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गुरुवार, 19 दिसंबर 2013



मेरी पूछ कँहा ?

मन तो मेरा भी करता हैं कि मैं भी कोई पार्टी के साथ जुड़ जाऊ पर किसी भी पार्टी को मेरी जरुरत ही कहाँ! अगर जरुरत भी होगा तो बस झोला उठाने को या पिछुलगुआ के लिए।   रिटायर्ड  आईएएस , आईपीएस , सेलेब्रटी या कोई बड़ी राजनीती घराने से  जो तालुकात नहीं  रखते हैं अन्यथा  चुटकी बजाते ही किसी पार्टी से जुड़ने के साथ ही बड़े ओहदे हथिया सकते  थे और आगामी चुनाव में टिकट मिलने में ज्यादा मस्कट करने जरुरत नहीं पड़ता  निस्ठा और ईमानदारी को सभी  पार्टी अपनी अहम् मुद्दा मानती हो पर दिखाने के लिए यदि इसके आधार पर किसी व्यक्ति को महत्व देने कि बात हो उसमें निस्ठावान और ईमानदार आदमी को मापने का पैमाना ही भिन्न हैं, निस्ठा और ईमानदारी  अनिवार्यता ना  होकर वैकल्पिक हो जाते हैं। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस परिवारवाद से किसी भी पार्टी को परहेज़ नहीं हैं , पर इसे भी नाक्कारा नहीं जा सकता है कि बीजेपी और लेफ्ट  ऐसी बड़ी पार्टी है जो एक परिवार के इर्द-गिर्द तक सिमित नहीं हैं।आम चुनाव, लोकतंत्र का महाकुम्भ का संखनाद अभीतक हुआ नहीं  पर ये तक़रीबन तय हैं कि अप्रिल और मई के बीच २०१४ में लोकसभा चुनाव होने जा रहा हैं, इसके मद्दे नज़र देश के गणमान्य लोग जो बड़े-बड़े ओहदे पर अथवा सेलेब्रटी  रह चुके हैं  अथवा सेलेब्रटी उन्हे बड़ी - बड़ी पार्टियाँ  जोर सोर से  जोड़ने में लगे और साथ ही टिकट और सरकार बनी तो मनपसंद  मंत्री विभाग का भी आस्वासन दिए जा रहे।

एक आम आदमी जब किसी पार्टी से जुड़ता हैं तो वरसो तक उस पार्टी के साधारण कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहना पड़ता और वरसो बीत जाने के उपरांत भी एक कार्य -कर्ता से ऊपर नहीं जा पाते। यदि वे कार्यकर्ता कर्मनिस्ट और विवेकशील हैं तो शायद नामुमकिन हैं कि पार्टी उनकी उपस्थिति को थोड़ी भी अहमियत दे। अपनी उपेक्षा से हताश होकर परिवार के जिम्मेवारी उठाकर उसके निर्वाह करने लगते हैं। एक आम आदमी जो अपनी जिंदिगी की बहुमूल्य दिन पार्टी के काम काज में समर्पित कर दिया पर हासिल क्या हुआ, कुछ नहीं। एक आम आदमी चाहे किसी भी पार्टी से  जुड़े, और  कितना भी इमानदार हो असलियत में उस खास आदमी के सामने अस्तित्व शुन्य होगा क्यूंकि उनके पास बड़े- बड़े कनेक्शन नहीं जिसके बल पर पार्टी फण्ड के नाम पर करोड़ो इकट्ठा कर सके और ना  ही इतना बड़ा सेलेब्रटीज है जो अपने दम ख़म पर चुनाव जीतने को मादा रखता हो। बरहाल, इसे भी पूरी सच नहीं माना जा सकता हैं कि साधारण आदमी देश के सर्वोच्य पद पर आसिन नहीं हुए , हुए हैं पर औसतन इतने हैं जिनको बड़ी आसानी से अँगुलियों पर गिना जा सकता हैं परन्तु वे जिंतने भी साधारण आदमी उस पद की  गरिमा का ना सिर्फ लाज रखे ब्लिक अपनी  भूमिका को बड़ी ईमानदारी से निभाये। अब देश में राजनीती पहली वाली राजनीती नहीं जिसमे देश के लिए सम्पर्पण हो निस्वार्थ सेवा कि भावना हो।  आज  का तो राजनीति बिल्कुल बदल चुकी है जिसमें बड़े -बड़े इन्वेस्टर फाइनेंस करते हैं और अनुकूल सरकार  जैसे ही बनती हैं तो अपना मुनाफा वसूलने लगते हैं। एक तरफ सरकार टैक्स के नाम जनता का दोहन करती हैं दूसरे तरफ बड़े -बड़े इन्वेस्टर जिसने चुनाव लड़ने के लिए  सत्ताधारी पार्टी  को फाइनेंस किये  अथवा पार्टी फण्ड के नाम पर  करोड़ो दिए  वे  रोजमर्रा की जरुरत कि चीजो के दाम बढ़ाकर जनता का जेब ढीली करने में लग जाते हैं।  जिस कदर नेताओ का आय पांच वर्ष में   पाँच सौ गुना   तक बढ़  जाता  हैं इसे भी अंदाज़ा लगया जा सकता हैं आज कि राजनीती कितने फायदे का सौदा हैं और अब तो कई नेता ने नाचाहकर भी इज़हार कर ही देते हैं कि राजनीती कितना फायदे का सौदा हैं।

