद अभी कोई नहीं दे सकता।

 

वास्तविक्ता में जो आंदोलन पुरे देश के आवाम को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया क्यूंकि देश के अधिकतर लोग ने  भ्रष्टाचार को कैंसर से भी भयानक बीमारी मान चुके थे, जिसके कारण हमारी व्यवस्था दिन-ब-दिन खोखला हो रही थी इसलिए तो देश के लोंगो को विस्वाश था कि एक रामबाणॊषोद्धि मिलेगा इस आंदोलन के माध्यम से पर कुछ अवसरवादी और स्वार्थी के चलते यह आंदोलन दिशाहीन हो गया आखिरकार सरकार के  नुस्ख़ा  को अपनाकर रामबाणॊषोद्धि का इच्छा को परत्याग करना पड़ा भली भातिं यह जानते हुए कि इस नुस्ख़ा से भ्रष्टाचार (कैंसर) जैसी बीमारी का उपचार कतई सम्भव नहीं।

आआपा के नींव धारक समूह में जो भी लोग थे पहले तो एक -एक कर उस आंदोलन से जुड़ते गए फिर उस आंदोलन को अपने इर्द- गिर्द लेकर आये और जैसे ही उनको यकीं हो चला कि अब लोगो को उनके पर निशंदेह विस्वाश का परत जम चूका हैं जिसको आसानी से नहीं हटाया जा सकता तो उन्होंने फोरन अपनी पार्टी बनाने का एलान कर दिए फिर भी लोंगो का विस्वाश का परत जो उनके  प्रति  अपने जहन में जमा चूके थे वह उतार नहीं सका। आखिरकार वह विशाल आंदोलन धीरे -धीरे कर सिकुड़ने लगा और अन्तः न कुछ भी के एवज़ में जो कुछ के खातिर आंदोलन को समाप्त करना ही पड़ा।

आआपा के आलाकमान को हैरतंगेज़ होंगे कि कुछ विधायक आतुर हैं कि उनको भी बड़े मंत्री का ओहदा मिले अब उन्होंने पता हो चला कि यहाँ तो सब खाश बनने की चाह में आये हैं इसकेलिए कबतक शब्र का शीमाओ को बाँध रखे इसी कारन धीरे -धीरे कर पार्टी के अंदर अलगाव-वादी भावना पनपना लाज़मी हैं वस्तुः पुराने लोगों जो नीवं धारको में से थे  जान - पहचान या मित्र के श्रेणी में नहीं आते हैं उनको खाश बनने के मौका से वंचित किया जबकि लार टपकते हुए कई अवसरवादी लोग आ रहे हैं और उन्हें सम्मान सहित उनको मनपसंद ओहदे दिए जा रहे हैं।  नतीज़ा तो आना अभी बाकि है पर आआपा में जिस तरह लोगों में असंतोष दिखाई दे रहा हैं शायद बहुत जल्दी ही इसका गम्भीर परिणाम आने का आसार हैं।अब आआपा के कर्णोद्धार को तो ज्ञात हो ही गया होगा कि अवसरवादी इस परिवेश हर कोई एक मौका का ताक़ लिए रहता हैं जैसा कि आप ने पार्टी बनाकर मुंगेरी लाल के हशीन सपने दिखाए और लोग के मन में ईमानदारी का भ्रम जाल बनाये परिणाम स्वरुप उस भ्रम जाल में फासने में कामयाब हो ही गए अन्यथा आआपा कतई नहीं चुनाव जीत पाते पर आप चुनाव भी जीत गए और दिल्ली में सरकार भी बना लिए। एक तरफ जहाँ लोगों का विस्वाश का परतें आहिस्ता -आहिस्ता कर आआपा  और कांग्रेस के दरमियान बढ़ती नज़दीकिया में पिघल रहे हैं वही दूसरी तरफ लोगो का भ्रम जाल भी फटने लगा हैं आप के ही पार्टी के लोगो का कारनामें को देखकर।

