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सोमवार, 27 जनवरी 2014


नारा का ही सहारा ………………… ?

 


ईन दिनों उद्देश्य और सोंच को ताक पर रख कर सिर्फ नारे (स्लोगन ) के दम पर या आकर्षित बिज्ञापन के बदोलत हर पार्टी  चुनाव जीतना चाहती हैं। यही कारण है कि नारे को लेकर एक पार्टी दूसरे पार्टी को आरोप लगाते  दिखतें हैं।  एक  पार्टी के गणमान्य लोग कहते हैं कि इन्होने तो ओबमा का नारे चुरा लिए तो दूसरे पार्टी के  गणमान्य लोग कहते है कि इन्होने हमारे नारे  को चुरा लिया हैं। इससे तो यही अंदाज़ा लगाया जा सकता कि आने वाले दिनों में पार्टियाँ अपनी अपनी नारे को कॉपी राईट करबाते दिखेंगे।

दरशल में कई बार पार्टी नारे के दम पर चुनाव जीतने में कामयाब हो गए और नारे भी लोंगो के जुबान पर यूँ इस कदर बैठ गए कि दशको बाद भी लोग उसे भूल नहीं पाये  कुछ गिने चुने नारे जैसे कि "जय जवान जय किसान " कांग्रेस के बरिष्ठ  नेता व पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शाश्त्री ने १९६७ में नारा दिए थे,  एक  बार फिर कांग्रेस के आलाकमान व पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने १९७१ में "गरबी हटाओ " का नारा दिए थे जबकि जय प्रकाश नारायण  ने जन आंदोलन के दौरान यह नारा दिए थे कि "इंदिरा हटाओ देश बचाओ"  और हाल में ही यानि २००४ में कांग्रेस पार्टी के तरफ से एक नारा दिया गया था कि " कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।" 

यद्दिप नारा कितना भी लोकप्रिय क्यूँ न हुआ हो पर नारा का उद्देश्य हमेशा लोगों के हित से कोसो दूर ही रहा नतीजन जनता को कभी भी नारे में कही गई बातो से कुछ हासिल नहीं हुई।  इसीका परिणाम  है कि आज भी किसान आत्मा हत्या करने पर मज़बूर हैं,  देश में आज भी गरीबी हैं और आम आदमी के साथ अगर सब कुछ ठीक होता तो आज क्यूँ आम आदमी इतने  हताश होते।

फिलहाल कांग्रेस और भाजपा दोनों जिस नारे को लेकर वाक युद्ध करने में लगे हैं वह नारे किसी  राजनीती पार्टी की है ही नहीं ब्लिक कॉर्पोरेट जगत का वह तीन शब्द है जो टीम वर्क के प्रति जागरूक करते हैं।  "मै नहीं, हम" सिर्फ एक ग्रुप और दल को दर्शता हैं न कि पुरे आवाम या  देश को यदि कोई राजनितिक पार्टी इसे इस्तेमाल करना चाहे तो इसके बदले "हम नहीं, हम  सब (NOT WE , WE ALL ) का इस्तेमाल करे तो बेहतर होगा।

यदि कोई पार्टी अगर किसी का नारा चुराती  हैं, तो इसमें हर्ज ही क्या हैं क्यूंकि अगर किसी का सोंच सकारत्मक हैं इसलिए तो कोई और इसको अपनाने के लिए आतुर हैं और सकारत्मक सोंच किसी की विराशत नहीं कहा जा सकता इन पर सबका अधिकार हैं। न इसके लिए  किसीको अंह करने की  जरुरत हैं और न ही मलाल करने की  जरुरत हैं कि कोई और हमारा नारा चुरा लिया हैं। नारा जो शब्दो का ताना -बाना हैं यह  अगर उद्देश्य विहीन हैं, तो सिर्फ लोगो के जुबाँ पर तक ही पहुँच पाते हैं जबकि उद्देश्य के साथ हैं तब लोगों का दिल को भी छूटे हैं। अन्तः  जो पार्टी नारे के बुनियाद पर लोगों तक पहुचतें हैं , बेशक चुनाव जीत जाये अपनी मनसूबे को प्राप्त कर लें लेकिन जनता ( लोगों) के दिल में जगह पाने के लिए सकारत्मक सोंच के साथ वे हट भी चाहिए ताकि उस अनुमानित सकारत्मक सोंच को व्यावहारिक जामा पहना सके।

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