 आज की राजनीती में जंहा एक तरफ आर. के. सिंह और नंदन नीलकेणी को बड़ी ही ठाट-बात से पार्टी में स्वागत किये जाते हैं वही आम आदमी राजनीती से दुरी बनाये रखे हैं, किसका कई वजह हैं, एक तो, ये लगता हैं कि पार्टी में बेईमानी और भर्ष्टाचार चुनावी मुद्दा तो सकता लेकिन किसी पार्टी के मूलमंत्र नहीं हो पाता कि इन सभी से  नेता परहेज़ रखे।  चापलुषि जंहा उन्नति के मार्ग परहस्त करती हैं वंहा ईमानदार लोग के लिए क्या भविष्य होगी। देश कि राजनीती में जब तक  देश के मध्यवर्ग लोगों कि सक्रियता नहीं बढ़ता  हैं तब तक देश की  राजनीती नहीं बदलेगी और ना  इस देश का भला होगा।  देश की अधिकतर आवादी मध्यवर्गीय हैं  पर राजनीती हो या सरकार पर इनकी उपस्थिति आवादी के हिसाब से बहुत कम हैं इसीकारण मध्यवर्ग को  ही देश की बुनियादी समस्या से  रोज जूझना पड़ता हैं।

देश की जो अभी व्यवस्था हैं उससे मैं भी काफी उत्कंठित हूँ कि देश का सेवा करू देश में जिस कदर लचर व्यवस्था से जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही हैं शायद उनके जख्म पर मरहम लगाने का मौका मिले पर अकेला चना भर नहीं फोड़ सकता उसी प्रकार मैं चाह का भी कुछ कर नहीं सकते।  नेता को एक पार्टी उतनी  ही जरुरत हैं जितना एक अभिनेता के लिए मंच। यद्दिप कोई पार्टी में मेरी पूछ हो या नहीं पर मन ने ये ठान लिया हैं कि देश की सेवा सदैव करते रहेंगे पूरी इमानदारी के साथ बिना किसी स्वार्थ के। वेसे बुलबुले राजनिति के धरातल पर उबलने लगे है और इस कथन को हरगिज झुठलाया नहीं  जा सकता है  कि  आनेवाले परिवर्तन का ये प्रतिक है, बस उस क्षण का इंतज़ार है जब ये बुलबुले उस ज्वारभाँटा का रूप अख्तियार करेंगे जिसमे परिवारवाद, ग्लैमर्स, धन, बल, महज़ब और जातिवाद इस तरह के चुनाव के तमाम अबतक  फार्मूला  नस्तेनाबूद हो जायेंगे। 

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