जो भी हो आज के राजनीती परिदृश्य में आआपा के शीर्ष कमान यह कहने से हिचकते नहीं हैं कि उनकी पार्टी, देश के सबसे ज्यादा लोकप्रिय पार्टी है और उनके आलाकमान सबसे लोकप्रिय नेता हैं पर ये वास्तिवकता से परे हैं क्यूंकि आआपा कथनी और करनी में थोड़ा भी समानता नहीं जबकि वे लोग अंह के भी शिकार होने लगे हैं , इसलिए तो ये कहने से थकते नहीं कि उनका मुकावला सीधे भजपा से होने जा रहे हैं आगामी लोकसभा चुनाव में। आआपा के नेताओ का हाल के बयानो से संदेह की गुजाइंश तो होती ही हैं अब आआपा और कांग्रेस के बीच परदे के पीछें कुछ तो जरुर हुआ हैं नहीं तो प्रतिपक्ष को विरोधी मानकर उनसे मुक़वाला कि बात क्यूं करते है यद्दीप लोगों ने आआपा को भेजा था कांग्रेस से मुक़वाला करने के लिए और यही कहकर आआपा ने राजनीती धरातल पर जन्म ली जैसा कि कोई बच्चा माँ- माँ कहकर इस दुनिया में आता हैं। नवजात बच्चा को लेकर जिस कदर पुरे मुहल्ला में चर्चा होती हैं और घर में सबके आँखों का तारा बने होते हैं उसी तरह इनदिनों आआपा सबके आखों के तारे बने हुए हैं लेकिन जिस गोद को थामा हैं और कैसे भूल गए हैं कि उनसे ही मुक़वाला करने के लिए आपने जन्म लिया हैं। पर उनके गोद में जाने के बाद जंहाँ लोगों की सुरक्षा से ज्यादा स्वयं के सुरक्षा पर केंद्रित करना पर रहा क्यूंकि गोद में लिए हुए मौका के ताक़ में होगा कि कब आप को पटक कर आप से दुरी बनाये क्यूंकि आस्तीन के साप को कदाचित कोई  नहीं पालते, वही आप सुरक्षा के सभी विन्दु को लेकर सजग होंगे कि उनके चोट का मरहम क्या होगा ? शायद वह दिन दूर नहीं जब लोगों के आँखों चुभने लगे और उनके दिल- दिमाग से नदारद होना पड़े। फिलहाल बिलकुल आआपा उस नवजात बच्चे के भातिं हैं जो अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा जबकि दौड़ने के लिए तत्पर हैं जो न उनके शेहद के लिए उचित और न हीं इस देश के लिए।

बरहाल इस तरह के स्वार्थी नेताओ और स्वार्थी समाजसेवीयो के चलते ही वह दिन दूर नहीं जब जनता, पार्टीयों और नेताओ से उनके मैनिफेस्टो को लिखित स्टाम्प पेपर एग्रीमेंट के तोर पर चुनाव से पहले जमा करबायेँगे क्यूंकि आज़ादी के बाद लोकतंत्र तो हमें मिला पर कुछ स्वार्थी लोग और उनके दल के चलते हमेशा हमें ठगे गये  और हद तो तब हो गया जब आम आदमी के नाम पर खाश आदमीयों ने अपनी राजनीती की बाज़ार सजा ली और वायदा फरामोशी की सभी हदे पार कर सत्ता के भोगने के लिए बड़ी चुतराई से हमारी उम्मीद पर पानीफेर दिए। हालाकिं उनको अभी तो इज्जत नसीब हुए हैं जिसको भी पचा नहीं पा रहे हैं, पूछेंगे तब, जब फज़ीहत से सामना होगा और उस फज़ीहत को झेलने की मादा रखते हैं या नहीं। पश्चाताप के दिन में तो फिर वही जनता याद आएंगे जिनसे किये हुए वायदें और कसमें तोड़ कर सत्तापर काबिज़ हुए।

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